जिन्हें 1992 का क्रिकेट विश्व कप याद है उन्हें मार्टिन क्रो भी याद होंगे. यह उनकी शानदार बल्लेबाजी और कप्तानी का ही कमाल था कि विश्व कप से पहले जिस न्यूजीलैंड को कोई भाव नहीं दे रहा था वही न्यूजीलैंड सेमीफाइनल आते-आते खिताब की प्रबल दावेदार हो गई थी. अपने पहले ही मैच में उसने पिछले विश्व कप चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को पीटा था और ऐसा मार्टिन क्रो की शानदार शतकीय पारी से मुमकिन हुआ था. इसी मैच में स्पिनर दीपक पटेल से गेंदबाजी शुरू करवाकर उन्होंने एक नई परंपरा की भी शुरुआत की थी.

ऐसी और भी परंपराओं के जनक रहे मार्टिन क्रो को न्यूजीलैंड के क्रिकेट इतिहास का सबसे बड़ा बल्लेबाज कहा जाता है. उन्होंने 77 टेस्ट मैच खेले और 45.36 के औसत के साथ 5444 रन बनाए.143 एकदिवसीय मैचों में 38.55 के औसत के साथ उनका आंकड़ा 4704 था. प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने करीब 20 हजार रनों का पहाड़ खड़ा किया था. अपना आखिरी वनडे और टेस्ट 1995 में उन्होंने भारत के खिलाफ खेला था.

जिस दौर में डेनिस लिली, जेफ थॉमसन, माइकल होल्डिंग और मैल्कम मार्शल जैसे गेंदबाजों की सनसनाती गेंदों से बल्लेबाजों की घिग्घी बंधी रहती थी उसी दौर में क्रो की बल्लेबाजी किसी लयबद्ध कविता की तरह दिखती थी.

1982 में जब मार्टिन क्रो न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में आए थे तो वे सिर्फ 19 साल के थे और उन्हें दुनिया का सबसे प्रतिभाशाली युवा क्रिकेटर कहा जाता था. इसके कारण भी थे. यह उस दौर की बात है जब डेनिस लिली, जेफ थॉमसन, माइकल होल्डिंग और मैल्कम मार्शल जैसे गेंदबाजों की सनसनाती गेंदों से बल्लेबाजों की घिग्घी बंधी रहती थी. इसी दौर में क्रो की बल्लेबाजी किसी लयबद्ध कविता की तरह दिखती थी. कवर ड्राइव, स्ट्रेट ड्राइव और कट जैसे शॉट उनके बल्ले से इस सहजता के साथ निकलते थे कि देखने वाले वाह कर उठते थे.

लेकिन मार्टिन क्रो का 'डिफेंस' भी उतना ही शानदार था जितनी उनकी आक्रामकता. विव रिचर्ड्स के बारे में कहा जाता था कि अगर वे सुरक्षात्मक तरीके से खेलने का फैसला कर लें तो कोई उन्हें आउट नहीं कर सकता. यही बात मार्टिन क्रो के बारे में कही जा सकती थी. (यह भी एक संयोग है कि काउंटी क्रिकेट के एक क्लब सोमरसेट ने विव रिचर्ड्स के विकल्प के रूप में उन्हें चुना था.) 1985 में आस्ट्रेलिया के गाबा में हुआ टेस्ट इसका उदाहरण है. रिचर्ड हेडली की तूफानी गेंदबाजी ने दोनों पारियों में आस्ट्रेलिया के सारे बल्लेबाजों का बस्ता बांध दिया था. हेडली ने कुल मिलाकर 14 विकेट लिए थे. लेकिन गेंदबाजों का स्वर्ग बनी इसी पिच पर क्रो करीब आठ घंटे तक लंगर डालकर खड़े हो गए थे. उन्होंने 328 गेंदों मे 188 रनों की शानदार पारी खेली थी. यह मैच न्यूजीलैंड एक पारी और 41 रनों से जीता था. इसी साल वे विजडन के 'क्रिकेटर ऑफ द ईयर' बने.

क्रिकेट के नए और मशहूर संस्करण टी20 की बुनियाद रखने में भी उनकी अहम भूमिका रही. 1996 में यानी अपने संन्यास के एक साल बाद ही उन्होंने क्रिकेट का एक छोटा प्रारूप विकसित कर दिया था और इसे क्रिकेट मैक्स नाम दिया था.   

लेकिन उनकी शोहरत का ग्राफ चोटी पर पहुंचा इसके सात साल बाद यानी 1992 में. इस साल हुए विश्व कप में क्रो ने नौ मैचों में 55 की औसत से 456 रन बनाए और अपनी धाकड़ बल्लेबाजी और कप्तानी के बूते न्यूजीलैंड को सेमीफाइनल तक पहुंचा दिया. उन्हें टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी घोषित किया गया.

मार्टिन क्रो का करियर कुल 13 साल का रहा. आखिरी कई मैच तो उन्होंने एक पैर पर खड़े होना जैसी कहावत की तर्ज पर खेले क्योंकि दूसरे पैर के घुटने में लगी चोट उन्हें अक्सर परेशान करती थी. इस चोट से बार-बार हो रही परेशानियों के चलते 1995 में उन्होंने संन्यास ले लिया. तब वे 33 साल के थे. लेकिन इसके बाद भी क्रिकेट से उनका नाता टूटा नहीं. एक कमेंटेटर और लेखक के रूप में वे खूब सक्रिय रहे. क्रिकेट के नए और मशहूर संस्करण टी20 की बुनियाद रखने में भी उनकी अहम भूमिका रही. 1996 में यानी अपने संन्यास के एक साल बाद ही उन्होंने क्रिकेट का एक छोटा प्रारूप विकसित कर दिया था और इसे क्रिकेट मैक्स नाम दिया था. यह खेल को लेकर उनकी दूरदर्शिता का सबूत था. 2015 में मार्टिन क्रो को क्रिकेट के हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया.

2012 में पहली बार मार्टिन क्रो के कैंसर से पीड़ित होने की खबर आई थी. जीवट के धनी इस दिग्गज ने तब इस बीमारी को मात दे दी थी. लेकिन कुछ महीने पहले पता चला कि इसने फिर उन पर हमला बोल दिया है. इसके बाद क्रो की हालत बिगड़ती चली गई और तीन मार्च को 53 साल के इस दिग्गज ने ऑकलैंड में अपने मित्रों और परिवार के बीच अंतिम सांस ली. लेकिन क्रिकेट के मुरीदों को कई यादगार पारियां देने वाले मार्टिन क्रो उनकी स्मृतियों में हमेशा जिंदा रहेंगे.