हास्यास्पद होने की हद तक पहुंच चुके ‘राधे-राधे’ और ‘जय माता दी’ वाले भारत में दो चीजें समझने की हैं. पहला यह कि यदि किसी मानवीय विचार की भी मूल भावना नष्ट करनी हो तो उसे या तो बाज़ार के हाथ में दे दें, या फिर राजनीति के हाथ में. बाज़ार उसे भोग की वस्तु बना देगा और राजनीति उसे हिंसक प्रतिक्रिया का हथियार बना देगी. दूसरा यह कि नई वैज्ञानिक पीढ़ियों के साथ भी इसका खतरा बराबर रहता है कि वह किसी एक नॉनसेंसिकल विचार से निपटने के लिए दूसरे नॉनसेंसिकल विचार का सहारा ले सकती हैं.

उदाहरण के लिए, धर्म को ही लें. इसमें शायद ही किसी को संदेह हो कि बाज़ार ने धर्म को भोग और व्यापार का उत्पाद बनाकर रख छोड़ा है. इससे उसके दो हित सधते हैं. पहला यह कि यदि किसी समाज या समूह की आस्था निहायत ही अंधी और भोली है, तो वह उसका खूब शोषण करते हुए वैसे उत्पाद बेचता है जो बेचारे भक्त को उसका अनिवार्य और नियमित ग्राहक बना देता है. जागरण, ऑरकेस्ट्रा, भक्ति-आधारित फिल्मों से लेकर इन्हीं फिल्मी धुनों पर आधारित कथित भक्ति-गीतों के कैसेट और सीडी, रौली-मौली और परसाद से लेकर टीवी चैनल और वेब-पोर्टल तक पर बेचारा भक्त अपनी गाढ़ी कमाई लुटाकर भी इसे हाथों-हाथ लेता है.

बाज़ार इस भोगवादी धर्म के विचार को आगे बढ़ाता है कि किसी भगवान को इस हाथ से देकर उस हाथ से सूद और पुरस्कार समेत निश्चिततौर पर पाया जा सकता है. साथ ही वह कई बार ऐसी निरीह जनता में डर पैदा करने वाले विचार को भी आगे बढ़ाता है कि अमुक अनुष्ठान या रत्न-अंगूठी इत्यादि के माध्यम से ग्रह-शांति नहीं कराने से बेचारे भक्त का अनिष्ट हो सकता है. ज्यों-ज्यों समाज में विभिन्न प्रकार की असुरक्षा बढ़ती है, त्यों-त्यों इसका बाज़ार बढ़ता है. टीवी चैनलों की मिलीभगत से खाते में पैसा जमा कराके अपने ‘दूर-संवेदी’ हाथों से ही कृपा बांटने वाले लोग इस समय भी यहां-वहां अपनी कृपा बेच रहे होंगे. जब भारत के एक बड़े कारोबारी समूह ने ‘भारत-पर्व’ के नाम पर ‘भारत-माता’ की तस्वीर को नए सिरे से प्रचारित करना शुरू किया था, तो उसने अवश्य ही सोचा होगा कि देश का करोड़ों ग्रामीण और कस्बाई निवेशक अपनी छोटी-मोटी बचत भी बिना कुछ पूछे भारत-माता की इस नॉन-बैंकिंग वाली अंचरी में डाल देगा. इस तरह बाज़ार एक नए प्रकार के पुरोहितवाद को जन्म देता है.

लेकिन नई पीढ़ियां जब धर्म के इसी स्वरूप को धर्म का एकमात्र और मौलिकरूप समझने लगती हैं, तो उनमें स्वाभाविक रूप से इसके प्रति खीझ और घृणा पैदा होती है. वह प्रतिक्रियावश धर्ममात्र के ही खिलाफ हो जाती हैं. फिर वह ‘रेशनलिस्ट’, ‘प्रोग्रेसिव’ और ‘एथीस्ट’ होने और दिखने का प्रयास करने लगती हैं. बाज़ार के दोनों हाथ लड्डू होता है. वह इस समानांतर धारा को भी अपने हित में इस्तेमाल करना जानता है. भोले भक्तों की तरह वह इन बुद्धिवादी पीढ़ियों को भी कहीं आसानी से मूर्ख बना सकता है. क्योंकि इन पीढ़ियों में किसी प्रकार के संयम, मर्यादाओं और वर्जनाओं की कदर नहीं होती. इसलिए छद्म-स्वातंत्र्यबोध का आभास देते हुए बाज़ार उन्हें निर्बाध भोग की ओर प्रेरित करता है. हिप्पी समृद्धि की प्रचंड भोगवादी संस्कृति में अपना शरीर, मन, धन, ऊर्जा और सुंदरता को गंवा देनेवाली ये पीढ़ियां समझ भी नहीं पातीं कि बाज़ार ने किस हद तक उनका शोषण कर लिया. इस शोषण और ठगी की कीमत पर भी उन्हें अनैतिकता की हद तक स्वच्छंदता चाहिए होती है. बाज़ार को उनकी इसी ज़िद और महत्वाकांक्षा का लाभ मिलता है.

यदि इन पीढ़ियों के कुछ अपोलोजिस्ट (समर्थक) प्रतिनिधि चरित्रों से भी पूछा जाए तो वह इतना तक कहेंगे कि हम्हीं तो बाज़ार हैं, और हम्हीं उपभोक्ता; इसलिए कौन, किसको और कैसे लूट रहा है इन सब दुराग्रहों से हमें कोई मतलब नहीं. ‘हम सब कुछ चाहते हैं’ और ‘हमें सब कुछ चाहिए’ वाला भ्रम शायद उनपर जीवनपर्यंत हावी रहता है. इसलिए ऐसे दौर की स्त्रियां कभी माता नहीं होती, यहां चिरयौवनाओं की फंतासियां बिकती हैं.

इन पीढ़ियों की उत्तरजीविता या सर्वाइवल का संघर्ष इसी भोगवादी धरातल पर होता है. अंतर्राष्ट्रीयतावाद और वैश्वीकरण जैसे मानवतावादी विचार भी इसी भोगवादी धरातल तक सिमट कर रह जाते हैं. इसलिए भारत के मदरलैंड या पाकिस्तान के फादरलैंड होने जैसी चीजें इसमें फिट नहीं बैठतीं. भारत-माता क्या, यहां तो ‘मदर-अर्थ’ और ‘मदर-नेचर’ वाली पर्यावरणवादी मातृभावना भी नहीं चलती. इको-फेमिनिज़्म (महिलाओं और प्रकृति में पोषण, सहयोग और प्रतिदान के गुणों का एकसमान रूप से पाए जाने की विचारधारा) को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है.

राजनीति के तो कहने ही क्या. धर्म को वह न केवल संकीर्ण राजनीतिक लामबंदी के लिए इस्तेमाल करती है, बल्कि परस्पर-घृणा, हिंसा और युद्ध तक की स्थिति पैदा करने के लिए वह धर्म का एकाधिकारी प्रवक्ता बनने का प्रयास करती है. आज हमारे यहां ‘देशभक्ति’, ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारत-माता’ के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, उसमें हम इसे घटित होते हुए देख सकते हैं.

पहले कोई एक दल या समूह किसी धर्म का ठेका लेकर उसका अंतिम व्याख्याकार बन जाता है. फिर वह अपनी यही व्याख्या सबपर जबरन आरोपित करने का हिंसक प्रयास करता है. फिर इसकी प्रतिक्रिया में किसी दूसरे धर्म का नामधारी राजनीतिक समूह उभर आता है जो उसी हिंसक भाषा में उसकी खिल्ली उड़ाता है. लियो टॉल्सटॉय ने एक बार कहा था, ‘जो आपको अच्छा लगता है वैसा ही दूसरे लोगों से भी जबरन कराने के लिए हिंसा का इस्तेमाल करना लोगों में आपके उस अच्छे विचार के प्रति घृणा पैदा करने का सबसे अच्छा तरीका है.’ इसलिए कथित प्रगतिशीलता के नाम पर इन्हीं राजनीतिकों का एक तीसरा कोण भी उभरकर आता है जो इसी बहाने धर्म मात्र पर ही चोट करने के मौके का फायदा उठाता है. सबका हासिल क्या होता है? समाज में न केवल विचारों के स्तर पर दूषण और हिंसा फैलती है, बल्कि असुरक्षा और दमन को भी बल मिलता है. चौतरफा शोर और हाहाकार में असल ज्ञान, विज्ञान और मानव-धर्म की बात करने और सुनने वाले मौन रह जाते हैं या गौण हो जाते हैं.

ऋषियों का मातृगान विश्वमानुषों का आभारबोध था

भारतीय वाङ्गमय की बात करें तो ऋग्वेद में भावविभोर होकर कोई ऋषि कहता है - माता पृथिवी महीयम् यानी यह विशाल पृथ्वी हमारी माता है. अथर्ववेद में इसी की पुनरावृत्ति करते हुए कोई और ऋषि पृथ्वी के उपकार से आह्लादित होकर कहता है- माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यानी पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं. अथर्ववेद का एक ऋषि तो गाते हुए इतना तक कहता है - सा नो भूमिर्वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः यानी जैसे माता अपने पुत्र को दूध पिलाती है, वैसे ही मां की भांति यह भूमि हम सबके लिए विविध रसों की सृष्टि करे. ऋग्वेद में एक स्थान पर विश्वमानुष की संकल्पना भी आई है.

यजुर्वेद में आए ‘राष्ट्र-राज्य’ की संकल्पना में भी किसी भौगोलिक सीमा और अंधता के लिए दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं है. लेकिन राजनीतिक हिंदूवाद या किसी अन्य पंथवाद के नाम पर पैदा हुए समूह आज ‘जय जगत्’ और वसुधैव कुटुंबकम् वाली एक मानवीय और व्यापक चिंतन धारा को ही संकुचित कर देने और अंततः नष्ट कर देने पर आमादा हैं. इसलिए हमें न केवल धर्म, देशभक्ति या भारत-माता की मूर्ति वाले जबरिया राष्ट्रवाद से सतर्क रहने की जरूरत है, बल्कि बाज़ारवादी वैश्वीकरण, कम्युनिस्ट और कथित जिहादवादी विस्तारवाद से भी इसी तरह निपटने की जरूरत होगी. जहां ‘जय जगत्’ का नारा लगा, वहीं यह सब पाखंड स्वतः समाप्त हो जाएगा. क्योंकि ‘जय जगत्’ में या ‘मदर अर्थ’ और ‘मदर नेचर’ में जो भाव है, वह इतना उदात्त, इतना मानवीय और वैज्ञानिक है कि आनेवाली किसी भी पीढ़ी को इसपर कोई ऐतराज न हो.

केवल गाय ही क्यों, चाहें तो बकरी और ऊंटनी को भी माता कहें

‘भारत-माता’ की तरह ही ‘गौमाता’ के भी संकीर्ण और संप्रदायवादी राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठते रहे हैं. मांसाहारी पुरोहितों के ऊपर कबीर का एक बहुत ही लोकप्रिय भजन है जिसमें वे कहते हैं- जब पंडित को जनम भयो है, बकरी भई महतारी. बकरी का दूध पड़े जब मुख में, हेरे नजर पसारी... पंडित काहे बकरिया मारी.... इसलिए गाय, बकरी या ऊंटनी को माता मानने के पीछे यही भावना थी कि उसके दूध से हमारे नवजातों की रक्षा होती है. हम सबको आजीवन पोषण मिलता है. विनोबा ने एक स्थान पर लिखा है, ‘गाय का दूध दोहने की कल्पना भली-बुरी जो भी है, लेकिन वह मनुष्य की एक खोज है. एक प्राणी दूसरे प्राणी का दूध पीने की योजना करते हुए सृष्टि में नहीं दीखता. लेकिन मानव ने गाय, भैंस, बकरी इत्यादि का दूध पीने की योजना की. उसने यह भी जाना कि हम इनका दूध पीएंगे, तो हमारे लिए ये प्राणी माता-पिता के समान हो जाएंगे.’

गोहत्या पर रोक को लेकर जब विनोबा एक बार सत्याग्रह पर उतर आए तो सरकार ने कहा कि ठीक है, हम गाय को नहीं मारेंगे लेकिन बैल को तो मार सकते हैं न? तभी से विनोबा को एक शब्द सूझा ‘गौवंश’. उन्होंने कहा भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में बैल की भी अहम भूमिका है, इसलिए रक्षा पूरे गौवंश की होनी चाहिए. इससे ‘गौमाता’ शब्द के संकीर्ण सांप्रदायिक चित्रण और इस्तेमाल की संभावना भी टल गई.

जब गांधी ने कहा ‘गीता माता’ और विनोबा ने कहा ‘गीताई’

किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या मनुष्येतर जीव के लिए माता के संबोधन में कुछ अटपटा हो ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन इसका संबंध मनुष्य की व्यक्तिगत भावना से ही होना चाहिए. इसे राजनीतिक, सरकारी या जबरन थोपा गया विचार बनाने का कोई भी प्रयास हिंसक और अवैज्ञानिक है.

महात्मा गांधी ने अपने जन्म देनेवाली वाली मां के बाद भगवद्-गीता को अपनी मां की संज्ञा दे दी. ‘अनासक्तियोग’ के नाम से उन्होंने गुजराती में गीता का अनुवाद भी किया. गीता का उनके जीवन में महत्व पर समय-समय पर उनके द्वारा लिखे गए विचार ‘गीता-माता’ के नाम से ही प्रकाशित हुई. इसमें गांधीजी ने कहा, ‘आज गीता मेरे लिए केवल बाइबिल नहीं है, केवल कुरान नहीं है, मेरे लिए वह माता हो गई है. मुझे जन्म देनेवाली माता तो चली गई पर संकट के समय गीता-माता के पास जाना मैं सीख गया हूं. मैंने देखा है, जो कोई इस माता की शरण जाता है, उसे ज्ञानामृत से वह तृप्त करती है... गीता हमारी सद्गुरु रूप है, माता रूप है और हमें विश्वास रखना चाहिए कि उसकी गोद में सिर रखकर हम सही-सलामत पार हो जाएंगे.’ इसी तर्ज पर विनोबा ने मराठी में गीता माता को ‘गीता आई’ कहते हुए गीताई की रचना की.

आज हमें यदि किसी माता की चिंता करनी चाहिए तो वह संपूर्ण महिला जाति है. हम थोड़ी उनकी भी जय-जयकार कर लें. भ्रूण में मारी जा रही माताओं को बचा लें. शोषण, दुराचार और बाज़ारी वस्तुकरण की शिकार माताओं को बचा लें. अपने बेटों में यह भावना बचपन से ही डालें कि बाहर सड़क पर चल रही हर लड़की या महिला केवल भोग-संभोग की वस्तु नहीं है, बल्कि वह मातृस्वरूप है. अपनी बेटियों को भी यह सिखलाएं कि टीवी, सिनेमा, मॉडलिंग, विज्ञापन और कॉर्पोरेट समूहों द्वारा लड़कियों और महिलाओं की बनाई जा रही छवि ही उनका एकमात्र और वास्तविक स्वरूप नहीं है. पहले अपने घर-परिवार और मन को सम्हालिए. वहां की जीती-जागती माताएं बचेंगी तो ही चित्र और मूर्ति वाली भारत-माता का भी कुछ मतलब निकलेगा.