पाकिस्तान का होने के बावजूद फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आधुनिक भारतीय कविता में एक उजली प्रेरक उपस्थिति और परंपरा में रहकर क्रांति की संभावना के श्रेष्ठ उदाहरण के रूप में व्यापक रूप से मान्य रहे हैं. यह नोट करने की बात है कि दो पाकिस्तानी बड़े कवि इक़बाल और फ़ैज़ ऐसे हैं जिनके बिना आधुनिक भारतीय कविता की बात अधूरी रहती है. यह भारतीय साहित्य-परंपरा और उसकी आधुनिकता की एक विशेषता है कि उसने भौगोलिक और राष्ट्रीय हदबन्दी को हमेशा अपनी बहुलता और खुलेपन के पक्ष में अतिक्रमित किया है.

फैज़ की ज़िन्दगी की मोटी-मोटी बातें पता हैं. अपने राजनैतिक रुख़ के कारण उन्हें कई बरस विभिन्न राजनैतिक व्यवस्थाओं के अधीन पाकिस्तान की जेलों में गुज़ारने पड़े. वे विचार से साम्यवादी थे, उन्हें सोवियत संघ में प्रश्रय मिलता रहा और वे एफ्रो-एशियन साहित्य के सोवियत-पोषित अभियान की एक बड़ी और निर्णायक हस्ती थे. उनकी कविताओं को पाकिस्तान में अकसर फ़ौजी निज़ाम के प्रतिरोध के रूप में देखा-पढ़ा-गाया गया.

फ़ैज़ धार्मिक आस्था के व्यक्ति नहीं थे पर वे अनेक धार्मिक अनुष्ठानों को मूलतः सांस्कृतिक मानते थे और उनका पालन करने में उन्हें कोई संकोच नहीं था

उनकी पारिवारिकता, मानवीयता, विद्वता, विनोदप्रियता, अध्यापन, सम्पादन, संस्थाएं बनाने और चलाने की क्षमताओं, दोस्तियों, खाने-पीने में उनकी दिलचस्पियां आदि के बारे में पता लगता है उनके नाती अली मदीह हाशमी द्वारा लिखित उनकी अधिकृत जीवनी से जो कुछ समय पहले रूपा ने ‘लव एंड रिवोल्यूशन: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़’ के नाम से प्रकाशित की है. इस पुस्तक में उनकी कई तस्वीरें भी पाब्लो नेरूदा, नरगिस, सज्जाद ज़हीर, यासिर अराफ़ात, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, अटल बिहारी वाजपेयी आदि के साथ हैं.

यह जानना दिलचस्प है कि फैज की ज़िन्दगी में ऐसे कई अरसे रहे हैं जब उन्हें लगता था कि उनकी काव्यधारा सूख गयी है या सूख रही है. हर बार उनकी कविता ने उनकी ज़िन्दगी की मुश्किलों को दरकिनार कर, देर-सबेर, अपने को जीवित कर लिया. फ़ैज़ धार्मिक आस्था के व्यक्ति नहीं थे पर वे अनेक धार्मिक अनुष्ठानों को मूलतः सांस्कृतिक मानते थे और उनका पालन करने में उन्हें कोई संकोच नहीं था. सोवियत संघ वे कई बार गए और रहे. उनके रूस की कई भाषाओं में अनुवाद हुए. उन्हें लेनिन शान्ति पुरस्कार से भी नवाज़ा गया जो कि सोवियत संघ का सर्वोच्च सम्मान था.

उस दौरान सोवियत व्यवस्था में क्या हो रहा था इसका कोई ज़िक्र फ़ैज़ नहीं करते हैं. वे इतने बेख़बर तो न रहे होंगे लेकिन शायद उनकी आस्था सामने की सच्चाई से अधिक गहरी थी. जीवनीकार ने भी, दुर्भाग्य से, इस पक्ष का कोई विश्लेषण नहीं किया है. भारत में फ़ैज़ आते रहते थे और उसका सरसरी तौर पर ही ज़िक्र है. उनके यहां हुए संवादों, काव्यपाठ और उसके प्रभाव आदि का विशद वर्णन और विश्लेषण इसमें नहीं है.

कमियों के बावजूद यह एक दिलचस्प जीवनी है - एक कवि के जीवन और कविता की अदम्य संघर्षकथा. एक ऐसे कवि की जीवनी जिसने हमेशा यह याद रखा कि कविता में संघर्ष के साथ-साथ सौन्दर्य भी बहुत ज़रूरी है. जिसमें संघर्ष का सौन्दर्य और सौन्दर्य का संघर्ष हमेशा घुले-मिले रहते हैं.


शब्दवेध : शब्दों के संसार में सत्तर साल की कृतित्व-कथा

अपने निजी जीवन को सीधा सादा, सपाट और नीरस माननेवाले शब्दशास्त्री अरविंद कुमार को हम ‘माधुरी’ फ़िल्म-पत्रिका के संपादक और हिन्दी में अथक शब्दकोशकार के रूप में जानते आये हैं. निजी बलबूते पर उन्होंने दस लाख से अधिक अभिव्यक्तियों वाला हिन्दी-अंग्रेज़ी डाटाबेस गठित किया है. यह शायद संसार का सबसे बड़ा द्विभाषी डाटाबेस है जो एक साथ शब्दकोश, थिसॉरस, लघु विश्वकोष और भाषाखोजी काम करता है. 85 से ऊपर की आयु पर पहुंचे अरविंद जी ने अभी सपने देखना बंद नहीं किया है. वे विश्व की सभी भाषाओं का शब्द बैंक बनाना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार ‘हमें संसार की सभी भाषाओं तक जानेवाले सेतु अपने भारतीय दृष्टिकोण से बनाने होंगे.’

दस लाख से अधिक अभिव्यक्तियों वाला हिन्दी-अंग्रेज़ी डाटाबेस बनाने वाले अरविंद जी विश्व की सभी भाषाओं का शब्द बैंक बनाना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार ‘हमें संसार की सभी भाषाओं तक जानेवाले सेतु अपने भारतीय दृष्टिकोण से बनाने होंगे’

शब्दों के संसार में अपने सत्तर साल की कृतित्व-कथा उन्होंने ‘शब्दवेध’ नाम से प्रकाशित की है. उनकी बेटी ने, उचित ही, अपने पिता के रथ में चार पहिये बताये हैं: सपना, संकल्प, सूझबूझ और साधना. शब्द एकाग्र ऐसी चौपायी का कोई और उदाहरण में नहीं जानता. इस पुस्तक में उनके शब्दसंघर्ष की अनेक स्मरणीय छवियां हैं. मैं एक बार पहले भी यह कह चुका हूं कि हिन्दी जगत् को स्वयं उसकी शब्दसंपदा की विपुलता, समृद्धि और वितान को प्रगट करने के लिए अरविन्द कुमार का कृतज्ञ होना चाहिये.

मुझे यह ख़याल नहीं आया था कि अरविन्द जी ने अनुवाद का काम भी किया है. इस पुस्तक में जर्मन महाकवि गोएथे के महाकाव्यात्मक नाटक ‘फ़ाउस्ट’ का एक अंश शामिल किया गया है. मेरा ध्यान फ़ाउस्ट के इस कथन पर गया:

होता रहे जो होना है वहां- उस पार.

भुगत लेंगे - बाद की है वह बात.

इस धरती के सूर्य का प्रकाश ही

मिटा सकता है मेरी पीड़ा का अंधकार.

मेरे सुखों का स्रोत यही संसार.

पूरे होने दो नियति के दान.

पूरे हो जायें जब सब मेरे काम,

आये जब इस संसार को त्यागने का काल

तो नहीं जानना है मुझे क्या होना है उस पार.

ऊपर है सुखों का स्वर्ग, नीचे नारकीय पाताल-

नहीं जानना है मुझे - क्या देगा अनंत काल-

घोर घिन या असीम प्यार?

‘शेक्सपीयर के लिए हिन्द छन्द और भाषा’ एक निबन्ध भी है शब्दवेध में जिसमें शेक्सपीयर के हिन्दी अवतरण पर गहराई से विचार और भाषिक कठिनाई का विश्लेषण किया गया है. शायद पहली बार.


प्रतिरोध की कविता

बरसों से मेरी यह धारणा रही है कि लगभग सारे संसार में, बीसवीं शताब्दी की कविता प्रतिरोध की कविता भी है. यह प्रतिरोध कई दृष्टियों से होता रहा है और कोई एक दृष्टि या विचारधारा को इसका श्रेय न लेना चाहिये, न उसे दिया जा सकता है. स्वयं हिन्दी कविता को, पिछली लगभग एक अधसदी से, प्रतिरोध में रहने वाली कविता ही कहा जा सकता है. कई बार यह प्रतिरोध बहुत मुखर है, कई बार अन्तःसलिल. यह और बात है और हमारे परिवेश में फैले विचारधारात्मक आतंक का एक दुष्परिणाम है कि हम कई तरह के प्रतिरोध पहचानने की कोशिश नहीं करते.

पूर्वी यूरोप के कई देशों में, जहां साम्यवादी तानाशाही का कड़ा शिकंजा था, कवियों ने एक नये तरह का विडंबना-बोध विकसित किया था जिसमें रोज़मर्रा की घटनाओं और आम चीज़ों से प्रतिरोध का रूपक गढ़ा और रसिकों द्वारा बखूबी समझा-सराहा जाता था

यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पूर्वी यूरोप के कई देशों में, जहां साम्यवादी तानाशाही का कड़ा शिकंजा था, कवियों ने एक नये तरह का विडंबना-बोध विकसित किया था जिसमें रोज़मर्रा की घटनाओं और आम चीज़ों से प्रतिरोध का रूपक गढ़ा और रसिकों द्वारा बखूबी समझा-सराहा जाता था. पोलिश, हंगेरियन, चैक आदि कई भाषाओं की कविता में यह संभव हुआ. हमारे यहां सौभाग्य से डेढ़ेक वर्ष के संक्षिप्त अंतराल को छोड़कर लोकतंत्र रहा है ओर उसमें सत्ता के प्रतिरोध के कई रूप साहित्य और कलाओं में विकसित हुए. इस समूची अवधि को लोकतांत्रिक प्रतिरोध की गाथा के रूप में, उसकी पूरी सूक्ष्मता-जटिलता-बहुलता में पढ़ा-समझा जाना चाहिये.

कुछ कवितांश याद आते हैं :

निर्धन जनता का शोषण है/कह कर आप हंसे/लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/कह कर आप हंसे/ सब के सब हैं भ्रष्टाचारी/ कह कर आप हंसे/ चारों ओर बड़ी लाचारी/कह कर आप हंसे/कितने आप सुरक्षित होंगे/मैं सोचने लगा/सहसा मुझे अकेला पाकर/फिर से आप हंसें. - रघुवीर सहाय.

‘कहो तो डरो कि हाय यह क्यों कह दिया/न हो तो डरो कि पूछेंगे चुप क्यों हो/सुनो तो डरो कि अपना कान क्यों दिया/न सुनो तो डरो कि सुनना लाज़िमी तो नहीं था/... पढ़ो तो डरो कि पीछे से झांकने वाला कौन है/न पढ़ो तो डरो कि तलाशेंगे कि क्या पढ़ते हो... डरो तो डरो कि कहेंगे डर किस बात का है/न डरो तो डरो कि हुकुम होगा कि डर’- विष्णु खरे.

‘महाजन्! आपके साथ चलने के लिए/ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं क़दमों के निशां! कोई पगडंडी भी तो नहीं/जो खिंची हो कभी आपके पांवों से/सिर्फ़ ढंक रहा है धरती को/आपकी परछाईयों का अंधेरा/महाजन. इस अंधे उजाले में/आपके साथ चलें तो कैसे? हम तो बस धूप में खिले हुए/छोटे से रूप हैं/छोटे से नाम हैं/महाजन! आप जिस पंथ से जा रहे हैं/वह हमारा नहीं- ध्रुव शुक्ल

‘एक अंधेरा कोना/एक ज़रा सी फुर्ती/डेढ़ औंस का ढला हुआ सीसा/किसी कवि, किसी संन्यासी, किसी सूफ़ी, किसी मुंहफट जोकर/किसी विरोधी को राजधानी की सड़क पर सदा के लिए/चुप और ठंडा करने के लिए/ सबसे संक्षिप्त और सबसे सरल है/सबसे लंबी और जटिल प्रक्रिया में बनी/चीज़ों को ख़त्म करना.’ उदय प्रकाश.

ये सभी कविताएं बहुत पहले लिखी गयी थीं.