महर्षि पतञ्जलि ने अपने योगसूत्र के प्रथम सूत्र में कहा है - अथ योगानुशासनम्. इसी तरह अशोक ने अपने शिलालेखों में जगह-जगह पर लिखवाया है - धर्मानुशासनम्. और बुद्धवाणी में तो यहां तक कह दिया गया - एतं बुद्धानुसासनम्. ये तीनों उक्तियां क्रमश: योग, धर्म और बुद्ध के अनुशासन या नियम-कायदों को सबसे ऊपर दर्जा देने के लिए कही गई हैं. यहां जिस अनुशासन की बात की गई है वह किसी शासक के शासन से भी ऊपर होता है क्योंकि शासक भी इससे बंधा होता है. यह अनुशासन आचार्य या पथप्रदर्शक का अनुशासन होता है जिसपर जिंदगीभर चलना होता है.

और ये आचार्य कौन हो सकते हैं या होते हैं? इनके बारे में स्वयं आचार्य कहे जानेवाले विनोबा ने गुरुनानक के हवाले से कहा है – ‘... आचार्य होते हैं, जिनका वर्णन मैंने किया है गुरु नानक की भाषा में – निर्भय, निर्वैर और उसमें मैंने जोड़ दिया है निष्पक्ष! और जो कभी अशांत नहीं होते, जिनके मन में क्षोभ कभी नहीं होता. हर बात में शांति से सोचते हैं और जितना सर्वसम्मत होता है विचार, उतना लोगों के सामने रखते हैं.’

भारत में जो योगविद्या विकसित हुई उसकी बुनियाद में उसका अपना एक स्वतंत्र अनुशासन था. किसी राज्याश्रय या प्रचार का उसमें कोई विशेष योगदान नहीं रहा

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए विनोबा कहते हैं कि इन आचार्यों के मार्गदर्शन में लोग चलेंगे तो सबका भला होगा और दुनिया में शांति रहेगी. इसी को वे अनुशासन बताते हुए कहते हैं, ‘ इस अनुशासन का अर्थ है – आचार्यों का अनुशासन!.’

भारत में जो योगविद्या विकसित हुई उसकी बुनियाद यही अनुशासन था. उसका विकास किसी शासक के शासन के अंतर्गत नहीं हुआ. किसी राज्याश्रय या प्रचार का उसमें कोई विशेष योगदान नहीं रहा. वह ऋषियों और साधकों की अपनी अनुभूतियों से पैदा हुई थी. चाहे वे शिव हों, कृष्ण हों, बुद्ध हों या महावीर, इन सबको अपने ‘देवत्व’ की प्राप्ति भी स्वतंत्र रूप से अपनी-अपनी योग साधना से हुई थी. ‘सिद्धियां’ और ‘कैवल्य’ प्राप्त कर चुके साधकों को ‘स्वामी’ और ‘महाराज’ कहने का चलन भी उनके इसी स्वतंत्र अनुशासन की वजह से शुरू हुआ.

लेकिन समय बदला और अध्यात्म-विज्ञान के साधकों की गुणवत्ता में गिरावट आती गई. आज जो चाहे स्वयं को ‘आचार्य’ कहने लगता है. ‘योगी’, ‘स्वामी’ और ‘महाराज’ का नाम धरा बैठता है. इन नामधारी आचार्यों और योगियों को श्रद्धा से पूजने वाला समाज भी इनकी देखा-देखी पथभ्रष्ट हो जाता है. राजनीतिक दल और सरकारें ऐसे ही श्रद्धेयों के प्रति लोगों की अंधश्रद्धा का बेजा फायदा उठा ले जाते हैं. अब तो इसमें व्यावसायी भी शामिल हो गए हैं.

इसलिए आज योग जहां एक व्यवसाय है, वहीं यह राजनीति का अखाड़ा भी बन चुका है. इसका स्वतंत्र अनुशासन आज खतरे में है. यह किसी सरकारी विभाग और मंत्री के चंगुल में जा फंसा है. कहीं कोई विशेष संप्रदायवादी राजनीतिक दल और सांप्रदायिक संगठन इसे अपनी सत्ता और अहंकार तुष्टि का साधन बना रहा है तो दूसरी ओर इसे एक ठेठ व्यावसायिक ‘पाठ्यक्रम’ और ‘अभ्यासक्रम’ के दायरे में लाकर और लोभ-लाभ दिखाकर विद्यार्थियों से लाखों रुपये की फीस भी वसूली जा रही है.

जैसे ही योग को अप्रत्यक्ष रूप से भी ‘हिन्दू योग’ बनाने की कोशिश की जाती है, तो प्रतिक्रिया में ‘बौद्ध योग’ और ‘जैन योग’ से लेकर ‘क्रिश्चियन योगा’ तक उभरने लगने लगते हैं

योग को एक उत्पाद बनाकर जहां कोई योगी किसी व्यवसायी का रुतबा अपना रहा है, वहीं कोई व्यवसायी भी रातोंरात स्वयं को योगी के चोले में उतारकर हजारों करोड़ का मुनाफा और प्रतिष्ठा कमा लेना चाहता है. सरकारों, नेताओं, व्यवसायियों और छद्म योगियों द्वारा प्रचारित योग का यही स्वरूप मुख्यधारा का योग बनता जा रहा है. आज ऐसे निर्भय, निर्वैर और निष्पक्ष आचार्यों का घोर अभाव हो चला है, जो यह कह सकें कि योग का शुद्ध और मौलिक स्वरूप यह कहीं से भी है ही नहीं.

जैसे ही योग को अप्रत्यक्ष रूप से भी ‘हिन्दू योग’ बनाने की कोशिश की जाती है, तो प्रतिक्रिया में ‘बौद्ध योग’ और ‘जैन योग’ से लेकर ‘क्रिश्चियन योगा’ तक उभरने लगने लगते हैं. अभी हाल में ‘सेक्युलर योगा’ जैसा एक प्रतिक्रियावादी राजनीतिक विचार भी पनपा है.

क्या हम विपश्यना को ‘बौद्ध योग’ कह सकते हैं? क्या प्रेक्षा-ध्यान को ‘जैन योग’ कहना आध्यात्मिक या वैज्ञानिक नजरिए से ठीक होगा? और क्या स्वयं को बार-बार और सप्रयास प्रचलित अर्थों वाला ‘सेक्युलर’ और ‘प्रोग्रेसिव’ साबित करने के चक्कर में पड़ा मनुष्य शुद्ध चित्त से योग साधना में उतर सकता है? यह सब सोचने के विषय हैं. एक बात और भी सोचने की है. वह यह कि क्या मूसा, मुहम्मद पैगंबर, जलालुद्दीन रूमी और शेख सादी योगी नहीं थे? क्या ईसा, जॉन द बैप्टिस्ट और सेन्ट फ्रांसिस ऑफ असिसी योगी नहीं थे? क्या सुकरात और जरथुस्ट्र योगी नहीं थे? क्या लाओत्से और कन्फ्यूशियस योगी नहीं थे?

योग के मूल स्वरूप के हिसाब से क्या मूसा, मुहम्मद पैगंबर, जलालुद्दीन रूमी और शेख सादी योगी नहीं थे? क्या ईसा, जॉन द बैप्टिस्ट और सेन्ट फ्रांसिस ऑफ असिसी योगी नहीं थे? 

इस तरह जैसे ही योग को व्यापक अर्थों में समझा जाता है, वैसे ही वह भारत की विद्या के साथ-साथ पूरे जगत की विद्या बन जाता है. सत्पुरुषों और सन्नारियों ने दुनिया के जिस भी कोने में मुक्ति और शान्ति का रहस्य जानने की साधना की, उन सबको अपनी-अपनी तरह से यौगिक अनुभव हुए. थोड़ी-बहुत ऊपरी भिन्नताओं के बावज़ूद मौलिक रूप से सबको एक ही दर्शन हुआ. इसलिए इनके उपदेशों में और इनके कार्यों में एक अद्भुत समानता देखने को मिलती है. सबने जीवन को सम्पूर्णता में देखने की दृष्टि और अनुशासन विकसित करने का प्रयास किया. सत्य, प्रेम, जीवदया, शान्ति, त्याग, संयम और आत्मदर्शन का संदेश सबके जीवनोपदेशों में देखने को मिलता है. सबने आहार-विहार, चिंतन और व्यवहार के कुछ आधारभूत नियम बनाए. ऐसे नियम जो राजा और रंक सबपर समान रूप से लागू होते हों. ये नियम सौ टका शुद्ध अनुभवजन्य, सार्वजनीन और सार्वकालिक थे. इसलिए हम इन्हें ‘विज्ञानसम्मत’ भी कहते हैं.

लेकिन जैसे ही इनके कथित ‘अनुयायी’ पूजा-उपासना और रहन-सहन के तौर-तरीकों और सामाजिक-सांस्कृतिक नियम-कायदों के स्तर पर ऊपरी भिन्नताओं के चक्कर में पड़ते हैं असल योग और जीवन-धर्म पीछे छूटने लगता है. पंथीय अहंकार लोगों में घर करने लगता है और वे लड़ने-लड़ाने का बहाना ढूंढ़ते लगते हैं. योगानुशासन की सारी मर्यादाएं टूटने लगती हैं. इस बीच व्यवसाय, राजनीति और दूसरे सामाजिक क्षेत्रों में इनके प्रतिनिधि भी तैयार हो जाते हैं. इनके मुंह से केवल प्रतिक्रियावादी राजनीति के अशोभनीय वक्तव्य निकलने शुरू हो जाते हैं. राजनीतिक दलबंदी में पड़े ऐसे योगी भला ‘स्थितप्रज्ञ’ क्या होंगे. वे स्वयं तो ‘राग-द्वेष’ की आग में जलते ही रहते हैं, इनके पीछे-पीछे इनका अनुयायी समाज भी इसी आग में झोंका चला जाता है.

आज जब दुनिया पूरी तरह से प्रचंड भोगवाद की चपेट में है तो स्वाभाविक रूप से योग को भी केवल सुखवादी और उपयोगितावादी नजरिए से देखा जा रहा है. योग के नाम पर आज भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी जो कुछ भी हो रहा है, वह यही है - फलां आसन से फलां बीमारी ठीक कर लो. फलां ध्यान से फलां रोग ठीक कर लो. अमुक प्राणायाम से अमुक रोग का इलाज कर लो. कुछ लोग वजन घटाने के लिए योग किए जा रहे हैं, तो कुछ अन्य लोग भूख बढ़ाने और कब्ज से निजात पाने के लिए. कुछ तो अपनी व्यावसायिक जरूरतों के हिसाब से अपना शारीरिक सौष्ठव और बाहरी सौंदर्य निखारने के लिए योग कर रहे हैं. और कुछ अपनी ‘मर्दाना पावर’ बढ़ाने तक के लिए कथित योग कर रहे हैं.

आज जब दुनिया पूरी तरह से प्रचंड भोगवाद की चपेट में है तो स्वाभाविक रूप से योग को भी केवल सुखवादी और उपयोगितावादी नजरिए से देखा जा रहा है

ऐसे में जब कोई पार्टी, सरकार या कोई अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक संस्था ‘योग’ का ठेका लेकर बैठ जाए तो इसका क्या हश्र होगा यह सहज ही समझा जा सकता है. वह तो स्वाभाविक ही ऐसे ‘प्रोटोकॉल’ छापना शुरू करेगी जिसमें मार्केटिंग के लहजे में लिखा मिलेगा कि किस आसन से किस शारीरिक रोग का निदान होगा. योग को महज रोगनिदान का नुस्खा बना देने का यही लोकप्रियतावादी दृष्टिकोण न केवल हमारी सरकार पर हावी होता है, बल्कि कथित योगी भी इसे इसी रूप में प्रचारित करने और बेचने पर आमादा हो जाते हैं. इसलिए योग स्वतंत्र जीवन-साधना या आत्म-साधना का विषय नहीं रह जाता. वह निर्भयी, निर्वैर और निष्पक्ष आचार्यों का अनुशासन नहीं रह जाता. वह तो किन्हीं प्रोफेशनल ‘योग-प्रशिक्षकों’ और कथित ‘योग-विशेषज्ञों’ का मॉड्यूल और पैकेज बन जाता है.

वर्तमान समय में सरकारों या शासन की वृत्ति ही ऐसी हो चली है कि वह कभी भी वास्तविक ‘योगानुरागी’ नहीं हो पाती. वह शुद्ध अर्थों में ‘धर्मानुरागी’ नहीं हो पाती. शायद राजनीति का मौलिक चरित्र ही ऐसा है. आज के ज्यादातर नेता, मंत्री और अधिकारी से लेकर सामान्य कर्मचारी तक भयंकर रजोगुण के शिकार दिखाई देते हैं. रजोगुण की एक बड़ी पहचान के रूप में सत्ता और अधिकार के अहंकार का नशा उनपर छाया रहता है. यह दिखावा वास्तव में इनकी अपनी आंतरिक आत्महीनता और असुरक्षा का परिचायक भी होता है.

सत्ता और शासन के ये प्रतिनिधि चरित्र एक खास प्रकार की जीवनचर्या के अभ्यस्त हो चुके लगते हैं. जनसामान्य भी इनकी देखा-देखी करते हैं. यदि हमारे जीवन में शुद्ध योग का न्यूनतम समावेश भी हुआ होता तो मंत्री से लेकर संतरी तक के जीवन और व्यवहार में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिला होता. जबकि ऐसा नहीं हुआ. आज संसद से लेकर न्यायालय तक और प्रशासन से लेकर मीडिया तक लोकतंत्र के स्तंभ रोगग्रस्त हैं. अब इनके लिए जिम्मेदार सरकारें और पार्टियां जब योग जैसे शुद्ध विज्ञान और पूर्ण मुक्तिकारी आत्मज्ञान का सरकारीकरण करेंगी तो उसकी पवित्रता और मौलिकता नष्ट ही होगी न?

यदि हमारे जीवन में शुद्ध योग का न्यूनतम समावेश भी हुआ होता तो मंत्री से लेकर संतरी तक के जीवन और व्यवहार में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिला होता

और ऐसे भारत की सरकार अपने अर्थों वाले योग को अपने तरीके से प्रचारित करने का दम्भ क्यों भरे? क्या योग की सफलता की कसौटी यह होगी कि कितने देशों की सरकारों ने उसके मौजूदा स्वरूप में उसे आधिकारिक मान्यता दे दी? या केवल इसलिए कि किसी सार्वदेशीय राजनीतिक संस्था ने साल में एक दिवस उसके मनाने के लिए मुकर्रर कर दिया? ऐसा हुआ तो अच्छा है. लेकिन यह योगमात्र पर उपकार का विषय नहीं है. ऐसा अतिसरलीकरण या सतहीकरण इस विद्या को चौपट भी कर सकता है. योगगुरू श्रीकृष्ण ने गीता में ठीक ही कहा कि ‘त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा’ - यानी जिसपर जिस प्रकार का गुण हावी होता है उसकी श्रद्धा भी उसी प्रकार की ही होती है. इसलिए योग के प्रति या योग के प्रचलित स्वरूप के प्रति जो अतिरिक्त श्रद्धा पैदा हो रही है या पैदा की जा रही है, उसे सावधानी से देखने की जरूरत है. वह किन लोगों द्वारा और किस रूप में की जा रही है, उसके प्रति सतर्क रहना होगा.

एक और बात हो रही है. हमारी नई नस्लों को एक खास प्रकार के मानकीकृत योग से परिचित कराया जा रहा है. सरकारें इसे पाठ्यक्रम में लाएंगी. लेकिन योग-शिक्षण की रूपरेखा तय करना वास्तव में किसी सरकार या उसके शिक्षामंत्री के वश की बात ही नहीं है. उनमें वह योग्यता ही नहीं है. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सरकारी फायदा उठाने वाले इनके सलाहकार योगाचार्यों में भी वह योग्यता बची नहीं. फिर इसका शिक्षण ‘फिजीकल एजुकेशन’ की तरह के किसी शिक्षक द्वारा करवा दिया जाना भी उचित नहीं है.

प्रचलित सर्टिफिकेशन के जरिए लोग धड़ल्ले से थोक के भाव ‘योग-प्रशिक्षक’ बन रहे हैं. इनमें से ज्यादातर प्रशिक्षक लोग ‘योग-प्रशिक्षु’ बनने तक की नैष्ठिक और चारित्रिक योग्यता नहीं रखते. इसलिए यह काम किसी सरकारी मंत्री और सरकारी शिक्षक-प्रशिक्षक से संभव नहीं. यह काम सिद्ध आचार्यों का है. वास्तविक योगियों और बुद्धों का है. संतों और फकीरों का है. सरकारी प्रयासों से हमारी नई पीढ़ियों को जिस योग और जिस अनुशासन में ढालने की कोशिश होगी, उसके सार्थक होने की बहुत कम गुंजाइश है.

विनोबा ने तो किसी भी शिक्षा के सरकारीकरण के खतरों के प्रति नई पीढ़ियों को चेताते हुए कहा था – ‘श्रद्धा से ज्ञान का आरम्भ होता है और समाप्ति स्वतंत्र-चिन्तन से होती है. इसलिए विद्यार्थियों को चिन्तन-स्वातंत्र्य का अपना अधिकार कभी नहीं खोना चाहिए. ...इन दिनों डिसिप्लिन-अनुशासन के नाम पर विद्यार्थियों के दिमागों को यंत्रों में ढालने की कोशिश हो रही है. मैं अनुशासन में विश्वास करता हूं और यह भी जानता हूं कि अनुशासन के बिना काम नहीं बनेगा... लेकिन आज अनुशासन के नाम पर सब जगह यंत्रीकरण हो रहा है और विद्यार्थियों के दिमागों पर बहुत बड़ा प्रहार हो रहा है. इसलिए शिक्षा का विभाग शासन से मुक्त होना चाहिए. ...आज तक हर हुकूमत (स्टेट) की यह कोशिश रही है कि बने-बनाए विचार विद्यार्थियों के दिमाग में ठूंस दिये जाएं चाहे वह स्टेट सोशलिस्ट (समाजवादी) हो, कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) हो, कम्यूनलिस्ट (सांप्रदायिकतावादी) हो या और भी कोई इष्ट या अनिष्ट हो. ...आपको संत बनना है, पंथ नहीं बनना है. संत वह है जो सत्य का उपासक होता है और पंथ वह है जो किसी बने-बनाये रास्ते पर जड़वत् चलता है.’

राजनीति का आध्यात्मीकरण या वैज्ञानीकरण हो वह अच्छा है लेकिन प्राकृतिक विज्ञान और अध्यात्म-विज्ञान का राजनीतिकरण ठीक नहीं होगा

राजनीति का आध्यात्मीकरण या वैज्ञानीकरण हो वह अच्छा है लेकिन, प्राकृतिक विज्ञान और अध्यात्म-विज्ञान का राजनीतिकरण ठीक नहीं होगा. गौतम बुद्ध और वर्द्धमान महावीर तो राजघराने से ही हुए. लाओत्से और कन्फ्यूशियस राजाओं के मंत्री और सलाहकार हुए. लेकिन योग को जानने-समझने और बताने के लिए उन्होंने इसके सरकारीकरण की कोशिश नहीं की. जिन शासकों ने इसके सरकारीकरण का प्रयास भी किया वहां समाज पर इसका वांछित असर दिखाई देने के बजाए इसका उल्टा असर ही हुआ. बौद्ध राजाओं के आपसी युद्ध और पश्चिमी समाजों में क्रूसेड के रूप में वह सामने आया.

योग को सभी अवतारों, पैगंबरों, बुद्धों और आचार्यों ने अलग-अलग अनुभवों से समझा. लेकिन समझा एक ही सत्य को. इसलिए हमारी सुविधा के लिए इसके अलग-अलग नाम और रूप भी हों तो ठीक है. योग और योगा के रूप में इसकी ‘ब्रैंडिंग’ और मानकीकरण का प्रयास ठीक नहीं है. साइंसदां इसे आज ‘कॉग्निटिव साइंस’ के दायरे में समझना चाहते हैं. लेकिन उन्हें भी महज मनोविज्ञान और मस्तिष्क विज्ञान के धरातल से ऊपर उठना होगा. योग तो मन के क्षय की बात करता है. और एक स्तर के बाद तो मानव शरीर या मस्तिष्क भी उसका विषय नहीं रह जाता. तो फिर पार्टीगत सरकारें या राजनीतिक पार्टियां तो इसे हड़पने से दूर ही रहें. योगविद्या ‘भारत की विद्या होने तक ठीक भी हो, लेकिन इसे ‘भारत सरकार की विद्या’ तो हरगिज न बनाएं!