मुक्केबाज़ी मेरे जैसे कुछ लोगों की निगाह में एक बर्बर खेल ही है. जूडो-कराटे, कुंगफू और कुछ हद तक कुश्ती भी इसी श्रेणी में आते हैं. लेकिन यह सोच कर कुछ अचरज होता है कि हमारे बचपन के कई नायक इन्हीं विधाओं से निकले. मोहम्मद अली, दारा सिंह और ब्रूस ली में हमने कभी अंतर नहीं किया. शायद एक छोटे से शहर के, मध्यवर्गीय मुहल्ले वाले असुरक्षित बचपन में अपने बहादुर होने की, सबको मार गिराने की, कामना हम सबके भीतर इतनी प्रबल थी कि हम किसी तरह से दारा सिंह, मोहम्मद अली या ब्रूस ली हो जाना चाहते थे.

अब अचरज यह सोच कर भी होता है कि जब सूचना प्रौद्योगिकी हमारी दुनिया से कोसों नहीं युगों दूर थी और टीवी तो दूर, घरों में सुबह अख़बार तक आया नहीं करते थे, तब भी हम तक इन नायकों की सारी सूचनाएं कैसे पहुंच जाती थीं. इस सूची में चाहें तो पेले और ध्यानचंद को भी जोड़ सकते हैं, ब्रैडमैन और ट्रंपर को भी, जेसी ओवंस और पावो नुरमी को भी और जीवितों में गावस्कर और ब्योन बोर्ग को भी.

जहां मोहम्मद अली और पेले मुक्केबाज़ी और फुटबॉल में अपनी तरह का अश्वेत आंदोलन रहे वहीं, ध्यानचंद और जेसी ओवंस ने बर्लिन ओलंपिक में हिटलर का गुरूर तोड़ा

जाहिर है, वह एक सरल दुनिया थी जो अपनी कल्पनाओं से अपने नायक बनाती थी इनमें से हमने किसी को खेलते नहीं देखा. जब तक टीवी आया, तब तक हम कॉलेज में पहुंच चुके थे. टीवी पर बेशक गावसकर को देखा और कभी बरसों बाद ब्योन बोर्ग और मैकनरो के मुकाबले के फुटेज किसी चैनल पर चलता देख मैं रोमांचित हुआ था.

बहरहाल, वह कौन सी चीज़ थी जो इन लोगों को हमारा नायक बनाती रही? पहला और सीधा जवाब तो यही है कि इनका कौशल, जो इन्हें अपनी-अपनी विधाओं के बेहतरीन नुमाइंदों में बदलता रहा, उन्हें अपने खेल का ही नहीं, मानवीय श्रेष्ठता का पर्याय भी बनाता रहा. हमारे लिए यह बात मायने नहीं रखती थी - शायद इसका भान भी न रहा हो - कि इसमें कौन सा खिलाड़ी किस देश का है. बेशक उसका भारतीय होना हमारे लिए अतिरिक्त गौरव की बात हुआ करता था.

लेकिन क्या यह वाकई श्रेष्ठता को समर्पित इतनी निर्वात मानवीयता थी? तब हमारे भीतर इतना स्पष्ट नहीं था, लेकिन अब साफ़ है कि इन सबमें कुछ ऐसा था जो वर्चस्ववाद की राजनीति को और श्रेष्ठतावाद के पूर्वग्रहों को भी किसी न किसी स्तर पर झटका देता था. मोहम्मद अली, पेले, जेसी ओवंस, दारा सिंह और ब्रूस ली तक - क्या इत्तिफाक है कि ये यूरोपियन या गोरे नायक नहीं हैं.

मोहम्मद अली और पेले मुक्केबाज़ी और फुटबॉल में अपनी तरह का अश्वेत आंदोलन रहे. ध्यानचंद और जेसी ओवंस ने बर्लिन ओलंपिक में हिटलर का गुरूर तोड़ा. गावस्कर ने बिना हेलमेट पहने लेन हटन और ज्यॉफ बायकॉट जैसे नामी अंग्रेज सलामी बल्लेबाज़ों को पीछे छोड़ते हुए और दुनिया भर के तेज़ गेंदबाज़ों का अपनी ठोस तकनीक और एकाग्रता से सामना करते हुए अपनी अलग जगह बनाई. पावो नुरमी एक बढ़ई का बेटा था और पिता के गुज़र जाने के बाद भयानक संघर्ष करता हुआ अंतरराष्ट्रीय स्तर का दौड़ाक बना. जाहिर है, यह श्रेष्ठता नहीं, मनुष्यता थी जो कई लोगों के लिए नायकत्व की एक कसौटी थी.

कई बार लगता है कि वे अपने विरोधियों से ज़्यादा अपने अतीत से लड़ते रहे. इसीलिए उन्होंने सोनी लिस्टन को हरा कर विश्व चैंपियनशिप जीतने के बाद अपने पुराने नाम - कैसियस क्ले - से मुक्ति पाई और मोहम्मद अली बन गये

हालांकि इन तमाम नायकों में मोहम्मद अली कुछ अलग थे. मुक्केबाज़ी के खेल के अलावा बड़बोलापन उनका दूसरा गुण था. मुक्केबाज़ी के पहले वे अपने प्रेस सम्मेलनों में विरोधियों को ध्वस्त करते - किसी को भालू बताते, किसी को गुरिल्ला और ख़ुद को कभी घड़ियाल और कभी अंकल टॉम. बताते हैं कि उनका रक्तचाप भी मुक्केबाज़ी से पहले दुगुना हो जाया करता था.

कायदे से ये वे चीज़ें हैं जिनसे किसी समझदार आदमी को नाक-भौं सिकोड़नी चाहिए. लेकिन मोहम्मद अली की इन सारी आदतों पर शायद वह सच्चाई भारी थी जिससे लड़ते हुए वे अपने मुकाम तक पहुंचे थे. दरअसल कई बार लगता है कि वे अपने विरोधियों से ज़्यादा अपने अतीत से लड़ते रहे. सोनी लिस्टन को हरा कर विश्व चैंपियनशिप जीतने के बाद उन्होंने पहला काम यह किया कि अपने पुराने नाम - कैसियस क्ले - से मुक्ति पाई और मोहम्मद अली बन गये. उन्होंने कहा कि वह नाम उनकी गुलामी की याद है.

आने वाले वर्षों में अपनी चमड़ी का रंग उन्हें याद रहा और वियतनाम युद्ध में अमेरिकी फौज की ओर से शामिल होने से उन्होंने इनकार किया. उन्होंने कहा कि जो लोग उन्हें नीग्रो कहते हैं, वे अब चाह रहे हैं कि वे अश्वेत लोगों से लड़ें. आने वाले वर्षों में अली लगातार जैसे सूफियत की ओर ढलते चले गये. यह नजर आता है कि मुक्केबाज़ी के रिंग में वे चाहे जितना आक्रामक रहे हों, लेकिन जीवन में उन्होंने विनम्रता और अदब का साथ नहीं छोड़ा. ऐसे में ही लगता है कि उनका बड़बोलापन दरअसल उस दुनिया से उनका प्रतिशोध था जो उनकी पृष्ठभूमि की वजह से उन्हें सम्मान देने को तैयार नहीं थी. मोहम्मद अली ख़ुद को महानतम कहते रहे क्योंकि उन्हें लगा कि यह एक ऐसी दुनिया है जिसकी आंख में उंगली डालकर ही वह अपना वजूद साबित कर सकते हैं.

माथे पर मुक्के की जो चोटें झेल कर अली ने अपनी हैसियत बनाई, कहते हैं कि इन्हीं से उन्हें पार्किंसन - स्मृतिलोप की बीमारी - मिली.  कहना गलत न होगा कि अपने अच्छे दिनों में उन्होंने स्मृति की यंत्रणा झेली, और बाद में स्मृतिलोप की.

नहीं, यह कैसियस क्ले उर्फ मोहम्मद अली को दिया जा रहा कोई चरित्र प्रमाण पत्र नहीं है. सितारों के जीवन में अपनी तरह की विडंबनाएं होती हैं जो कई बार उनके व्यक्तित्वों के अंतर्विरोध से ही पैदा होती हैं. ये विडंबनाएं सिर्फ मोहम्मद अली में नहीं, उन तमाम नायकों में रही होंगी जिनके बीच हमारा बचपन समृद्ध होता रहा.

बहरहाल, मोहम्मद अली हमारे लिए एक जीवित व्यक्ति से ज्यादा एक किंवदंती रहे. शायद यह भी एक वजह है कि जब वे अपनी जीवन-संध्या की ओर जा रहे थे तो हम सब उनसे बेख़बर थे. माथे पर मुक्के की जो चोटें झेल कर उन्होंने अपनी हैसियत बनाई, उन्हीं से कहते हैं कि उन्हें पार्किंसन - स्मृतिलोप की बीमारी - मिली. अपने अच्छे दिनों में अली ने स्मृति की यंत्रणा झेली, और बाद में स्मृतिलोप की.

वैसे यह शायद हम सबकी नियति है. मौत किसी को नहीं छोड़ती, मोहम्मद अली को भी नहीं. वह सबके दस्ताने उतरवा लेती है, बड़े-बड़े नायक बूढ़े होते जाते है, अशक्त और बीमार होते जाते हैं और एक दिन चले जाते हैं लेकिन ज़िंदगी का जादू फिर भी बचा रहता है. हम जैसे लोगों की स्मृति में जो अपने नायक को उसके बेहतरीन दिनों की चमक और रोशनी में बार-बार याद करते हैं और जीते हैं. मोहम्मद अली भी बचा रहेगा.