दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी का पहला सत्याग्रही ही कमजोर साबित हुआ था. इसकी कहानी बड़ी दिलचस्प है. रामसुंदर पण्डित नाम के ये सत्याग्रही जर्मिस्टन शहर के एक मंदिर में पुरोहित थे. इस ब्रिटिश उपनिवेश में रहने के लिए जरूरी अनुमति-पत्र की मियाद खतम होने के बाद उन्होंने कानून की अवज्ञा कर अपनी गिरफ्तारी देने का फैसला किया था. ऐसा करने वाले वे पहले व्यक्ति थे. गांधीजी ने अपने अखबार ‘इण्डियन ओपिनियन’ में बार-बार उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की. उन्होंने अदालत में उनकी पैरवी भी की थी.

रामसुंदर पण्डित रातोंरात दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समाज के हीरो बन चुके थे. भारतीय प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके पण्डित जी ने एक महीने की अंतरिम जेल प्रवास के दौरान गांधीजी के मार्फत भारतीयों को संदेश दिया था – ‘यदि सरकार इससे भी कड़ी सजा देती तो अधिक अच्छा होता. छूटने के बाद मैं समाज के लिए फिर से जेल में जाने को तैयार हूं. मैं यहां अपने आप को महल में बैठा हुआ मानता हूं. चाहता इतना ही हूं कि कोई भी भारतीय इस कानून को स्वीकार न करे.’

लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने महात्मा गांधी जैसों को भी हिलाकर रख दिया. एक महीने की अंतरिम जेल के बाद जब रामसुंदर बीच में रिहा हुए तो दोबारा गिरफ्तारी के डर से जर्मिस्टन छोड़कर ही चले गए. ठगा सा महसूस कर रहे गांधीजी ने पण्डितजी की प्रशंसा में पढ़े गए कसीदों के लिए सार्वजनिक माफी मांगते हुए चार जनवरी, 1908 को संभवतः अपने जीवने के सबसे कटु शब्दों में लिखा – ‘रामसुन्दर अब ‘पण्डित’ नहीं रहा. हमने रामसुंदर को इस अखबार में बड़ा सम्मान दिया. उसके लिए हमने आदर भरे शब्दों का इस्तेमाल किया. ...इसके लिए हम अपने पाठकों से क्षमा चाहते हैं. वह हमारी गलतफहमी थी. ...वह जेल के डर से हीन और कायर बनकर जर्मिस्टन की अपनी जमात को, कौम को, स्वयं अपने को और अपने कुटुंब को धोखा देकर भाग गया है. हमने उसके लिए कटु शब्दों का प्रयोग किया है, लेकिन हमारी भावना दयापूर्ण है. यदि उसके गुण न गाये होते, तो उसके दोष का भी ऐलान करने की ज़रूरत न पड़ती. ...बच्चों को जैसे हम ‘भूत’ कहकर डराते हैं वैसे ही रामसुंदर रूपी भूत का खयाल करके हमें सावधान रहना है कि वह भूत हमसे न चिपटे.’

बाद में अफ्रीका और भारत सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में भी कई सच्चे सत्याग्रही हुए. उन्होंने सत्याग्रह का सफल प्रयोग करके दिखाया. 25 वर्ष तक विनोबा को अपने सान्निध्य में देख-परख कर गांधीजी ने 1940 में उन्हें ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई’ के लिए अकेला प्रतिनिधि सत्याग्रही घोषित किया था. और अपने इस चुनाव में उन्होंने धोखा नहीं खाया. मार्टिन लूथर किंग जूनियर जैसे सत्याग्रहियों के नाम तुरंत ही हमारे जेहन में आ जाते हैं.

लेकिन कई प्रकार के सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों का समाधान तलाश रहा आज का भारतीय समाज ‘सत्याग्रह’ का सच्चा प्रयोग कर पाने में अक्सर पूरी तरह विफल रहता है. कारण यही है कि हम शायद ‘सत्याग्रह’ के वास्तविक मर्म को ठीक से सीख-समझ ही नहीं पाए हैं. और यदि समझते भी हैं तो हम इसके लिए जरूरी सत्यनिष्ठा, अहिंसाभाव, निर्भयता, निर्वैरता और नैतिक आत्मबल हासिल ही नहीं कर पाते हैं. हमने इसे व्यावहारिक रूप से असंभव मान लिया है. एक तरफ तो हम बात-बात में कहते हैं कि गांधी एक ही हुआ था, और दूसरा नहीं हो सकता. दूसरी तरफ हम अपने संकीर्ण राजनीतिक प्रदर्शनों को भी ‘सत्याग्रह’ का नाम भी दे बैठते हैं. ऐसा क्यों हो रहा है यह हमें समझना होगा.

गांधी का ‘सत्याग्रह’

1907-08 के दौरान गांधीजी ‘पैसिव रेजिस्टेन्स’ या निष्क्रिय प्रतिरोध के लिए एक गुजराती शब्द ढूंढ़ रहे थे. उन्होंने अपने अखबार के पाठकों से भी इस पर राय मांगी. किसी पाठक ने इसके लिए ‘सदाग्रह’ शब्द का सुझाव लिख भेजा. गांधीजी को यह शब्द अच्छा लगा और इसे और अधिक लोकसम्मत बनाने के विचार से उन्होंने इसे ‘सत्याग्रह’ कर दिया. सैद्धांतिक तौर पर भी वह ‘सत्याग्रह’ को निष्क्रिय प्रतिरोध से कुछ अधिक मानते थे. सत्याग्रह कोई राजनीतिक या रणनीतिक हथियार नहीं था. वह विशुद्ध नैतिक बल पर आधारित था. मन, वचन और कर्म की पूर्ण अहिंसा उसकी सबसे बड़ी कसौटी थी. वह कमजोरों का नहीं वीरों का हथियार था. वह नकारात्मक नहीं, रचनात्मक था.

इसे स्पष्ट करते हुए 15 अप्रैल, 1933 के ‘हरिजन’ में महात्मा गांधी लिखते हैं- ‘सत्याग्रह शब्द का उपयोग अकसर बिना सोचे-विचारे ही कर लिया जाता है, और उसमें छिपी हुई हिंसा का भी समावेश रहता है. पर इस ‘सत्याग्रह’ शब्द के निर्माता की हैसियत से मैं यह कहना चाहूंगा कि इसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष, गुप्त या प्रकट, अथवा मनसा, वाचा या कर्मणा, किसी भी प्रकार की हिंसा की गुंजाइश नहीं है. सत्याग्रह बहुत कोमल वस्तु है. वह कभी किसी को चोट नहीं पहुंचाता. उसके पीछे क्रोध या द्वेष की भावना नहीं होनी चाहिए. उसमें छोटी-मोटी बातों को कभी तूल नहीं दिया जाता, अधीरता से काम नहीं लिया जाता, व्यर्थ का शोरगुल नहीं मचाया जाता. वह जबरदस्ती से बिल्कुल उलटी चीज है. इसकी परिकल्पना हर तरह की हिंसा का स्थान लेने के लिए की गयी थी.’

जाहिर है गांधीजी के समय में भी जबकि भारत सत्याग्रह के नैतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को सीखने और समझने का व्यावहारिक प्रयास कर रहा था, उस समय भी इसमें गलतियां हो रही थीं और गांधी स्वयं को और दूसरे लोगों को इनके प्रति बार-बार चेता रहे थे. असहयोग आंदोलन और बाद के भी आंदोलनों के दौरान कई स्थानों पर हिंसा हुई. हिंसक घटनाओं की वजह से उन्होंने आंदोलन तक स्थगित किए थे. लेकिन सत्याग्रह के व्यावहारिक प्रयोग में हिंसा और अहिंसा का प्रश्न सुलझने का नाम ही नहीं ले रहा था. हिंसा के सूक्ष्म रूपों को लोगों को समझाना मुश्किल ही लगता था. पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों से लेकर गांवों के भोले-भाले स्त्री-पुरुष तक हिंसा और अहिंसा को मोटे तौर पर ही समझ पाते थे. और जो लोग समझ भी पाते थे, वह व्यावहारिक रूप से इसे अपनाने में प्रायः विफल ही रहते थे. यह क्रम आज़ादी के बाद भी जारी रहा.

आज के भारत में प्रचलित सत्याग्रह के दो उदाहरणों से हम इसे समझ सकते हैं. पहला है भ्रष्टाचार विरोधी जन-लोकपाल आंदोलन के दौरान गांधीवादी कहे जानेवाले अन्ना हजारे का आमरण अनशन. रामलीला मैदान से लेकर जंतर-मंतर तक पर इस दौरान जो कुछ भी हुआ, वह दूर-दूर तक न तो गांधीवादी था और न सत्याग्रह ही. आंदोलनकारी नेताओं का बड़बोलापन और अहंकार, हिंसक और अपमानजनक शब्दों से भरे नारे, सत्ताधारी दल के नेताओं को ‘कुत्ते’, ‘सूअर’ और ‘गधों’ के रूप में चित्रित करने वाले पोस्टर, द्वेष और प्रतिक्रिया से भरे बयान, घृणा और आक्रोश से भरे युवाओं का आवेश, आंदोलनकारियों और सरकार के बीच परस्पर अविश्वास और खींचतान. यह सब तो सामने दिख ही रहा था लेकिन एक सबसे बड़ा पैमाना था स्वयं अनशनकारी का व्यक्तिगत रवैया. एक आदर्श सत्याग्रही के कुछ गुण रहने के बावजूद वह गांधी के अर्थों वाले सत्याग्रह की कसौटी पर शायद ही खरा उतरता था.

कथित सामाजिक कार्यकर्ताओं के हालिया आंदोलन और छात्र आंदोलन असल सत्याग्रह से कोसों दूर हैं

महात्मा गांधी अपने सत्याग्रहों के प्रयोगों को लगातार सत्य और अहिंसा की कसौटी पर कसते थे. एक बार राजकोट रियासत के सामने अपने एक उपवास के दौरान गांधीजी को लगा कि सत्याग्रह के नियम का उन्होंने स्वयं उल्लंघन किया है क्योंकि उन्होंने इसमें वायसराय से हस्तक्षेप की अपील कर दी थी. उन्होंने लोगों की लाख आलोचना की परवाह न करते हुए अपना सत्याग्रह तत्काल समाप्त कर दिया और इसके बारे में 12 अक्टूबर, 1940 के ‘हरिजनसेवक’ में लिखा – ‘आजकल सत्याग्रह के नाम से काफी अनशन होते हैं, लेकिन जो जाहिरतौर पर देखने में आया है कि इनमें से ज्यादातर निरर्थक ही थे और कई तो दूषित थे. ...अनशन करने वाले सत्याग्रही में स्वार्थ का, रोष का, अविश्वास का, अधीरता का प्रवेश नहीं होना चाहिए. मेरे इस उपवास में यह सब दोष आ गए थे. ...शुद्धतम उपवास भी थोड़ी सी भी असावधानी से कैसे दूषित हो सकता है यह हमने सीख लिया है. उपवास करने वाले में अटूट धैर्य, दृढ़ता, एकाग्र-निष्ठा और पूर्ण शांति होनी चाहिए. ये सब गुण एकाएक नहीं आते, इसलिए जिसने अपना जीवन यम-नियमादि के पालन से शुद्ध न कर लिया हो वह सत्याग्रही उपवास करने की योग्यता नहीं रखता है.’ ध्यान रहे कि यह बात उन्होंने सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किए जाने वाले उपवास के बारे में कही थी. व्यक्तिगत उपवासों के बारे में उन्होंने इसी लेख में स्पष्ट कहा था- ‘शरीर-शुद्धि का उपवास तो प्राकृतिक-चिकित्सक की सलाह पर भी हो सकता है और आत्म-शुद्धि के उपवास तो महापापी भी कर सकते हैं.’

गांधीजी के जिस दांडी मार्च जैसे सत्याग्रह को ऐतिहासिक बताकर उसकी इतनी दुहाई दी जाती है उसके बारे में स्वयं गांधीजी के विचार बहुत अच्छे नहीं थे

एक बार किसी ने व्यंग्य की भाषा में गांधीजी को चिट्ठी लिखी कि, ‘आजकल तो अनशन की हवा चल पड़ी है और उसका दोष आप ही को दिया जा रहा है.’ इसका जवाब देते हुए ‘हरिजनबन्धु’ के 21 अप्रैल, 1946 के अंक में गांधीजी ने लिखा- ‘...अनशन में एक-दूसरे की नकल करने की कोई गुंजाइश ही नहीं है. जिसके हृदय में बल नहीं वह उपवास हरगिज न करे और फल की आशा से भी वह उपवास न करे. जो फल की आशा रखकर उपवास करता है वह हारता है और यदि वह हारता नज़र नहीं भी आ रहा हो, तब भी वह उपवास के आनन्द को खो बैठता है. हास्यास्पद अनशन होते रहें और महामारी की तरह अनशन का रोग फैल जाए तो भी जहां उपवास करना धर्म है वहां उसका त्याग नहीं किया जा सकता.’

यहां तक कि गांधीजी के जिस दांडी मार्च जैसे सत्याग्रह को ऐतिहासिक बताकर उसकी इतनी दुहाई दी जाती है उसके बारे में स्वयं गांधीजी के विचार बहुत अच्छे नहीं थे. 31 मई, 1939 को काठियावाड़ राजनीतिक परिषद्, राजकोट में अपने भाषण में उनका कहना था - ‘जो अनुभव मुझे हुआ है उसे देखते हुए आज मैं एक और दांडी कूच नहीं करना चाहूंगा. नमक-कानूनों को तोड़ने का प्रस्ताव बिल्कुल ठीक था, लेकिन मानसिक हिंसा उसमें लगभग शुरू से ही आ गई थी. तब तक हम केवल यही सीख पाए थे कि शारीरिक हिंसा का प्रयोग नहीं करना हमारे हितों के अनुकूल है. यह एक हिसाबी बनिये की अहिंसा थी, वीर क्षत्रिय की अहिंसा नहीं थी. हिसाबी बनिये की अहिंसा हमें बहुत आगे नहीं ले गई है, ले जा भी नहीं सकती थी. यह स्वराज्य प्राप्त करने और बनाये रखने में, हथियारों का इस्तेमाल करने वाले विरोधी को अपने पक्ष में करने में सहायक नहीं हो सकती थी. आज मैं हर कहीं हिंसा महसूस करता हूं. कांग्रेस के अंदर और बाहर मुझे उसकी गंध आती है. ...दुराचारी आदमी कर्म की अपेक्षा अपने मन में अधिक दुराचारी होता है. वचन और कर्म की हमारी हिंसा हमारे मन में उफनती हिंसा की एक हल्की प्रतिध्वनि मात्र होती है.’

आज के भारत में सत्याग्रह को समझने का एक दूसरा अवसर दिल्ली, हैदराबाद और अन्य शहरों में स्थित विश्वविद्यालयों में चल रहे छात्र आंदोलन हमें देते हैं. ये आंदोलन घोषित रूप से सत्याग्रह, असहयोग या सविनय अवज्ञा के स्वरूपों वाले हों या न हों, लेकिन इसमें अनशन, धरना, घेराव जैसे सत्याग्रही तरीकों का इस्तेमाल होता रहा है. मुद्दे कितने भी गंभीर हों, छात्र नेताओं के भाषण भावनात्मक रूप से कितने भी विचारोत्तेजक और प्रभावशाली हों, लेकिन अहिंसक सत्याग्रह की कसौटी पर ये आंदोलन खरा उतर पाते हों ऐसा नहीं है.

मुद्दे कितने भी गंभीर हों, छात्र नेताओं के भाषण भावनात्मक रूप से कितने भी विचारोत्तेजक और प्रभावशाली हों, लेकिन अहिंसक सत्याग्रह की कसौटी पर ये आंदोलन खरा उतर पाते हों ऐसा नहीं है

आजादी के पहले की एक घटना के माध्यम से इस बात को और आसानी से समझा जा सकता है. तब असहयोग आंदोलन के विरोधी पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज के प्रिंसिपल रघुनाथ पुरुषोत्तम परांजपे के खिलाफ वहां के छात्रों ने ‘शेम-शेम’ के नारे लगाए थे. छह फरवरी, 1921 को पटना में मौलाना मजहरुल हक़ द्वारा स्थापित राष्ट्रीय महाविद्यालय में छात्रों को संबोधित करते हुए गांधीजी ने इस घटना को दुःखद बताते हुए कहा था - ‘उनके (शिक्षकों और नेताओं के) प्रति शेम-शेम के नारे लगाना और उनकी बातों को आदरपूर्वक नहीं सुनना, यह छात्रों का कर्तव्य नहीं है. यदि छात्र उनकी सलाह को सम्मानपूर्वक और ध्यान से सुनते तो ऐसा करना भारत की प्राचीन संस्कृति के अनुरूप होता. सभाओं में विघ्न उपस्थित करना, शोर मचाकर वक्ताओं को बैठा देना, उनपर पत्थर तक फेंकना अंग्रेज लोगों का रिवाज है. श्री लॉयड जॉर्ज और श्री चर्चिल को शोर मचाकर और पत्थर फेंककर बैठा दिया गया था. लेकिन यह स्वभाव भारत की संस्कृति और सभ्यता के विपरीत है. यदि आप असहयोग को सच्चे हृदय से चलाना और सफल बनाना चाहते हैं तो यह सब आपको छोड़ना पड़ेगा. शेम-शेम के नारों से लोग कभी मित्र नहीं बन सकते और न हमारे विरोधी हमारे समर्थक बन सकते हैं. यदि हम उनसे प्रेम करें और आदरपूर्वक बरतें तो हम कभी-न-कभी उनको मित्र बना सकते हैं.’

आज के छात्र आंदोलनों के सत्याग्रही स्वरूप पर सवाल उठाने वाली दो घटनाओं का जिक्र यहां किया जा सकता है. एक घटना 2005 की है जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज जवाहरलाल विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भाषण देने पहुंचे थे. यहां उनके साथ तत्कालीन विदेशमंत्री नटवर सिंह भी थे और जब वे छात्रों को संबोधित करने के लिए खड़े हुए तो छात्रों ने उनकी भारी हूटिंग कर दी. ये छात्र केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में आंदोलन चलाने वाले गुट से थे. इस घटना के बाद आखिरकार विदेशमंत्री को वह सभा छोड़कर जाना पड़ा. इसी तरह हाल ही जेएनयू के छात्र आंदोलन के दौरान एक सभा में जिस तरह प्रो. मकरंद परांजपे को सवाल-जवाब करने पर टोका गया और उनकी भी हूटिंग की कोशिश हुई, यह भी आंदोलनों के सच्चे स्वरूप के खिलाफ है.

सत्याग्रह के लिए जरूरी सत्यनिष्ठा, अहिंसा, निर्भयता, निर्वैरता और नैतिक आत्मबल हम शायद ही हासिल कर पाते हैं. तभी हमारे अनशन, धरने, घेराव, गिरफ्तारियां और भूख हड़ताल अब अपना असर खोते जा रहे हैं

आज नर्मदा बचाओ आंदोलन या टिहरी को बचाने के समय की जलसमाधि हो, जल-जंगल और जमीन को बचाने को लेकर निरीह आदिवासियों का आंदोलन हो, अफस्पा के खिलाफ इरोम शर्मीला का सालों का अनशन हो, गो-हत्या के खिलाफ देवनार में सालों से चल रहा सत्याग्रह हो या कश्मीर में चल रहे आंदोलन हों, इन सबको नए सिरे से और गहरी संवेदनशीलता के साथ समझने की जरूरत है. आंदोलनकारी और राज्य-व्यवस्था सहित सभी पक्ष इसे सत्याग्रह की नैतिक कसौटी पर समझें न कि राजनीतिक और रणनीतिक कसौटियों पर. नहीं तो जंतर-मंतर और संसद मार्ग जैसे स्थलों वाले आयोजन या तो केवल हास्यास्पद प्रसंगों के लिए ही जाने जाते रहेंगे, ये फिर वे क्षणिक राजनीतिक प्रभाव पैदा कर बिखर जाएंगे. वहीं राज्य-शासन का भी अहंकारी और अनसुना करने वाला रवैया समाज को एक घोर हिंसक दिशा में धकेलनेवाला साबित होगा.

भारत में महात्मा गांधी के प्रथम सत्याग्रह यानि चम्पारण सत्याग्रह (1917-18) के सौवें साल में हम प्रवेश करने वाले हैं. लेकिन भारत में सत्याग्रह के आज के तौर-तरीकों और इसके प्रति राज्य के रवैये को देखकर लगता है कि गांधीजी की चेतावनी वाले रामसुंदर पण्डित के उस ‘भूत’ ने एक समाज के तौर पर हमारा पीछा अभी तक नहीं छोड़ा है. व्यक्तिगत चारित्रिक दुर्बलता और कायरता के रूप में, संकीर्ण राजनीतिक कटुता के रूप में, भांति-भांति की अंध-सांप्रदायिकता के रूप में, छिपी मानसिक हिंसा से लेकर प्रकट जुबानी और लाठी-बंदूक वाली हिंसा के रूप में, आपसी संवादहीनता के रूप में और अब तो सामान्य मानवीय संवेदनशीलता के होते जा रहे अभाव के रूप में वह ‘भूत’ हमसे अब तक चिपटा हुआ लगता है.