मोहम्मद रफ़ी भले ही अपने रूमानी गीतों के लिए जाने जाते हों लेकिन उन्होंने कुछ ऐसे गाने भी गाए हैं जो आमतौर पर नायकों पर नहीं फिल्माए जाते. अगर फिल्माए भी जाते हैं तो लोगों की जुबान पर इतनी आसानी से नहीं चढ़ पाते. हालांकि रफी के ये गाने अपने दौर में काफी लोकप्रिय रहे थे और आज भी ये सुनने में अच्छे लगते हैं.

गायकों की तारीफ़ में अक्सर यह कहा जाता है कि फलां गायक ने आम आदमी को अपनी आवाज दी. लेकिन आम आदमी हमेशा फुर्सत में फिरने वाला कोई आशिक या दुख का मारा नहीं होता. एक रिक्शेवाला, सब्जीवाला, चूड़ीवाला भी उतना ही आम आदमी होता है. ऐसे लोगों पर बने फ़िल्मी गानों में से कई बेहतरीन गाने रफी साहब के खाते में दर्ज हैं. प्यासा में शामिल तेल मालिश वाला गाना ‘सर जो तेरा चकराए’ इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय गीतों में से है. इसके अलावा हमारी जिंदगी में फर्क लाने वाले, कुछ जरूरी काम करने वाले अलग-अलग पेशेवरों के रोजमर्रा के संघर्ष पर आधारित और भी कई सुरीले गीतों को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी है.

ऐसा ही एक गाना ‘मैं रिक्शावाला, मैं रिक्शावाला...’ है जिसमें अपनी आवाज की जादूगरी से रफी उसकी मज़बूरी और फाकामस्ती दोनों दिखा देते हैं. गीतकार शैलेंद्र ने भी इस गीत को लिखते हुए रिक्शेवाले के चांद तक उड़ान भरने के सपने से लेकर रोटी के सवाल तक का जिक्र किया है. यह गाना 1959 में आई फिल्म ‘छोटी बहन’ में महमूद पर फिल्माया गया था. मेट्रो और कैब के जमाने में आपके आसपास रिक्शेवालों को खोजना भले थोड़ा मुश्किल हो गया हो लेकिन यूट्यूब पर यह गाना सुनना बेहद आसान है.

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सच्चे सुरों में सब्जियों की मार्केटिंग

आगा पर फिल्माया गया यह गाना - ‘मूली राम और भिंडी मल का निकल गया है दीवाला’ सन 1959 में आई फिल्म ‘दुल्हन’ में शामिल किया गया था. आगा उस जमाने के मशहूर कॉमेडियन थे. हालांकि ढेरों फिल्मों में उन्होंने जज की भूमिका भी निभाई है. यह गाना आज भी सब्जीवालों का ‘एंथम’ बन सकता है. यहां रफ़ी साहब सच्चे सुरों में सब्जियों की मार्केटिंग कर रहे हैं. गाने में अलग-अलग शहरों से आई सब्जियों के बीच घोटाले की कहानी एसएच बिहारी ने लिखी थी जिसे संगीतकार रवि ने संगीतबद्ध किया था.

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बर्तन कलई करा लो

बीआर फिल्म्स के बैनर ने 1962 में ‘गर्ल्स हॉस्टल’ शीर्षक से एक फिल्म बनाई. इस फिल्म में नलिनी जयवंत और जानी वाकर मुख्य भूमिकाओं में थे. इस गाने के बोल भले ही ‘बर्तन कलई करा लो’ हैं लेकिन फिल्म में यह गाना असल में एक नायक गाता है. यह नायक आशिक है जिसे महबूबा की गली में घूमने का बहाना चाहिए. मोहम्मद रफ़ी ने बड़े रूमानी अंदाज में गाना शुरू किया है और फिर बर्तन कलई कराने के बहाने आशिक की कलई खोल दी है. गाने के मजेदार बोल ख्याति भट्ट ने लिखे थे.

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चूड़ीवाले की हांक

सन 1960 में ‘घर की लाज’ शीर्षक के साथ एक फिल्म रिलीज हुई थी. सोशल मीडिया पर चुटकीबाजों के बीच सबसे लापरवाह मां के नाम से मशहूर अभिनेत्री निरुपा रॉय ने इस फिल्म में अभिनय किया है. गाने के शुरुआती दृश्य में वे टूटी हुई चूड़ियां उठाती हुई भी दिखती हैं. ‘ले लो चूड़ियां’ नाम का यह गाना जॉनी वाकर पर फिल्माया गया है. चूड़ियों की मार्केटिंग करते हुए रफी साहब एकदम पेशेवर चूड़ीवालों की शैली में बीच में ‘चूड़ी-चूड़ीवाला’ की हांक भी लगाते जाते हैं. इसके बोल राजेंद्र किशन ने लिखे थे.

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तांगे वाले की तान

1970 के दशक में संगीतकार ओपी नैयर का शुरू किया गया एक चलन ख़ासा मशहूर हुआ जिसमें संगीत के साथ घोड़े की टापों का इस्तेमाल होता था. उस दौर में तांगे वालों पर या फिल्म में तांगे की उपस्थिति दिखाते हुए ऐसे कई गाने लोकप्रिय हुए जिनमें नैयर मार्का संगीत था. 1963 में आई फिल्म ‘प्यार का बंधन’ का यह गीत - घोड़ा पिशौरी मेरा, तांगा लाहौरी मेरा, तांगेवालों पर बने गानों में खासा मशहूर है. लेकिन इस गाने में सिर्फ घोड़े की टकटुक-टकटुक का संगीत था बल्कि तांगेवाले का जिक्र भी था. साहिर लुधियानवी के लिखे इसे गाने को भी मोहम्मद रफ़ी की आवाज मिली. गाने में बीच-बीच में शामिल कुछ पंजाबी संवाद भी उन्होंने ही बोले थे. हालांकि अब न तांगे प्रासंगिक हैं और न ही तांगे वाले लेकिन यह गाना हमेशा उतना ही सुरीला रहने वाला है.

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