किशोर कुमार की मस्ती और प्रकृति शायद ही कोई अपने व्यक्तित्व में दोहरा सकेगा. जैसा वह था, वैसा होने के लिए एक शरारती बचपन नाकाफी है. उसके लिए धुनी होना भी जरुरी है. कुछ किसी न किसी बात में इतना समर्पित होकर ही कोई श्रेष्ठ हास्यकार बन सकता है. कॉलेज के दिनों में मेरा वह प्रिय गायक था. ‘फंटूश’ फिल्म का उसका गीत ‘दुखी मन मेरे सुन मेरा कहना’ मैं अकेले में छुप-छुपकर गाता-गुनगुनाता था.

उन दिनों नवकेतन समूह की फिल्में, सचिन देव बर्मन का संगीत, गुरुदत्त और बिमल रॉय के निर्देशन के साथ किशोर कुमार के गाए गाने हमें फिल्मों की ओर आकर्षित करते थे. गीताबाली हमारी प्रिय अभिनेत्री हुआ करती थी. ग्वालियर में जब मैं दिनेश भटनागर के साथ रहता था, हम दोनों किशोर के गीत ‘कुएं में डूबकर मर जाना यार, तुम शादी मत करना’ लगभग रोज ही ग्रामोफोन पर सुनते थे. उसके बावजूद दिनेश ने शादी की, मैंने की और खुद किशोर कुमार ने चार बार की.

उन ही दिनों एक फिल्म आई थी ‘मिस मैरी’. उसमें मैंने देखा कि इस अभिनेता की हर रग फड़कती रहती है, अभिनय के समय. उल्लास का अतिरेक इसे अपने बड़े भाई अशोक कुमार से अलग करता था.मजेदार बात यह थी कि वह पूरे आत्मविश्वास से अति करता था. यह गुण संसार के महान एंटरटेनर्स में होते हैं. मैंने ‘चलती का नाम गाड़ी’ तीन-चार बार देखी है और पड़ोसन में किशोर का अभिनय और उसका वह गाना ‘बिंदु रे बिंदु, माथे के बिंदु’ पर तो मैं मुग्ध था. बहुत सालों बाद जब मैंने किशोर से कहा, ‘बिंदु रे बिंदु’ में आपकी मस्ती कमाल की थी तो उसने मुझे एक मजेदार बात बताई. किशोर ने कहा कि वह दरअसल एक लंबा डायलॉग था जिसे उन लोगों ने वहां गाने की स्थिति महसूस कर गा लिया था.

गाते समय किशोर कुमार का हर अंग थिरकता रहता था. मानो वह शरीर में लय उत्पन्न कर शब्दों को अर्थ दे रहा हो! लोकगायकों में यह गुण होता है पर किशोर कुमार में हर बार विविधता रहती थी. यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि लाखों श्रोताओं के सामने कलाबाजियां खाकर गाने वाला खंडवा का यह लड़का मूलतः बहुत शर्मीला था. क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर के सीनियर छात्र और किशोर कुमार के साथी बताते थे कि उन दिनों वह हॉस्टल में या सोशल गेदरिंग के मौके पर इसी शर्त पर गाने के लिए राजी होता था कि वह परदे के पीछे रहेगा, सामने नहीं आएगा. किशोर विंग्स में छुपकर गाता था और मंच पर कोई लड़का गाने का अभिनय करता था.

यह जो प्रथा इंदौर के कॉलेजों में चली आ रही है, वह किशोर कुमार की ही शुरू की हुई है. किशोर कुमार में यह शर्मीलापन बाद तक रहा. कुछ दिन पहले जब मैं उससे मिलने गया था, मुझे दरवाजे पर विदा करते समय, मैंने देखा कि वह एकाएक छुप गया. मैंने पूछा ‘आप छुप क्यों रहे हैं?’ तो बोला, ‘बाहर लोग मुझे देख लेंगे.’

यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि लाखों श्रोताओं के सामने कलाबाजियां खाकर गाने वाला खंडवा का यह लड़का मूलतः बहुत शर्मीला था और यह शर्मीलापन उसमें ताउम्र रहा

किशोर को शायद कॉलेज-स्कूल के जमाने में दोहे, पद आदि खूब याद थे. वह अच्छे-खासे गानों के बीच उन्हें डाल देता था. वह किसी भी पंक्ति को गा सकता था. ‘चलती का नाम गाड़ी’ में उसका ‘पांच रुपईया बारह आना’ गा देना इसका बढ़िया प्रमाण है. उसकी कोई राजनीतिक आकांक्षा नहीं थी. सरकारी लोग उसका सम्मान करते थे वह सुखद आश्चर्य में डूब जाता था. चैरिटी में गाकर वह अपनी समाज सेवा की आकांक्षा पूरी कर लेता था.

पैसों के मामले में बड़ा होशियार समझा जाता था, पर वह बहुत भोला भी था. उसे फिल्म वालों ने सैकड़ों बार गाने के बाद ऐसे चेक थमा दिए जो बाद में बैंक से लौट आए. वह डरा हुआ आदमी था. बदमाश फिल्मी लोग उसे हंसी-हंसी में बेवकूफ बना ठगना चाहते थे. वह सबसे घबराता था. वह खंडवा लौट जाना चाहता था. खाली समय वह घर पर ही रहता था. अक्सर ही वह अपना घर ठीक करवाया करता था. व्यर्थ की ध्वनियां उसे परेशान करती थीं. वह चला गया. हम उसे अपनी उदासी और मस्ती के दोनों क्षणों में याद करेंगे. उसकी याद कुम्हालाएगी नहीं, उस-सा अब दूसरा न होगा.