'मैं भी मंदिर चलती हूं...' ज़ाहिदा ने ज़रा ज़ोर देकर कुछ फ़ासले पर जा चुके आदित्य से कहा. दोनों ने कॉलेज की कैंटीन में बैठ कर शहर से भागने का प्लान बनाया था. वो आदतन हर मंगलवार को हनुमान मंदिर जाया करता और उस दिन भी मंगलवार था.

'यार, तुम... देर कर दोगी, मैं बस यूं गया और यूं आया. तुम हॉस्टल पहुंचो, सामान पैक करो, तुम्हें स्टेशन पर मिलता हूं.' बिना मुड़े आदित्य कहता चला गया. वो घबरा रहा था. मानो जल्द से जल्द वहां से कहीं दूर निकल जाना चाहता था.

बुत बनी ज़ाहिदा उसे दूर जाते हुए देख रही थी. जैसा तय हुआ था, उसी समय आदित्य को वह स्टेशन पर इंतज़ार करती मिली. आदित्य अभी भी उतना ही बैचैन लग रहा था और ज़ाहिदा उतनी ही शांत और गंभीर, मानो कोई नदी. उसकी नज़रें सिर्फ आदित्य को ढूंढने में व्यस्त थीं. दोनों मिले तो ज़ाहिदा ने एक मीठी सी मुस्कुराहट से उसका स्वागत किया. आदित्य बदहवास सा इधर-उधर देख रहा था जैसे खुद को और उसको लोगों की नजरों से छुपाना चाह रहा था. 'कोई देख न ले यार वरना मुश्किल हो जाएगी.'

'अपने आपको छुपाने के लिए भीड़ से ज्यादा उम्दा और कुछ नहीं हो सकता. यहां कोई किसी से मुताल्लिक नहीं है. निश्चिंत रहो, कोई नहीं पहचानेगा' ज़ाहिदा ने बड़े इत्मीनान से कहा. फिर पटरियों पर ट्रेन मानो उनके लिए ही रुकी थी. ज़ाहिदा ने उसका हाथ पकड़ा और सेकंड एसी के डब्बे में घुस गयी. लेकिन जैसा अमूमन सपने में होता है, हम भागना चाहते हैं पर भाग नहीं पाते, ट्रेन भी पटरियों पर सिर्फ खड़ी रही, इंजन हू-हू करके शोर मचाता रहा जैसे उनके घर वालों तक इस खबर को पहुंचाना चाहता है....

ज़ाहिदा की आंखें खुलीं तो उसने ख़ुद को हॉस्टल के कमरे में अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ पाया. न आदित्य था कहीं, न भीड़, न ही ट्रेन. पर उसके कानों में इंजन की आवाज़ अभी भी गूंज रही थी.

ज़ाहिदा की आंखें खुलीं तो उसने ख़ुद को हॉस्टल के कमरे में अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ पाया. न आदित्य था कहीं, न भीड़, न ही ट्रेन. पर उसके कानों में इंजन की आवाज़ अभी भी गूंज रही थी

'यार, मम्मी-पापा मान जाएंगे चिंता मत करो और अगर न माने तो हक़ीक़त में इंजन ट्रेन को खींचता है' हंसकर आदित्य ने उसमें विश्वास जगाने की कोशिश की. लेकिन वो भी जानता था कि इतना आसान नहीं होगा सब. उसे याद है ग्यारहवीं में मां को जब पहली बार मालूम हुआ था कि वो उर्दू सीखने पास की मस्जिद में जाता है तो घर में कितना हंगामा हुआ था. उसके उर्दू सीखने के शौक को सीधे-सीधे किसी मुसलमान लड़की के साथ जोड़ दिया गया था. उसकी लाख समझाइश काम न आयी और मां ने उर्दू का क़ायदा फाड़ कर फेंका ही नहीं, बल्कि उसे तमाम कसमें और यहां तक कि अपनी जान देने की धमकी तक दे डाली थी.

इंजीनियरिंग का दोनों का आखिरी साल था. कॉलेज में आने के बाद ही मालूम हुआ कि वो दोनों एक ही शहर के हैं. ज़ाहिदा मैकेनिकल ब्रांच में थी और वो सिविल में. जयपुर कोई इतना बड़ा शहर भी नहीं है कि इस तरह की दास्तान मशहूर न हो. बात दोनों के घर तक आख़िर पहुंच ही गयी थी और फिर जो होता है अक्सर वैसा ही कुछ हुआ. दोनों घरों में छातीकूट, कुछ दिनों का मातम, दोनों अपने-अपने घरों में जैसे एक मुजरिम.

चूंकि पढ़ाई का आख़िरी साल था इसलिए घर वालों को उन्हें दूसरे शहर भेजना ही पड़ा. पर दोनों को सख़्त हिदायतें, अपने-अपने खानदान की कभी न सुनी हुई इज्ज़त, भाई-बहनों की आने वाली जिंदगी, इसके धर्म और उसके मज़हब के बीच न पटने वाली खाई का वास्ता देकर भेजा गया. पिछले चार सालों में दोनों एक दूसरे की जिस्म की खुश्बू को पहचानने लग गए थे. दोनों एक दूसरे के साथ ख़ुश रहते थे और कभी जब दोनों को एक दूसरे के साथ किसी कमरे में होने का मौका मिलता, तो अपने आपको मुकम्मल पाते थे. दोनों समझदार थे लिहाज़ा, उन्होंने अपने आपको घरवालों की बातों-हिदायतों से ऊपर और मोहबत को ज़िंदा रखा.

जयपुर कोई इतना बड़ा शहर भी नहीं है कि इस तरह की दास्तान मशहूर न हो. बात दोनों के घर तक आख़िर पहुंच ही गयी थी और फिर जो होता है अक्सर वैसा ही कुछ हुआ

आख़िरी साल तो कुछ ज्यादा ही तेजकदमों से उन दोनों के बीच से गुज़र गया और वे वहीं के वहीं खड़े रह गए. दोनों के घर वाले नहीं माने और न ही वे दोनों मानने को राज़ी थे. और अब जब एक ही रास्ता रह गया था तो ज़ाहिदा को ट्रेन के इंजन की हू-हू करती आवाज़ कुछ ज़्यादा ही नज़दीक लगी. वो प्लेटफॉर्म पर बैठी आदित्य का इंतज़ार कर रही थी. ट्रेन आ चुकी थी पर आदित्य...? उसने फ़ोन मिलाया तो आउट ऑफ़ रेंज था, व्हाट्सएप्प पर भी मैसेज डिलीवर नहीं हुआ. इंजन गाडी को खींचकर ले जाने लगा तो ज़ाहिदा को सब कुछ ख़त्म होता सा महसूस होने लगा. वो बुत बनी बैठी रह गयी. जब संभली, तो ट्रेन जा चुकी थी और प्लेटफॉर्म खाली हो गया था. तभी उसे आदित्य के भाई और दोस्त सामने से आते नज़र आये.

'घर चलो भाई घर पर ही है' वो विक्रम से पहले मिल चुकी थी और उसे भरोसे के लायक मानती थी. घर में सब लोग थे सिर्फ वो ही नहीं था. पूछने पर मालूम पड़ा कि आदित्य को उसके, माने ज़ाहिदा के, घरवाले उठा कर ले गयें हैं. वो समझ गयी कि उसके साथ भी यही हुआ है. उसकी आंखों में आंसू भर आये और घबराकर वो आदित्य की मां से लिपट गयी.

'घबराओ मत ज़ाहिदा तुम यहां सुरक्षित हो बेटी' उसकी मां ने थोडे तल्ख़ अंदाज़ में कहा, 'हमने थाने में रिपोर्ट दर्ज़ नहीं करवायी है पर तुम्हारे घर ख़बर करवा दी है. थोड़ी देर में जब आदित्य वापस आ जाएगा, तुम भी अपने घर चली जाओगी. और अगर मेरा बेटा न भी आया तब भी तुम सुरक्षित घर जाओगी.'

आदित्य की मां ने उसे फिर भरोसा दिलाया, 'और अगर तुम इस घर में हमेशा के लिए रहना चाहती हो तो एक रास्ता है, बिटिया ....' दिखने-सुनने में अच्छी लगने वाली ज़ाहिदा उसकी मां को भी भली लगी. ज़ाहिदा आदित्य को पाने के लिए किसी भी रास्ते पर चलने के लिए तैयार थी और उसने वैसा ही किया.

बुत बनी ज़ाहिदा उसे दूर जाते हुए देख रही थी. जैसा तय हुआ था, उसी समय आदित्य को वह स्टेशन पर इंतज़ार करती मिली. आदित्य अभी भी उतना ही बैचैन लग रहा था और ज़ाहिदा उतनी ही शांत और गंभीर, मानो कोई नदी

अभी कुछ घंटे ही गुजरे थे कि घर के फ़ोन की घंटी घनघना उठी मां ने रिसीवर उठाया तो दुसरे छोर से आदित्य की आवाज़ सुनाई दी, 'मां, मैं ठीक हूं एक बार ज़ाहिदा को फ़ोन तो देना.' मां के चहरे पर ख़ुशी की ना जाने कितनी लकीरें उभर आयीं और उन्होंने रिसीवर ज़ाहिदा के हाथों में थमा दिया.

जैसे ही ज़ाहिदा ने इधर से हेलो कहा, उधर से आवाज़ आयी, 'सुनो, ज़ाहिदा, में तुम्हारे घर पर हूं और ठीक हूं. तुम्हारे घर कौन लाया, क्यों लाया सब बाद में बताऊंगा...बस इतना इतना समझ लो कि तुम्हारे घर वाले चाहते थे कि मैं तुम्हे पाने के लिए अपना धर्म बदल लूं तो सब ठीक हो जायेगा. मैंने यही किया. अब मैं आदित्य से आदिल हो गया हूं. वो अब हमारी शादी धूमधाम से करने को तैयार हैं.' वो जैसे ख़ुशी के मारे फ़ोन से बाहर ही निकला जा रहा था.

'हेलो! , ज़ाहिदा...हेलो!, ' मैं अपने पापा और मम्मी को समझा लूंगा वो बड़े अच्छे लोग हैं और उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं होगी और अगर होती भी है तो कोई बात नहीं. 'हेलो, ज़ाहिदा! तुम सुन रही हो ना ?'

'... हां, सुन रही हूं', उसने जैसे चौंककर कहा. '... लो, मां से बात करो.' और फिर उसने रिसीवर आदित्य या आदिल, जो भी कहो, की मां के हाथों में दे दिया.

'हेलो , बेटा आदित्य!, मेरी बात सुनो. हम इसे घर ले आये थे. लंबी कहानी है बस इतना समझ लो कि ये बच्ची बहुत ही संस्कार वाली है, बेहद प्यार करती है तुमसे. ये तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती है, बेटा. ये कह रही थी इसके घरवाले बहुत भले लोग हैं और ये उनको मना लेगी. अब जब ये जाहिदा से ज्योति बन चुकी है तो हमें भी कोई दिक्कत नहीं है. जल्दी घर आओ धूमधाम से शादी करेंगे तुम दोनों की.'

'हेलो , बेटा आदित्य! तुम सुन रहे हो ना. '...हेलो...हेलो ...!'