स्वदेश दीपक पर बात करते हुए सबसे पहले उनके नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ की याद आती है. इसकी अब तक सैकड़ों प्रस्तुतियां हो चुकी हैं. सिर्फ दिल्ली नहीं बल्कि देश के अन्य शहरों में भी इसे प्रदर्शित किया जाता रहा है. अस्मिता थियेटर समूह के अरविन्द गौड़ के अतिरिक्त इस नाटक को प्रदर्शित करनेवालों में उषा गांगुली, रणजीत कपूर और अभिजीत चौधरी जैसे प्रसिद्ध नाम भी सम्मिलित हैं. दीपक स्वदेश की दूसरी रचनाओं जैसे ‘सबसे उदास कविता’, ‘जलता हुआ रथ’, ‘बाल भगवान’ आदि पर आधारित नाटकों का प्रदर्शन भी इन सालों में होता रहा है. इसका मतलब यह कि उनकी कृतियों में हमेशा नाटक बनने की संभावनाएं रही हैं चाहे वे नाटक के फॉर्म में रची गई हों या न रची गई हों.

‘बाल भगवान’ का नाम आते ही एक विवादित प्रकरण का ख्याल बरबस हो आता है. उत्पलेंदु चक्रवर्ती की एक रचना थी ‘देव शिशु’. इसकी और ‘बाल भगवान’ की कहानियों की साम्यता पर स्वदेश दीपक और चक्रवर्ती के बीच विवाद इस कदर बढ़ गया था कि बात अदालत तक पहुंचने वाली थी. उस समय ‘देव शिशु’ चर्चित हो चुकी थी और उसके साथ कई अवॉर्ड जुड़कर उसकी साख को और ज्यादा पुख्ता कर रहे थे. स्वदेश ने उत्पलेंदु पर अपनी कहानी की चोरी का इल्जाम लगाया था. इस मामले को कई लेखकों के बीच बचाव और राजेन्द्र यादव के कहने पर रफा-दफा करवाया गया था. फिर दोनों कहानियां ‘हंस’ के एक अंक में एक साथ छपीं, यह साबित करने के लिए कि कई बार दो कथाकार एक जैसा ही कुछ सोच सकते हैं. हालांकि स्वदेश का नाम तबतक कहानीकार के रूप में स्थापित हो चुका था और उत्पलेंदु के नाम न पहले कुछ रचनात्मक चीजें दर्ज थीं और बाद में ऐसा कुछ नहीं हुआ.

स्वदेश दीपक के नाम से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण विवाद ‘क्या कोई यहां है’ कहानी से जुड़ा है. 1976 के ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित यह कहानी अपने कथ्य और शिल्प दोनों से तूफ़ान मचा देने वाली कहानी थी. तब आपातकाल के दिन थे. पूरी सामग्री छपने से पहले ‘सेंसर’ अधिकारियों की नजरों के आगे से गुजरती थी. धर्मवीर भारती ने बगावती तेवर वाली इस कहानी के प्रभाव को बूझते हुए इसे सेंसर अधिकारियों के हवाले कर दिया था पर कूढ़-मगज सेंसर वाले इसके व्यंग्य और धार के प्रभाव को बूझ ही नहीं सके. लेकिन प्रकाशित होने के साथ ही जब यह कहानी चर्चित हुई तो सेंसर विभाग के कई कर्मचारियों को इसके कारण अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा.

स्वदेश दीपक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने जो भी लिखा या किया, वह खूब दिल से किया. ऐसे काम जो उनके समकालीनों में खोज पाना दुर्लभ है. चाहे उनके नाटक हों, उपन्यास हों या फिर कहानियां. ‘अहेरी’, ‘अश्वारोही’, ‘क्योंकि मैं उसे जानता नहीं’, ‘किसी एक पेड़ का नाम लो’, ‘क्योंकि हवा पढ़ नहीं सकती’, ‘क्या कोई यहां है’, ‘मसखरे कभी नहीं रोते’ आदि कहानियां स्वदेश दीपक के एक अलहदा अंदाज की झलक देती है और इसी वजह से उनकी प्रतिनिधि कहानियां कही जा सकती हैं.

आलोचकों का यह कहना था कि आत्महत्या और हत्या स्वदेश दीपक के पात्रों की अन्तिम परिणति हैं. उनके बारे में यह भी कहा जाता था कि लेखक अपनी हर रचना में अपने पात्रों के साथ भरी हुई बंदूक लेकर चलता है

आलोचकों का यह कहना था कि आत्महत्या और हत्या स्वदेश दीपक के पात्रों की अन्तिम परिणति हैं. उनके बारे में यह भी कहा जाता था कि लेखक अपनी हर रचना में अपने पात्रों के साथ भरी हुई बंदूक लेकर चलता है. आलोचकों की राय थी कि उनकी कहानियों का दुखांत होना किसी रूढ़ी की तरह तय होता है. पर यह सिर्फ आलोचकों की राय थी, पाठकों के लिए वे अपनी कहानी में अद्भुत रूप से डुबा ले जाने वाले लेखक रहे. सबसे दिलचस्प बात है कि इन कहानियों के शीर्षक भी इतने आकर्षक होते थे कि उन्हें पढ़कर ही रचना पढ़ने का मन कर जाए.

कहानियों के नामों से शुरू हुआ यह तिलस्मी सिलसिला उनके आत्मकथात्मक संस्मरणों पर आधारित किताब ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ तक भी लगातार चलकर आता है. आत्मा और मस्तिष्क के डार्करूम को खंगालने वाली इस किताब के अध्यायों के शीर्षक भी बहुत ही सम्मोहक हैं – ‘घूमते अंधेरे सा पतझड़’, ‘मरना भी एक कला है’, ‘मेरा अंत ही मेरी शुरुआत है’, ‘आपने कितने खून किये हैं स्वदेश दीपक’. इन शीर्षकों में सिल्विया प्लेथ भी हैं, विलियम फॉकनर भी और खुद स्वदेश दीपक भी. यहां एक मायाविनी है जो उन्हें जीवन की ओर मुड़ने नहीं देती और एक स्वदेश दीपक भी जो हर-हाल खुद को मरने नहीं देता.

हिंदी में अबतक ऐसी कोई किताब नहीं थी, जिसमें अपने ही मनोरोगों को तटस्थता और एक दूरी बरतते हुए कभी एक पात्र की तरह देखा जाए और कभी एक भुक्तभोगी की तरह. कथादेश में धारावाहिक रूप से ‘खंडित जीवन के कोलाज’ नाम से प्रकाशित होते वक़्त ही ये संस्मरण अपने अनोखेपन की वजह से धूम मचा चुके थे. कई मनोरोग विशेषज्ञों ने तो इसे मानसिक रोगों के अध्ययन का एक जरूरी दस्तावेज भी माना.

लेखन के शीर्ष पर से एकदम गुमनाम हो जाने और गुमनामी के उन अंधेरे दिनों से सकुशल लौट आनेवाले ही नहीं, बल्कि उसे अविस्मरणीय रूप से रचनात्मक कृति के रूप में ढालनेवाले स्वदेश दीपक अपनी तरह के अकेले लेखक रहे हैं. वरना तो हमारे यहां निराला भी हुए हैं और भुवनेश्वर जैसे लेखक भी, जो इन्हीं अंधेरी खाइयों में कहीं गम हुए तो फिर कभी वापस न लौट पाए. पर स्वदेश लौटे थे और लगता था जैसे कभी न जाने के लिए लौटे हैं.

साहित्य अकादमी के सभागार में वे अपने मित्रों , परिवारजनों का खासकर अपनी पत्नी गीता जी का शुक्रिया अदा कर रहे थे कि बहुत मुश्किल होता है किसी ऐसे इन्सान के साथ जीना, उसे झेल पाना. सात बरस के इस अज्ञातवास (1990 से 1997 तक) के बाद इस पुनरागमन पर उनके पाठक और साथी लेखक बेहद खुश थे. तब किसे पता था, यह आना फिर जाने के लिए ही था. ऐसा जाना कि अबकी बार हम उन्हें ढूंढ़ भी ना पाएंगे.

स्वदेश दीपक के आत्मकथात्मक संस्मरणों की किताब ‘मैंने मांडू नहीं देखा’ को कई मनोरोग विशेषज्ञ मानसिक रोगों के अध्ययन का एक जरूरी दस्तावेज मानते हैं

सात जून, 2006 की सुबह वे हमेशा की तरह सुबह की सैर के लिए चंडीगढ़ के अपने घर से निकले थे. रोजाना की यह सैर अम्बाला छावनी से माल रोड के दोनों छोरों तक सीमित रहती थी. यह सैर दो घंटे से ज्यादा की कभी नहीं होती थी, इसके बाद वे अमूमन अपने घर लौट आते थे. फिर सिगरेट के कश और चाय की प्यालियों के दौर के साथ लेखन शुरू करते थे. पर उस दिन स्वदेश दीपक घर लौटकर नहीं आए. उनको ढूंढ़ने के तमाम घरेलू और पुलिसिया प्रयास भी असफल रहे. इन 12 वर्षों में आज तक उनकी कोई खोज खबर नहीं मिल पाई है.

स्वदेश दीपक को बाईपोलर सिंड्रोम नाम की मानसिक बीमारी थी. इस बीमारी की वजह से व्यक्ति में संवेदनशीलता का स्तर तीव्रता के साथ घटता-बढ़ता रहता है. यह बीमारी लोगों को अतिसंवेदनशील बना सकती है. स्वदेश ऐसे ही थे और ऐसा लगता है कि इन हालात में सुख और दुख में से उन्होंने दुख को चुन लिया था. जितना दुख उनके पात्र सहते थे, उतना ही दुख उन्होंने अपने जीवन में स्वयं जिया. कोई लेखक इसलिए सृजन करता है क्योंकि वह संवेदनशील होता है. वह अपनी रचनाओं में एक दुनिया रचता है. अपने हिस्से की दुनिया और अपने हिस्से का सच. कभी-कभी यह रचा हुआ इतना बड़ा हो जाता है कि वह हमें रचने लगता है. किरदार हमें गढ़ने लगते हैं. इनके दुख और इनकी संवेदनाएं लेखक को गहरे तक प्रभावित करने लगती हैं.

लेखक और किरदार के बीच भावनाओं का एक महीन लेनदेन ही रचनाओं को अनूठा बनाता है. लेकिन जब लेखक और किरदार हद से ज्यादा एक दूसरे पर हावी होने लगते हैं तब लेखक के लिए यह आत्मघाती भी साबित हो सकता है. पूरी संभावना है कि स्वदेश दीपक से साथ भी ऐसी स्थितियां बनी हों. उनके अपहृत किए जाने या मार दिए जाने के कोई सुराग आजतक नहीं मिल पाए हैं. एक संभावना बनती है आत्महत्या की, क्योंकि इससे पहले भी वे ऐसे प्रयास कर चुके थे. पर कहीं न कहीं उसके भी तो कुछ चिन्ह होते ही हैं. हालांकि स्वदेश दीपक के पाठक आज भी इस संभावना को मानने से इनकार करते हैं. अतीत में जब उन्होंने ऐसी कोशिशें की थीं तब वे होशोहवास में नहीं रहते थे और 2006 में जब वे गायब हुए, उसके पहले उनकी हालत ऐसी कतई नहीं थी.

स्वदेश दीपक के पाठकों को आज भी उनकी तलाश है. कोई बतला सकता है उनका पता? फिलहाल तो उनका पता वे रचनाएं हैं जिन्हें वे हमारे बीच हमारे लिए छोड़कर गए हैं.