हमारा समय दो प्रकार की शक्तियों के बीच अंधसंघर्ष का समय मालूम होता है. इनमें से पहली शक्ति वह है जो हर प्राचीन ज्ञान, रूढ़ि, प्रथा और परंपरा को ईश्वरीय, महान और सार्वकालिक आदर्श के रूप में मानती है और इसे स्थापित करने या बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक हिंसक होने को तैयार है. इसे वह अपने अर्थों वाली श्रद्धा, निष्ठा, भक्ति, धर्म, मर्यादा और सामाजिक नियम-कानून इत्यादि का नाम देती है. दूसरी शक्ति वह है जो इसकी प्रतिक्रिया में उठ खड़ी हुई है. यह अपने पास आधुनिकता, तार्किकता, वैज्ञानिकता, विकासवाद, लैंगिक एवं सार्वभौमिक समानता और लोकतंत्र जैसे अत्यंत चमकदार और प्रभावी हथियार होने का दावा अवश्य करती है, लेकिन उसकी प्रतिक्रियावादिता उसे भी व्यापकता की बजाय संकुचितता की ओर लेकर चली जा रही है. यह बात भी स्पष्ट है कि परस्पर-विरोधी दोनों ही पक्षों में मध्यमार्ग, अनेकांत और सापेक्ष सत्य जैसी संभावनाओं के प्रति कोई उदारता दिखाई नहीं देती.

मानवीय विकास का यह दौर इन दोनों शक्तियों से प्रभावित है और इसमें या तो हम प्रचलित अर्थों वाले ‘रिग्रेसिव’ या दकियानूसी हो सकते हैं या कथित ‘प्रोगेसिव’ या प्रगतिशील. यह एक विकट दौर है, जहां या तो हम स्वयं ही अपनी-अपनी सुविधा से इन दोनों में से कोई एक खेमा चुन लेते हैं, या फिर किसी और के द्वारा किसी न किसी खेमे से संबद्ध ठहरा दिए जाते हैं.

क्या अपनी प्राचीन भाषाओं से सीखने की ललक हमें आवश्यक रूप से श्रेष्ठतावादी, सांप्रदायिक और पुरोहितवादी करार दिए जाने का पर्याप्त कारण हो सकती है?

शायद यही कारण है कि विश्व की प्राचीन भाषाओं और उनमें भरे ज्ञान-विज्ञान को जानने-समझने, तौलने, परिष्कृत करने और उपयोगिता के आधार पर अपनाने तक का बहुलवादी और उदारवादी नजरिया अब दिनोंदिन इस नकारवादी प्रगतिशीलता की भेंट चढ़ता जा रहा है. क्या अपनी प्राचीन भाषाओं से सीखने की ललक हमें आवश्यक रूप से श्रेष्ठतावादी, सांप्रदायिक और पुरोहितवादी करार दिए जाने का पर्याप्त कारण हो सकती है? प्राचीन जीवन-विद्या का उदार सत्यशोधक होने और वैज्ञानिक मानस की अनंत संभावनाओं से भरपूर होने जैसी प्रवृत्तियां क्या सचमुच हममें एक साथ नहीं पाई जा सकतीं? संस्कृत जैसी प्राचीन भाषाओं की प्रासंगिकता पर किसी भी चर्चा से पहले आज हमारे लिए इस द्वंद्व को समझना कहीं अधिक जरूरी हो गया लगता है.

श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन पिछले 47 वर्षों से ‘संस्कृत दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. अंग्रेजी और हिन्दी सहित दुनिया की विभिन्न भाषाओं के लिए साल में एक दिवस मनाने का चलन रहा है. ऐसे भाषा दिवसों को हम संबंधित भाषा पर कोई उपकार करने के लिए नहीं, बल्कि संबंधित भाषा या भाषाओं के प्रति आभार प्रकट करने के दिन के रूप में मना सकते हैं. लेकिन अमूमन होता यह है जब किसी पीढ़ी को कोई बनी-बनाई सुविकसित भाषा सामाजिक विरासत के रूप में मिलती है, तो वह उस भाषा के विकास की कहानी को समझने की चेष्टा करे, ऐसा देखने में नहीं आता. वह इसे भाषा विज्ञानियों और साहित्यिकों का काम समझकर, स्वयं को केवल उस भाषा का उपयोक्ता और उपभोक्ता बना बैठता है.

भारत जैसे देशों में खासकर हाल के दशकों में अंग्रेजी को करियर, नौकरी, अवसर या व्यावसायिक लाभ की भाषा के रूप में देखने के ऐसे ही चलन ने जोर पकड़ा है. अंग्रेजी सिखाने के रेडिमेड नुस्खों और छोटी-गली वाले रास्तों को अपनाने की प्रवृत्ति भी बढ़ी ही है. यहां तक कि जिन देशों की मूल भाषा ही अंग्रेजी है, वहां भी नवपीढ़ियों में इस भाषा के प्रति लापरवाही देखी जा रही है. 2011 में संयुक्त राज्य अमेरिका में एक देशव्यापी सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि वहां के 8वीं और 12वीं कक्षा के एक चौथाई से भी कम बच्चे अंग्रेजी लेखन में दक्ष पाए गए. जबकि केवल तीन प्रतिशत बच्चे ही उच्च-स्तरीय लेखन की योग्यता प्राप्त कर पा रहे हैं. यह भी देखने में आया कि प्रजाति, जातीयता, लिंग और विद्यालय के स्थान के आधार पर इन बच्चों की भाषायी दक्षता में अंतर पाया जाता है.

ऐतिहासिक रूप से भाषाएं मनुष्यों की जिस दुष्प्रवृत्ति का सबसे अधिक शिकार हुई, वह था जातीय और राष्ट्रीय अहंभाव

ऐतिहासिक रूप से भाषाएं मनुष्यों की जिस दुष्प्रवृत्ति का सबसे अधिक शिकार हुईं, वह था जातीय और राष्ट्रीय अहंभाव. यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी संकुचित राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा आधार भाषाएं ही बनीं. भारत में राज्यों के पुनर्गठन का भी आधार आमतौर पर भाषाएं ही बनीं. लेकिन भारत जैसे देश में संस्कृत से लेकर मैथिली तक तमाम भाषाएं जातीय भेदभाव की भेंट ज्यादा चढ़ीं. एक समाज और राष्ट्र के भीतर ही भाषाएं जाति-विशेष के आधार पर बंटीं और उनका स्तरीकरण तक हुआ.

संस्कृत ब्राह्मणवाद (पुरोहितवाद) को स्थापित नहीं करती बल्कि उसका विरोध करती है

भारत की अवैदिक और वैदिक परंपरा में संस्कृत जिस रूप में विकसित और प्रतिष्ठित हुई, उसके बाद के कालक्रम में इसमें निरंतर गिरावट ही देखने को मिली. सामान्य समझ कहती है कि इसका एकमात्र कारण यह रहा होगा कि अध्यात्मिक और नैतिक स्तर पर जब पुरोहितों का अधोपतन शुरू हुआ, तो उन्होंने भाषा और इसके ज्ञान को वर्चस्व के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया होगा.

फिर यह भी हुआ कि ब्राह्मण जहां पहले एक गुणवाचक संज्ञा थी, उसे एक जातिवाचक संज्ञा में बदल दिया गया. ब्राह्मण शब्द पहले ज्ञान साधना, शील, सदाचार, त्याग और आध्यात्मिक जीवन-वृत्ति के आधार पर जीनेवाले लोगों के लिए एक सम्मानित संबोधन सरीखा था. बाद के समय में वही ब्राह्मणत्व ज्ञान और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन का पेशा बन गया. पेशा बनने तक भी उनके सामने कई उच्च आदर्श और अनुशासन बचे हुए थे, जिन्हें वे अपना कर्तव्य समझकर निभाते थे.

अध्यात्मिक और नैतिक स्तर पर जब पुरोहितों का अधोपतन शुरू हुआ, तो उन्होंने भाषा और इसके ज्ञान को वर्चस्व के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया होगा

पेशा या वृत्ति के रूप में भी यह इतना आसान नहीं था. उदाहरण के लिए, इस पेशे में उतरने के लिए यदि कोई ऋग्वेद का विद्यार्थी है, तो उसे दस हज़ार से अधिक मन्त्रों, उसके पद-पाठ, क्रम-पाठ, ऐतरेय ब्राह्मण, छह वेदांगों (जैसे- आश्वलायन का कल्प-सूत्र, पाणिनी का व्याकरण जिसमें लगभग 4000 सूत्र हैं, निरुक्त जो 12 अध्यायों में है, छन्द, शिक्षा एवं ज्योतिष) को कंठस्थ करना पड़ता था. छह वेदांगों में से पहले तीन तो बहुत ही लंबे और दुर्बोध ग्रन्थ हैं. बिना अर्थ समझे उन्हें इतने लंबे साहित्य को याद रखना पड़ता था. उन्हें बिना शुल्क लिए वेदों का अध्यापन करना पड़ता था (वेद पढ़ाने पर शुल्क लेना पाप समझा जाता था, और आज भी कई स्थानों पर ऐसा ही है). हालांकि शिक्षा के अंत में वे स्वेच्छा से दिए जाने पर कुछ ग्रहण कर सकते थे.

इन पेशेवर ‘ब्राह्मणों’ के सामने भी दरिद्रता का जीवन, सादा जीवन और उच्च विचार का आदर्श था, और वे धन के लोभी नहीं होते थे. ये लोग सदियों से चले आये हुए एक समृद्ध और विशाल साहित्य के संरक्षक थे. फिर उनसे यह भी आशा की जाती थी कि वे रोज-रोज लिखे जा रहे साहित्य की भी रक्षा करें और उसे सम्यक ढंग से औरों में बांटें और संपूर्ण साहित्य का प्रचार करें. हालांकि सभी पेशेवर ब्राह्मण इतने बड़े आदर्श तक नहीं पहुंच पाते थे, फिर भी इनकी संख्या बहुत बड़ी थी और उन्हीं की वजह से पूरे समाज को संस्कृत भाषा में उपलब्ध प्रचुर साहित्य और ज्ञान उपलब्ध हो पाया.

संयम, संतोष, ज्ञान और करुणा की जीवन-साधना के द्वारा कोई भी मानव-मानवी व्यापक अर्थों वाला गुणवाचक ब्राह्मण बन सकता था. परवर्ती पुरोहितों और अन्य लोगों द्वारा तमाम मिलावटबाजियों के बावजूद संस्कृत शास्त्रों में आज भी लिखा मिलता है कि ‘जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्यते.’ यानी जन्म से हर कोई अज्ञानी होता है, और अपने कर्म और जीवन-साधना के द्वारा ऊंचे आदर्शों को हासिल कर ही कोई ‘ब्राह्मण’ कहला सकता है. लेकिन इस जातिनिरपेक्ष ‘ब्राह्मणत्व’ को पहले तो महज पौरोहित्य का ‘पेशा’ बना दिया गया. फिर इस पेशे को ‘वर्ण’ का समानार्थी बना दिया गया. यह एक बड़ी भारी भूल और विकृति थी. और इसके बाद तो सबसे अधिक पतन तब हुआ, जब इस कथित ‘वर्ण’ को जन्म के आधार पर जाति बना दिए जाने का आत्मघाती कदम उठाया गया.

वर्ण के अपने विश्लेषण में गीता ने यह नहीं कहा कि ‘जाति-कर्म विभागशः’, बल्कि इसने कहा- ‘गुणकर्म विभागशः’ (गुणों के आधार पर मनुष्यों का चार प्रकार से विभाजन)

एक अन्य संस्कृत ग्रंथ गीता ने अनेक स्थानों पर खोल-खोल कर समझाया कि ‘मन की निर्मलता, आत्मसंयम, तप यानि कठिन परिस्थितियों को स्वीकारते हुए जीना, आचरण और विचार की शुद्धता, धैर्य या सहनशीलता, सरलता, निष्कपटता या ईमानदारी, ज्ञान-विज्ञान और जीवन-धर्म में श्रद्धा ये सब ‘ब्राह्मण’ होने की शर्त या पहचान हैं’ (गीता, 18/42). वर्ण के अपने विश्लेषण में भी इसने यह नहीं कहा कि ‘जाति-कर्म विभागशः’, बल्कि इसने कहा- ‘गुणकर्म विभागशः’ (गुणों के आधार पर मनुष्यों का चार प्रकार से विभाजन). ‘ब्राह्मण’ के विश्लेषण में न तो कहीं जन्म को कोई आधार बनाया गया, और न ही इसे पहले से अंतर्निहित या अंडरस्टुड माना जा सकता है. धम्मपद के रूप में संकलित बुद्धवाणी में भी कहा गया- ‘बड़े-बड़े बालों से या वंश से या ऊंचे कुल में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नहीं बनता. जिसमें सत्य और धर्म है, वही ब्राह्मण है’ (धम्मपद, 393).

गीता जिस संस्कृत ग्रंथ महाभारत का हिस्सा है, उसमें तो दसियों स्थान पर वर्ण और जाति की प्रचलित व्यवस्था पर इतनी कठोर टिप्पणियां की गयी हैं कि इसे देखकर लगता है कि इस काल में जाति-व्यवस्था के विरोध में कोई बड़ी क्रांति या आलोचना अवश्य हुई होगी. इस ग्रंथ के शांतिपर्व के दो अध्याय (188 और 189) तो पूरी तरह से इसी जाति-व्यवस्था की आलोचना को ही समर्पित है. इन अध्यायों में एक से एक मानवीय और वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत कर प्रचलित जाति-व्यवस्था की और विशेषकर जन्मना ब्राह्मणों के अहंबोध की घनघोर खिल्ली उड़ाई गयी है. आज स्वयं को ब्राह्मण कहने वाले यदि संस्कृत में ही लिखे इस ग्रंथ के इन दो अध्यायों को पढ़ें, तो इसकी परिभाषा के आधार पर वे शायद ही स्वयं को ब्राह्मण कह पाएंगे.

आज के जाति-बाभनों को आईना दिखाने के लिए किसी अति-प्राचीन संस्कृत ग्रंथ में लिखा यह श्लोक ही काफी है- ‘अंत्यजो विप्रजातिश्च एक एव सहोदराः. एकयोनिप्रसूतश्च एकशाखेन जायते..’ यानी ब्राह्मण और अछूत सगे भाई हैं. महाभारत के ही वनपर्व के अध्याय-216 के श्लोक-14-15 में निष्कर्ष रूप में कहा गया है- ‘तं ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद् द्विजः’ यानि केवल सदाचार के माध्यम से ही मनुष्य ब्राह्मण कहला सकता है.

गीता जिस संस्कृत ग्रंथ महाभारत का हिस्सा है, उसमें तो दसियों स्थान पर वर्ण और जाति की प्रचलित व्यवस्था पर इतनी कठोर टिप्पणियां की गयी हैं कि इसे देखकर लगता है कि इस काल में जाति-व्यवस्था के विरोध में कोई बड़ी क्रांति या आलोचना अवश्य हुई होगी

कहने का अर्थ यह है कि दुनिया की अन्य भाषाओं की तरह ही संस्कृत भाषा में भी एक क्रिटिकल धारा समानांतर रूप से मौज़ूद रही. क्षेपक या मिलावटबाजियों के जरिए इन शास्त्रों को दूषित करने की कोशिशों के बावज़ूद संस्कृत ग्रंथों में ऐसे एक से बढ़कर एक श्लोक, प्रसंग और भाष्य मौज़ूद हैं, जिनके माध्यम से हम न केवल तत्कालीन सामाजिक संघर्षों को समझ सकते हैं, बल्कि आज भी उससे रोशनी ग्रहण करते हुए एक न्यायपूर्ण समाज की रचना कर सकते हैं. संभव है कि नकली जाति-बाभन पुरोहितों के बीच इक्के-दुक्के ऐसे असली गुण-आधारित ब्राह्मण-वृत्ति के लोग भी बचे हुए थे, जिन्होंने अपने मानवतावादी चिंतन और लेखन का समावेश इन ग्रंथों में किया. इसलिए सबसे पहले हमें ‘ब्राह्मणवादी’ में आए ‘ब्राह्मण’ शब्द को ही इसके नकारार्थक अर्थ से मुक्त करना होगा. बाभनवादी या पुरोहितवादी शब्द संभवतः ज्यादा ठीक होगा. हमें ‘ब्राह्मण’ शब्द को आज के कथित जाति आधारित जन्मना बाभनों से मुक्त कराना होगा. इससे एक फायदा यह होगा कि संपूर्ण संस्कृत साहित्य को ही कथित ‘ब्राह्मणवादी’ या ‘पुरोहितवादी’ न करार देकर हम उसका एक तटस्थ मूल्यांकन कर पाएंगे.

संस्कृत की जीवंतता का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि उसके साहित्य में हर तरह के विचारों का समावेश है

सच है कि सत्तू के साथ-साथ घुन भी पिसा जाता है. लेकिन जब हमारे पास आलोचना, विश्लेषण और सत्यशोधन की चलनी हो, तो हम सत्तू से घुन को अलग भी तो कर सकते हैं. परवर्ती पुरोहितों की मूढ़ताओं की सजा हम एक सुंदर और महान पूरी की पूरी भाषा को क्यों दें? इस मामले में लोग आर्य आक्रमण और वैदिककालीनोत्तर संस्कृत साहित्य का हवाला देते रहते हैं. उनकी जानकारी के लिए यह बताना उचित ही होगा कि संस्कृत भाषा में उपलब्ध प्राचीनतम व्याकरण के लेखक माने जाने वाले पाणिनी ने एक सुविकसित अवैदिक संस्कृत साहित्य की ओर भी इशारा किया है. कठोर से कठोर ऐतिहासिक विवेचन में भी यह तो स्वीकार ही किया जाता है कि ईसा पूर्व 500 तक में संस्कृत एक समृद्ध भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी थी. ईसा पूर्व चौथी सदी में हुए पाणिनी ने अपने अष्टाध्यायी के सूत्रों 4/3/87 एवं 88 में अपने से पहले के ऐसे लेखकों और साहित्यों का जिक्र किया है जिससे पता चलता है कि उनसे पहले भी पर्याप्त मात्रा में अवैदिक संस्कृत साहित्य खूब समृद्ध हो चुका था.

संस्कृत भाषा दुनिया की उन प्रथम भाषाओं में से एक है जिसने अहिंसा, सत्य, चोरी और संग्रह न करने, निर्भयता, निर्वैरता और सभी मनुष्यों की समानता जैसे आध्यात्मिक और नैतिक जीवन के आदर्शों को सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया था

संस्कृत भाषा को हिन्दुओं की भाषा मानने या बनाने की मूढ़ता को भी हमें समझना होगा. ऐसे प्रयासों को सतत उजागर करते रहना होगा. क्योंकि इसे किसी जमाने में आज के हिंद क्षेत्र में बसी सभ्यता की भाषा तो कह सकते हैं, लेकिन इसे आज के संप्रदायमूलक हिन्दुओं की भाषा करार देना, इस व्यापक, जागतिक और मुक्त भाषा को संकुचित कर देने का दुष्प्रयास ही कहा जाएगा. संस्कृत भाषा के ऐसे हिन्दूमना रक्षक इस भाषा के भक्षक ही साबित होंगे और हो रहे हैं. वास्तव में, संस्कृत भाषा और इसके साहित्य को दुनियाभर में फैलाने में यूरोपीय विद्वानों ने अहम् भूमिका निभाई थी. निश्चित ही भाष्य और विवेचन के स्तर पर उनसे कुछ गलतियां भी हुईं. लेकिन सभ्यतागत संदर्भों को समझने की उनकी सीमा और उनके योगदानों को देखते हुए ये गलतियां क्षम्य ही कही जा सकती हैं.

प्रगतिशीलता के नाम पर भाषामात्र के विरोध की ऐसी नकली और प्रतीकात्मक क्रांतियों से हम अपनी मौलिक धरोहरों को नहीं बचा पाएंगे. अपने अतीत की हर धरोहर से केवल घृणा करके इस घृणा का बोझ ढ़ोते रहने वाली पीढ़ियां कैसा मुक्तचिंतन कर पाएंगी? संस्कृत भाषा दुनिया की उन प्रथम भाषाओं में से एक है जिसने अहिंसा, सत्य, चोरी और संग्रह न करने, निर्भयता, निर्वैरता और सभी मनुष्यों की समानता जैसे आध्यात्मिक और नैतिक जीवन के आदर्शों को सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया था. आज के भौतिकवादी अहंकार में हम उसकी सूक्ष्मता को समझ पाने तक के विवेक से वंचित होते जा रहे हैं. ‘ईशावास्यं इदं सर्वम्’ के रूप में सभी मनुष्य और ईश्वर एक है से भी आगे जाकर सभी प्राणी और पदार्थ तक एक ही हैं, इसकी सर्वप्रथम् घोषणा करने वाले उपनिषद् इसी भाषा में लिखे गए. ये बातें केवल इस भाषा के अतिशयोक्तिपूर्ण या कथित राष्ट्रवादी महिमामंडन का विषय नहीं हैं.

दुनिया की अन्य महान भाषाओं की तरह ही तत्कालीन सामाजिक अन्तर्विरोधों और परस्पर-विरोधी विचारों का संघर्ष और समन्वय संस्कृत में भी देखने को मिलता है

संस्कृत भाषा में सभी प्रकार के दर्शन, आध्यात्मिक और लौकिक जीवन-विद्या, ज्ञान-विज्ञान और मानवतावादी साहित्य का विकास हुआ. दुनिया की अन्य महान भाषाओं की तरह ही तत्कालीन सामाजिक अन्तर्विरोधों और परस्पर-विरोधी विचारों का संघर्ष और समन्वय इसमें भी निश्चित ही देखने को मिलता है. इसलिए इसे प्रतिक्रियावादी राजनीति का शिकार होकर हम एक ही डंडे से हांकने लगें, यह कहां से उचित है?

आज इस राजनीति से प्रभावित होकर हम कई शास्त्रीय संदर्भों के अर्थ का अनर्थ भी करते जा रहे हैं. अपनी ही भाषायी विरासत के सरलार्थीकरण और सतहीकरण का आत्मघाती खेल खेलने में लगे हैं. हम अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं को कथित फिरंगियों की भाषा कहकर नहीं नकार पाए, जबकि उसमें दास-प्रथा से लेकर रंगभेद, उपनिवेशवाद, यहूदी-विनाश, क्रूसेड और विध्वंसक युद्धों तक को जायज ठहराने वाले साहित्य लिखे गए. दूसरी ओर इसी अंग्रेजी और यूरोपीय भाषाओं में महान मानवतावादी साहित्यों की भी रचना हुई है. इसलिए हिंदूवाद और पुरोहितवाद के विरोध में भाषामात्र को ही अपनी राजनीति के निशाने पर लेने वाले समूहों को सोचना होगा कि कहीं वे धान की भूसी-खखड़ी के साथ-साथ चावल को भी फेंकने की गलती तो नहीं कर रहे हैं. एक पुरानी बात फिर से दोहराते हुए कि क्या हम कबीरदास से यह नहीं सीख सकते कि ‘सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय’.