दुनिया भर के सातों महाद्वीपों में जब सात आसमानों के पार से सूरज अपने सात घोड़ों पर सवार होकर निकलता है तो हफ्ते के सात दिनों में से कोई एक दिन शुरू होता है. इस ख़ास दिन में अगर आपके सातों ग्रह (ज्योतिष में राहु और केतु छायाग्रह माने जाते हैं और इसलिए ग्रहों की असल संख्या सात ही कही जाती है) की स्थिति सही रहे तो हो सकता है आपके साथ सात अजूबों से भी अजब कोई घटना घट जाए. इसके घटते ही हो सकता है आपकी जिंदगी में सातों रंग घुल जाएं या आपके चारों तरफ सात सुरों की सरगम बजने लगे. पिछली जो तीन पंक्तियां आपने पढ़ीं उनमें सात से ज्यादा बार सात का जिक्र किया गया है. लेकिन सात के प्रति हमारा लगाव सिर्फ इन्हीं बातों पर ख़त्म नहीं हो जाता. अगर आप अपने आस-पास नजर घुमाकर देखें तो आपको अनगिनत बार सात के अंक की महिमा नजर आ सकती है.

यह हमारी संस्कृति में भी शामिल है. जैसे कि शादी करते हुए सात वचन या सात फेरे लेकर दो लोग सात जन्मों के लिए जुड़ जाते हैं. कहानियों की बात करें तो सिंदबाद जहाजी अपनी कहानियों में सात समुद्री अभियानों पर जाता है. जेम्स बॉन्ड आते ही अपने अंदाज में जीरो-जीरो-सेवन कहकर अपना परिचय देता है. भाषा की बात करें तो गलती हो जाने पर, माफी देने की सूरत में सात खून ही माफ़ किए जाते हैं और उलाहना देने की नौबत आने पर कहा जाता है कि डायन भी सात घर छोड़कर वार करती है.

अगर आप राह चलते किसी भी व्यक्ति से एक से दस के बीच में से कोई अंक चुनने को कहें तो एक तिहाई संभावना इस बात की होती है कि वह सात कहेगा. यह बात प्रयोगों से भी साबित हुई है. जून, 2015 में न्यूकैसल यूनिवर्सिटी ने ‘नंबर्स फेस्टिवल’ आयोजित किया था. इस आयोजन का उद्देश्य गणित के प्रति लोगों की समझ बढ़ाना था. यहां जब लोगों से एक से दस के बीच उनका पसंदीदा अंक पूछा गया तो एक बड़े हिस्से ने सात को चुना. इस चयन की वजह पूछने पर उनमें से ज्यादातर लोग यह बता पाने की स्थिति में नहीं थे. उन्हें बस एक अंक चुनना था और सहज प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सात को चुन लिया. अब सवाल है कि इन आम लोगों के मन में सात के प्रति यह अनजाना झुकाव कैसे पैदा हुआ?

कुदरत का भी कुछ मामलों में सात के प्रति झुकाव है. जैसेे जीव विज्ञान के मुताबिक हर सात साल की अवधि में मनुष्य का शरीर पूरी तरह बदल जाता है

सात एक ऐसा अंक है जो ज्यादातर धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ या भाग्यशाली समझा जाता है और कई धार्मिक प्रतीकों, कर्मकांडों और रस्मों का हिस्सा है. यह एक बड़ी वजह मानी जा सकती है कि लोग अकसर सात के अंक को वरीयता देते नजर आते हैं. मनोवैज्ञानिक जॉर्ज ए मिलर ने सन 1956 में ‘द मैजिकल नंबर सेवेन, प्लस ऑर माइनस टू’ शीर्षक से प्रकाशित हुए एक शोधपत्र में लोगों के अंक सात चुनने की आदत का विश्लेषण किया था. उनके मुताबिक ज्यादातर लोगों को लगता है कि सात उन्हें यूं ही पसंद आ जाता है. लेकिन इस ‘यूं ही’ की बुनियाद भी शायद इसी तथ्य में है कि सात एक ऐसा अंक है जो हमसे बार-बार टकराता रहता है. यह अंक हमारी धार्मिक मान्यताओं से लेकर हमारी कहावतों तक में शामिल है. इसलिए लोगों के लिए सात का अंक चुनना हमेशा सुविधाजनक लगता है. इसलिए जाने-अनजाने वह हमें पसंद आने लगता है.

इस अंक के जिक्र के साथ यह जानना दिलचस्प होगा कि कुदरत का भी कुछ मामलों में सात के प्रति झुकाव है. जैसेे जीव विज्ञान के मुताबिक हर सात साल की अवधि में मनुष्य का शरीर पूरी तरह बदल जाता है. सात साल में वह एक शिशु से एक बालक में बदलता है, उसके बाद सात से चौदह की उम्र में बालक से किशोर और फिर चौदह से इक्कीस साल की उम्र में किशोर से युवा में बदल जाता है. यह क्रम लगातार उसके युवा से अधेड़ और उसके बाद बूढ़े हो जाने तक चलता ही रहता है.

मनोविश्लेषकों के मुताबिक सात को चुनने के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि एक से दस के बीच इसका गणितीय मान अपने आप में खास होता है

जीव विज्ञान बताता है कि इंसानी दिमाग की तात्कालिक स्मरण शक्ति इतनी ही होती है कि वह किन्हीं सात चीजों को एक समय में याद रख पाए. इसका मतलब है कि अगर किसी व्यक्ति को अलग-अलग तरह की अनगिनत वस्तुएं दिखाई जाएं तो इस बात की संभावना ज्यादा होगी कि वह उनमें से सिर्फ सात को याद रखे और उनके नाम दोहरा पाए. सन 2008 में तीन अमेरिकी न्यूरोलॉजिस्टों मिग्लॉयर, नोवारा और टिगोलो ने स्मरण शक्ति पर एक प्रयोग किया था. इससे पता चला कि दिमाग में कोई जानकारी सबसे अच्छी तरह से तब सुरक्षित होती है जब मस्तिष्क में मौजूद डेंड्राइट (सूचना इकट्ठा करने वाले विशेष तंतु) में होने वाले स्पंदनों को संख्या सात हो. दूसरे शब्दों में कहा जाए मस्तिष्क में किसी सूचना के लिए हुए सात स्पन्दनों के बाद हम उसे सबसे अच्छे तरीके से याद रख पाने में सफल होते हैं.

मनोविश्लेषकों के मुताबिक सात को चुनने के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि एक से दस अंकों के बीच इसे चुनना कई परिस्थितियों में किसी भी समझदार व्यक्ति के लिए बेहद सुविधाजनक होता है. मान लीजिए आपसे आपके किसी गुण के आकलन के लिए 1-10 में से किसी अंक का चयन करने के लिए कहा जाता है. ऐसे में यदि आप पांच चुनते हैं तो वह आपको बिलकुल साधारण बना देता है. लेकिन पांच से कम किसी अंक को चुनना खुद को कमतर आंकना कहा जाएगा. वहीं दूसरी तरफ यदि आठ और नौ का चयन किया जाए तो दस के ज्यादा नजदीक होने की वजह से इनके साथ उत्कृष्टता का भाव और उससे जन्मा दबाव जुड़ा होता है. ऐसे में सात ऐसा अंक बचता है जो आपको औसत और सर्वश्रेष्ठ के बीच में बिठा देता है. सात का इतना सुविधाजनक होना भी उसके पसंदीदा अंक होने का एक कारण माना जा सकता है.