महामुख्यमंत्री चुनने को लेकर सत्याग्रह की कवायद में चोटी के जिन दस राज्यों के मुख्यमंत्री हैं, उनमें से सबसे छोटा राज्य दिल्ली ही है. दिल्ली में सबसे कम लोकसभा की सीटें हैं और तकनीकी तौर पर यह पूरा राज्य भी नहीं है. कई अहम मामलों में यह केंद्र सरकार पर निर्भर है. यहां का मुख्यमंत्री अपने निर्णय लेने के पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है. इसके बावजूद महामुख्यमंत्री के चयन में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दूसरे स्थान पर हैं!

विकास के पैमाने पर बात करें तो अरविंद केजरीवाल का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं तो अच्छा जरूर कहा जा सकता है. दिल्ली में बुनियादी ढांचा विकसित करने का काम जिस रफ्तार से शीला दीक्षित के कार्यकाल में चल रहा था, उसमें थोड़ी कमी कुछ लोगों को लग सकती है. लेकिन यहां इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि शीला दीक्षित के कार्यकाल में बुनियादी ढांचा से संबंधित कई बड़ी परियोजनाएं 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों को ध्यान में रखकर काफी तेजी से पूरी की गईं.

विकास के मामले में केजरीवाल की दृष्टि थोड़ी अलग लगती है. ढांचागत विकास के अलावा उन्होंने मोहल्ला क्लीनिक जैसे अपेक्षाकृत छोटे कहे जाने वाले प्रयोगों पर अधिक बल दिया है. छात्रों को कर्ज देने की योजना से लेकर कई और ऐसी योजनाएं उन्होंने शुरू की हैं जिनसे आम लोगों के जीवन पर सीधा असर पड़ता है. इससे विकास का थोड़ा अलग रास्ता खुलता है.

राजनीति में अरविंद केजरीवाल का कुल अनुभव बमुश्किल चार साल का है. ऐसे में दशकों का राजनीतिक अनुभव रखने वाले नेता उन्हें अपना नेता आसानी से नहीं मानेंगे.

गवर्नेंस के मामले में भी अरविंद केजरीवाल कई नए प्रयोग करते दिखते हैं. मोहल्ला सभा का प्रयोग कई लोगों को पसंद आ रहा है. इसके अलावा केजरीवाल सरकार ने आम लोगों से संवाद स्थापित करने के लिए भी कुछ प्रयोग किए हैं. हालांकि, केजरीवाल के कुछ आलोचक और कुछ राजनीतिक जानकार यह आरोप लगाते हैं कि उनके ये कदम पब्लिसिटी स्टंट से अधिक कुछ नहीं हैं. पार्टी के अंदर स्थिति के मामले में उनकी जो स्थिति है, वैसी ही स्थिति कई और क्षेत्रीय पार्टियों के मुख्यमंत्रियों की भी है. यानी कि अपनी पार्टी में अरविंद केजरीवाल सर्वेसर्वा हैं.

अपने राज्य से बाहर असर के मामले में केजरीवाल दूसरे मुख्यमंत्रियों के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत दिखते हैं. पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसमें अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी मजबूत स्थिति में दिख रही है. कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि संभवतः पंजाब में केजरीवाल की पार्टी सरकार भी बना सकती है.

यही वह संभावना है, जो केजरीवाल को दूसरे मुख्यमंत्रियों से अलग करती है. चोटी के जो दस मुख्यमंत्री हैं, उनमें से केजरीवाल को छोड़कर कोई दूसरा ऐसा नहीं है, जो अपने सूबे से बाहर इतनी मजबूत स्थिति में दिख रहा हो. केजरीवाल के बारे में तो यह भी कहा जा रहा है कि उनकी पार्टी न सिर्फ पंजाब में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाली है बल्कि उत्तराखंड, गोवा और गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी वह अपना खाता खोल सकती है. यह संभावना केजरीवाल को और मजबूती दे रही है.

जहां तक रही गठबंधन में स्वीकार्यता की बात तो यहां उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा उनकी अनिश्चितता और अनुभवहीनता है. अब तक की जो केजरीवाल की राजनीति है, उसमें पहले से स्थापित दल उन पर बहुत भरोसा करने की स्थिति में नहीं दिखते हैं. राजनीति में अरविंद केजरीवाल का कुल अनुभव बमुश्किल चार साल का है. ऐसे में दशकों का राजनीतिक अनुभव रखने वाले नेता उन्हें अपना नेता आसानी से नहीं मानेंगे. लेकिन पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात में यदि आम आदमी पार्टी को कामयाबी मिलती है तो यह स्थिति बदल भी सकती है.

महामुख्यमंत्री-2016

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 आखिर नीतीश कुमार में ऐसा क्या है कि वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री हैं?

#2 अनिश्चितता का पर्याय होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल उम्मीदें जगाते हैं

#3 क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पिछली गलतियों से जरूरी सबक ले चुके हैं

#4 शिवराज सिंह 2013 जितने ताकतवर नहीं हैं पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा हैं

#5 ममता बनर्जी : जिनसे पार पाना फिलहाल तो बंगाल में किसी के लिए संभव नहीं लगता

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्री पहले पांच में हो सकते थे और एक इस सूची से बाहर