पढ़ने में कितना भी कटु क्यों न लगे, लेकिन गजल गायकी अब लुप्त है. गजल सम्राट जगजीत सिंह के चले जाने के बाद से ही. ऐसा होना ही था इसका अहसास पहली बार तब हुआ जब गुलजार की आवाज में जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि देता ‘एक आवाज की बौछार था वो’ सुना. वो भावुकता वाले दिन थे – जिस गजल गायक की आवाज ने शब्दों को जीना सिखाया, जिसने शेर और मिसरों को स्कूली किताबों के बोरियत भरे दिनों में साथी बनाया और जिसने हर वो बात गाते हुए कही जिसे कहने के लिए दुनिया के पास समय नहीं था – उसके गुजर जाने पर गजल गायकी के दिन खत्म होने की जुंबिश तो होनी ही थी.

लेकिन अब उस भावुकता को गुजरे अरसा हो चुका है, और जगजीत सिंह के निधन के छह साल बाद गजल गायकी का परिदृश्य भयावह हो चुका है. इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो गजल अब कहीं नजर नहीं आती. न कोई स्थापित गायक उन्हें गा रहा है, न कोई स्थापित गीतकार उन्हें लिख रहा है और न ही नौजवानों को उसकी अनुपस्थिति से पैदा हुए रिक्त स्थान से कोई फर्क पड़ रहा है. एक कमी है जिसे भरने का प्रयास कोई नहीं कर रहा. मुख्यधारा से इतर कुछ सुधीजन गजलें लिख रहे हैं और कुछ हैं जो आज भी गजल गायक कहलाने की हिम्मत रख रहे हैं लेकिन लगता है जैसे पापुलर कल्चर में - जिसकी परिधि में फिल्में और प्राइवेट एलबम आते हैं - गजल गायकी मर चुकी है. अपना मर्सिया पढ़े जाने का इंतजार कर रही है.

पूछने पर आज भी गुजरे जमाने के गजल गायक गजलों की शान में सलाम ही भेजते हैं. गजल गायकी को अपनी पसंदीदा शैली मानते रहने वाले हरिहरन कभी यह मानने को तैयार नहीं रहते कि गजल मर चुकी है और यही कहते हैं कि थोड़े बदलावों के साथ वो फिर वापस लौटेगी. पंकज उधास कहते हैं कि जो प्रतिष्ठा उसने खोई है गजल जल्द ही उसे अपनी पुरानी वाली खासियत के चलते वापस पा लेगी. रूप कुमार राठौड़ की पत्नी सोनाली राठौड़ कहती हैं कि गजल अपने आप में ही सबसे बड़ा हीरो है और उसे खुद को प्रमोट करने के लिए किसी शाहरुख या सलमान की जरूरत नहीं. शुभा मुद्गल कहती हैं कि गजल को सुनने के लिए उर्दू शायरी का भी आनंद लेना जरूरी है, लेकिन हमारी शिक्षा उर्दू पर ध्यान ही नहीं देती और इसीलिए लोग गजलों में गहरे नहीं उतरते. लेकिन सच यह भी है कि अब पुराने गजल गायक भी कोई नये प्रयास नहीं करते. न यूट्यूब का फायदा उठाकर किसी अनसुनी गजल को संगीतबद्ध करते हैं और न ही नये-महंगे कांसर्ट्स में पुरानी गजलें गाते रहने के अलावा इस जानर में कोई खास प्रयोग ही करते हैं.

अनूप जलोटा काफी पहले बाजार की मांग पर गजल गायकी से भजन गायकी की तरफ मुड़ चुके हैं और वापसी का कोई प्रयास करते नजर नहीं आ रहे. गालिब को पुन:परिभाषित करने वाले और लेखन की हर विधा पर लगातार किताबें लिखने वाले गुलजार का भी ‘छैंया-छैंया’ और ‘यार जुलाहे’ के बाद कोई नया गजल-संग्रह आया हो, याद नहीं पड़ता. फेसबुक-ट्विटर पर अपना रचनाकर्म साझा करने वाले कई नये गीतकार भी नज्म खूब साझा कर रहे हैं लेकिन गजल से वे भी दूरी बनाकर चल रहे हैं.

नए गीतकारों की गजल तो छोड़िए कोई भी स्थापित गायक मीर तकी मीर, मोमिन, गालिब, दाग देहलवी, फैज अहमद फैज, नासिर कादरी, इकबाल, फराज, दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र या निदा फाजली जैसे गजलगो तक की अनसुनी गजलों को गाने का प्रयास नहीं कर रहा. आखिरी बार हिंदी फिल्मों में अगर किसी ने गजल को खूबसूरती से अटेम्पट किया था तो वो शायद वरुण ग्रोवर थे, जिन्होंने ‘मसान’ के लिए दुष्यंत कुमार की गजल की टेक लेकर ‘तू किसी रेल सी गुजरती है’ लिखा था. लेकिन वो भी एक फिल्मी गीत था, शुद्ध रूप में गजल नहीं.

कोई भी स्थापित गायक मीर तकी मीर, मोमिन, गालिब, दाग देहलवी, फैज अहमद फैज, नासिर कादरी, इकबाल, फराज, दुष्यंत कुमार, बशीर बद्र या निदा फाजली जैसे गजलगो तक की अनसुनी गजलों को गाने का प्रयास नहीं कर रहा है

ऐसा नहीं है कि अब गजलें कोई सुनना नहीं चाहता. दीवाने आज भी कभी मल्लिका-ए-गजल बेगम अख्तर की पनाह में जाते हैं, कभी मेहदी हसन को तलाशते हैं तो कभी गुलाम अली की मुरकियों के पुन: मुरीद बन जाते हैं. सरलता की चाह में लोग पंकज उधास को ढूंढते हैं, तलत अजीज और फरीदा खानम संग हो लेते हैं, आबिदा परवीन को आईट्यून्स पर खोजते हैं और हर तरह की गजल से रूबरू होने के लिए जगजीत सिंह को अपना यार बना लेते हैं. नयी पीढ़ी तो वैसे भी हर उस चीज के पीछे भागती है जिसे सोशल मीडिया पर कूल बनाकर प्रस्तुत किया जाता है इसलिए उसे रिझाना मुश्किल नहीं है. एकबारगी ऐसा ही अभिनव प्रयास पंकज उधास की ‘चुपके-चुपके’ और ‘यूं मेरे खत का जवाब आया’ नाम की गजलों में जान अब्राहम संग कूल म्यूजिक वीडियोज बनाकर किया भी जा चुका है. लेकिन उसके लिए गजल बनानी पड़ेगी, उसे आवाम तक पहुंचाना पड़ेगा और महीने भर में सैकड़ों गाने रिलीज करने वाली हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पास गजल के लिए इतना भर वक्त भी नहीं है.

गजल एक गौरवशाली इतिहास और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है

कहते हैं कि गजल हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है और इसका जन्म अरब देशों में हुआ. पहली गजल अरबी में कही गई और फिर सीमाएं लांघते हुए पहले इसकी जुबान फारसी हुई और फिर उर्दू. इसी बदलाव के साथ उसमें सूफियत समाई और उसका विस्तार इश्के मजाजी से होते हुए इश्के हकीकी हो गया. सांसारिक प्रेम से आध्यात्मिक प्रेम की तरफ. शुरुआती दौर में गजल की निंदा यह कहकर की गई कि यह विधा सिर्फ ‘औरतों की बातें’ करती है और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस विधा से जुड़ी एक कहानी कहती है कि गजल शब्द की उत्पत्ति गजाला (हिरणी) से हुई. जब गले में तीर लगने से हिरणी बेतहाशा दर्द में कराहने लगी तो आह निकलती उस आवाज के उतार-चढ़ाव पर पहली गजल कही गई. इसी भावार्थ एक कहानी गुलाम अली ने भी अपने कार्यक्रम में सुनाई थी और रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी ने इसी तर्ज पर बहुत पहले गजल की खूबसूरत व्याख्या की थी, ‘जब कोई शिकारी जंगल में कुत्तों के साथ हिरणी का पीछा करता है और हिरणी भागते-भागते किसी ऐसी झाड़ी में फंस जाती है जहां से वो निकल नहीं सकती, उस समय उसके कंठ से एक दर्द भरी आवाज निकलती है. उसी करूण आवाज को गजल कहते हैं. इसीलिए विवशता का दिव्यतम रूप में प्रकट होना, स्वर का करुणतम हो जाना ही गजल का आदर्श है.’ वाह!

कहते हैं कि गजल हजार साल से भी ज्यादा पुरानी है और इसका जन्म अरब देशों में हुआ. पहली गजल अरबी में कही गई और फिर सीमाएं लांघते हुए पहले इसकी जुबान फारसी हुई और फिर उर्दू

कालांतर में हिरणी की इस आह की जगह प्रेमिकाओं ने ले ली और प्रेम व श्रृंगार रस में डूबकर गजलें उनकी व्यथा व विरह-कथा कहने लगीं. जैसा कि हिंदुस्तान के शुरुआती अहम उर्दू शायर मीर तकी मीर ने लिखा, ’नाजुकी उस के लब की क्या कहिए, पंखुडी एक गुलाब की सी है.’ गजल का सफर मीलों लंबा है और प्रेमिकाओं के हुस्न, यौवन और प्रेम से होता हुआ फैज अहमद फैज के पास आते-आते राजनीतिक भी हुआ. उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे से लिखा, ‘मता-ए-लौहो कलम छिन गई तो क्या गम है, कि खूने-दिल में डुबो ली हैं उंगलियां मैंने’. लेकिन इससे बहुत पहले फारसी से उर्दू की तरफ आने में गजल को लंबा वक्त लगा और उर्दू का वो पहला शायर जिसका काव्य-संकलन (अर्थात् दीवान) प्रकाशित हुआ, उनका नाम मोहम्मद कुली कुतुबशाह था. वे दकन के बादशाह थे और इनकी शायरी में फारसी और उर्दू के अलावा उस वक्त की दकनी बोली भी शामिल थी.

कुतुबशाह से काफी पहले, 13वीं-14वीं सदी में आमजन की खड़ी बोली में लिखने वाले अमीर खुसरो हुए जिन्हें आम हिंदुस्तानी भाषा में गजल लिखने की परंपरा की शुरुआत करने वाला माना जाता है. चूंकि उनपर हजरत निजामुद्दीन औलिया का प्रभाव था इसलिए उनकी गजलें स्त्री की मोहब्बत में सराबोर होने के बावजूद सूफी मिजाज में गहरी डूबी होती थीं. अमीर खुसरो के बाद संत कबीर ने भी गजल को इसी रूप में अपनाया और उनसे व खुसरो से होकर गुजरने के बाद गजल गोलकुंडा के बादशाह मुहम्मद कुली कुतुबशाह के सानिध्य में आई. वहां से मुगल बादशाह शाहजहां के समय में औरंगाबाद और वली के साथ-साथ दिल्ली. औरंगजेब की हुकुमत वाले उन दिनों में फारसी का चलन था लेकिन बादशाह से लेकर आमजन तक ने उर्दू और हिंदवी के मेल से बनी इस गजल को हाथों-हाथ लिया और आने वाले वक्त में मीर तकी मीर से लेकर मिर्जा गालिब तक ने गजल के उस रूप को हमेशा के लिए स्थापित कर दिया जिसे आज भी नये तौर-तरीकों के साथ लिखा और गाया जाता है.

अलग-अलग दिशाओं की इन यात्राओं से बहुत पहले गजल अपने शुरुआती दौर में शहंशाहों के दरबारों में पली-बढ़ी और मातहतों द्वारा राजा-महाराजाओं की तारीफ में इसे ‘कसीदों’ की तरह पढ़ा गया. चूंकि ये बादशाहों की शान में पढ़ी जाती थी इसलिए धीरे-धीरे इसका अंदाज ऐसा विकसित हो गया कि बहर में पढ़ते ही (मीटर में) इसपर वाहवाही मिलती और गजल-शेर की तारीफ कर मातहत अपने बादशाहों को खुश किया करते (गजल की इस खासियत को रघुपति सहाय ‘बंदिश की चुस्ती’ कहा करते थे).

कुतुबशाह से काफी पहले, 13वीं -14वीं सदी में आमजन की खड़ी बोली में लिखने वाले अमीर खुसरो हुए जिन्हें आम हिंदुस्तानी भाषा में गजल लिखने की परंपरा की शुरुआत करने वाला माना जाता है

हमारे गालिब भी इसी प्रथा के दरबारी शायर रहे जो राजाओं के कसीदे तो नहीं पढ़ते थे, लेकिन उनकी गजलें तुरंत मिलने वाली वाहवाही और त्वरित तारीफों की चाह से लबरेज रहा करती थीं. अनेकों वर्षों बाद आज भी उनकी शायरी की लोकप्रियता की एक वजह उनके रचनाकर्म का यह आयाम भी है, वरना शायर तो मीर तकी मीर भी बहुत अच्छे थे! ‘पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग तो सारा जाने है’, नहीं सुना क्या आपने?

मीर तकी मीर (1723-1810) को हमारे यहां उर्दू गजल का पिता भी कहा जाता है. खुदा-ए-सुखन भी. इन्होंने काफी कुछ फारसी में लिखा लेकिन जब उर्दू में लिखा तब आमजन से जोड़कर गजल को उसका असली रुतबा बख्शा. 18वीं शताब्दी आते-आते गजल मुगलों के साथ-साथ दक्षिण और उत्तर भारत के कई हिस्सों में फैल चुकी थी लेकिन दिल्ली में इसे शान और शौकत मीर की ही कलम से मिली. मीर के बाद मजहर, सौदा, मोमिन, जौक के अलावा मिर्जा गालिब (1796-1869) भी अगले दौर के अहम हस्ताक्षर बने और चचा गालिब तो कुछ ऐसे अमिट हुए कि न सिर्फ शायरी के सिरमौर कहलाए बल्कि जिनके नाम के बिना गजल की पहचान वैसी ही है जैसी अनगिनत आमों के बिना आम के किसी विशाल पेड़ की या किसी गुलजार के बिना त्रिवेणी की. गालिब के बाद आए शायरों में अलग से दाग देहलवी (1831-1905) का नाम अदब से लिया जाता है जिन्होंने गजल कहने का एक अलग मुहावरा गढ़ा और आने वाली कई पीढ़ियों के लिए वे गजल के स्कूल कहलाए.

कई बदलावों के साथ बहते-बहते गजल देर से ही सही हिंदी के आसमां के नीचे भी आई और दुष्यंत कुमार त्यागी ने हिंदी में कमाल की गजलें लिखीं. हिंदी में सर्वप्रथम गजलें लिखने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को दिया जाता है, लेकिन दुष्यंत कुमार हिंदी की गजलों के उस क्रांतिकारी हस्ताक्षर के तौर पर याद किए जाते रहेंगे जिनकी वजह से कई हिंदी भाषियों ने गजल को न सिर्फ समझा-पढ़ा बल्कि उनकी यह सोच कि ‘उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती है तो उसमें फर्क करना बड़ा मुश्किल होता है’ ने हमें गजल के सफर की उस यात्रा को भी इस लेख में साझा करने की वजह दी जिसमें वो बादशाहों की महफिलों में पैदा हुई, अनजान देशों और अजनबी भाषाओं में खेली और बड़े होते-होते हिंदुस्तान के आम आदमी के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई.

गालिब भी पुरानी प्रथा के दरबारी शायर रहे जो राजाओं के कसीदे तो नहीं पढ़ते थे, लेकिन उनकी गजलें तुरंत मिलने वाली वाहवाही और त्वरित तारीफों की चाह से लबरेज रहा करती थीं

दुष्यंत कुमार के बाद अदम गोंडवी की हिंदी गजलें (‘समय से मुठभेड़’) हमारे वक्त का सबसे जरूरी सामान हैं जिन्होंने यथार्थवादी गजल परंपरा को आगे बढ़ाने में दुष्यंत कुमार बराबर ही योगदान दिया. शेर और मिसरे जब आग बरसाते हैं तब वो अदम गोंडवी की गजलों में ही पाए जाते हैं. दुष्यंत और अदम से बहुत पहले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से लेकर त्रिलोचन और शमशेर बहादुर सिंह तक ने भी उम्दा हिंदी गजलें लिखीं और इनमें से कई गुजरते वक्त के साथ इनकी कालजयी कविताओं बराबर ही मकबूल हुईं.

गजल गायकी के इतिहास की जगह गजल के इतिहास की छोटी-सी झलक यहां लिखने के पीछे की मंशा सिर्फ एक सवाल पूछना है. क्या वह समृद्ध विधा जिसका इतिहास इस कदर गौरवपूर्ण और बेमिसाल है, सिर्फ इसलिए खत्म हो जानी चाहिए कि अब वो बाजार के काम की नहीं रही? या फिर इसलिए क्योंकि कोई कहने-सुनाने वाला नहीं रहा, ‘जिसको मैं ओढ़ता बिछाता हूं, वह गजल आपको सुनाता हूं’?

बिलकुल नहीं.