2004 में जब चंद्रबाबू नायडू अविभाजित आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हुए थे तो राज्य के लोगों को भले ही बहुत आश्चर्य नहीं हुआ हो लेकिन राज्य से बाहर के लोगों को बड़ा अचरज हुआ था. वह दौर ऐसा था जब चंद्रबाबू की पहचान एक ऐसे मुख्यमंत्री की बनी थी जिसने विकास को एक नया आयाम दिया था. जिसने हैदराबाद को साइबराबाद की नई पहचान दिलाई थी. माहौल कुछ ऐसा बना था कि कई उत्तर भारतीय राज्यों के लोग भी चाहते थे कि उनके प्रदेश का मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जैसा कोई व्यक्ति बने.

जिस दौर में चंद्रबाबू नायडू की ऐसी छवि बनी थी, उस दौर में केंद्र की सत्ता की अगुवाई भारतीय जनता पार्टी के अटल बिहारी वाजपेयी कर रहे थे. उनके नेतृत्व में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी एक तरह से सबसे अहम सहयोगी थी. कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि नायडू का जलवा उस सरकार में कुछ ऐसा था कि वे अपनी हर बात वाजपेयी से मनवा लेते थे. लेकिन जब 2004 में वे चुनाव हार गए तो इस चकाचौंध के पीछे की बातों की पड़ताल होने लगी. पता चला कि जिस दौर में चंद्रबाबू नायडू विकास और गवर्नेंस के पोस्टर ब्वाॅय बनकर उभर रहे थे, उसी दौर में आंध्र प्रदेश के गांवों में किसानों की आत्महत्या चरम पर पहुंच गई थी. प्रदेश का ग्रामीण हिस्सा बाहरी चकाचौंध में कहीं खो सा गया था.

अगर 2019 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी को सियासी तौर पर घेरने की कोई मजबूत रणनीति बनती है तो उसकी अगुवाई करते हुए वे नीतीश कुमार के साथ भी दिख सकते हैं.

2004 में जितनी मजबूती से कांग्रेस वाईएस राजशेखर रेड्डी की अगुवाई में आंध्र प्रदेश की सत्ता में आई, उसने चंद्रबाबू नायडू और उनकी पार्टी तेलगूदेशम के लिए आगे की राह बेहद मुश्किल कर दी. लेकिन राजशेखर रेड्डी के असमय निधन और राज्य के बंटवारे से जो सियासी स्थिति पैदा हुई, उसने चंद्रबाबू नायडू को एक बार फिर से खड़ा होने का मौका दे दिया. रही-सही कसर कांग्रेस की आंतरिक खींचतान की वजह से राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी के अलग पार्टी बनाने और मोदी लहर ने पूरी कर दी. नतीजा यह हुआ कि दस साल बाद यानी 2014 में चंद्रबाबू नायडू एक बार फिर से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए.

इस कार्यकाल में उनके सामने दूसरी चुनौतियां रहीं. हैदराबाद के तेलंगाना में चले जाने से आंध्र प्रदेश के लिए नई राजधानी बनाना उसकी बड़ी चुनौतियों में से एक है. लेकिन अमरावती में जिस तरह की राजधानी वे तैयार करा रहे हैं, उसकी अभी से ही काफी चर्चा है. चंद्रबाबू नायडू 2004 के पहले की गलतियों को भी इस बार दोहराते हुए नहीं दिख रहे हैं. उनका विकास का माॅडल अब अधिक समावेशी दिख रहा है. गवर्नेंस में भी वे कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं.

कुल मिलाकर देखा जाए तो विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर वे बेहद मजबूत स्थित में दिखते हैं. पार्टी के अंदर उनकी हैसियत तो सबसे अधिक है ही लेकिन उनकी एक बड़ी खासियत यह है कि उनकी एक राष्ट्रीय पहचान है. उनके अपने राज्य के बाहर के लोग भी उन्हें अच्छे से जानते हैं. गठबंधन की राजनीति में आज वे भले ही भाजपा के साथ खड़े नजर आ रहे हों लेकिन उन्होंने राजनीति में अपनी पहचान ऐसी बनाई है कि वे सबके लिए स्वीकार्य हैं. भाजपा के साथ रहते हुए भी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के मसले पर वे उसे घेरते नजर आते हैं.

कहा तो यह भी जा रहा है कि नीतीश कुमार के साथ उनका संवाद चल रहा है और अगर 2019 के आम चुनावों में नरेंद्र मोदी को सियासी तौर पर घेरने की कोई मजबूत रणनीति बनती है तो उसकी अगुवाई करते हुए वे नीतीश कुमार के साथ भी दिख सकते हैं.

महामुख्यमंत्री-2016

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 आखिर नीतीश कुमार में ऐसा क्या है कि वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री हैं?

#2 अनिश्चितता का पर्याय होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल उम्मीदें जगाते हैं

#3 क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पिछली गलतियों से जरूरी सबक ले चुके हैं

#4 शिवराज सिंह 2013 जितने ताकतवर नहीं हैं पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा हैं

#5 ममता बनर्जी : जिनसे पार पाना फिलहाल तो बंगाल में किसी के लिए संभव नहीं लगता

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्री पहले पांच में हो सकते थे और एक इस सूची से बाहर