2016 में पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करके ममता बनर्जी ने राज्य में अपनी सत्ता बरकरार रखी है. सत्याग्रह के महामुख्यमंत्री सर्वेक्षण में वे पांचवे स्थान पर हैं.

2011 के मुकाबले 2016 की ममता बनर्जी की कामयाबी एक अलग कहानी कहती है. 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में एक देशव्यापी लहर बनी थी. इसमें न सिर्फ भाजपा ने अपने बूते केंद्र में सरकार बनाई बल्कि पार्टी को उन राज्यों में भी खाता खोलने में कामयाबी मिली, जहां उसे पहले कार्यकर्ता तक नहीं मिलते थे.

हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनावों में भी ममता बनर्जी की पार्टी का जलवा बरकरार था और भाजपा पश्चिम बंगाल में सिर्फ अपनी मौजूदगी ही दर्ज करा पाई थी. लेकिन चुनाव के बाद ऐसा माहौल बना कि जैसे 2016 में बंगाल में मुकाबला ममता बनाम भाजपा होने वाला है. सारदा चिटफंड से लेकर बम विस्फोटों तक के मामलों में जिस तरह की घेरेबंदी तृणमूल कांग्रेस की या यों कहें कि ममता बनर्जी की की गई, उससे लगा कि भाजपा हर हाल में उनसे दो-दो हाथ करना चाहती है.

उनकी छवि धर्मनिरपेक्ष और ईमानदार नेता की तो है लेकिन सियासी लोग उनके व्यवहार के उतावलेपन को इस मामले में उनकी राह की सबसे बड़ी बाधा मानते हैं

लेकिन बिहार में मुंह की खाने के बाद बंगाल को लेकर भाजपा की रणनीति बदली-बदली नजर आने लगी. भाजपा के रणनीतिकारों को लगा कि ममता को घेरना आसान नहीं है. उन्हें लगा कि बंगाल से काफी कम मेहनत करके असम में जीत हासिल की जा सकती है. 2016 में हुए विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा के रुख में आए इस बदलाव ने कहीं न कहीं यह साबित कर दिया कि अभी की स्थिति में बंगाल में ममता से पार पाना बेहद मुश्किल है.

कांग्रेस और वाम दल भी रणनीतिक साझेदारी के बावजूद ममता बनर्जी को चुनौती नहीं दे पाए और उन्होंने सत्ता में भारी बहुमत के साथ वापसी की. इससे साफ हो गया कि बंगाल के लोगों ने ममता के विकास और गवर्नेंस के मॉडल में विश्वास जताया है. सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की वजह से ममता बनर्जी पर यह आरोप भी लगता रहा कि वे उद्योग विरोधी हैं. लेकिन फिक्की के चेयरमैन रहे अमित मित्रा को वित्त मंत्री बनाकर और हाल ही में जीएसटी पर केंद्र सरकार का समर्थन करके ममता अपनी इस छवि को बदलने की कोशिश करती हुई दिखीं.

पार्टी में ममता की हैसियत को लेकर किसी के मन में कोई सवाल नहीं रहना चाहिए. रही बात अपने प्रदेश के बाहर असर की तो इस पैमाने पर भी ममता कई दूसरे मुख्यमंत्रियों के मुकाबले काफी आगे दिखती हैं. वे एक ऐसी नेता हैं जिन्हें देश के अधिकांश राज्यों के लोग कम से कम पहचानते तो हैं ही. पूर्वोत्तर भारत के कुछ राज्यों में तो उनकी पार्टी के विधायक भी हैं. इन राज्यों में विस्तार को लेकर ममता लगातार काम करती हुई भी नजर आती हैं.

गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता के पैमाने पर वे औसत से थोड़ा आगे दिखती हैं. उनकी छवि धर्मनिरपेक्ष और ईमानदार नेता की तो है लेकिन सियासी लोग उनके व्यवहार के उतावलेपन को इस मामले में उनकी राह की सबसे बड़ी बाधा मानते हैं. इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर अगर कभी कोई विकल्प बनाने की बात चलती है तो नेतृत्व के लिए जिन मुख्यमंत्रियों का नाम सामने आना चाहिए, उनमें एक ममता बनर्जी भी हैं.

महामुख्यमंत्री-2016

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 आखिर नीतीश कुमार में ऐसा क्या है कि वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री हैं?

#2 अनिश्चितता का पर्याय होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल उम्मीदें जगाते हैं

#3 क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पिछली गलतियों से जरूरी सबक ले चुके हैं

#4 शिवराज सिंह 2013 जितने ताकतवर नहीं हैं पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा हैं

#5 ममता बनर्जी : जिनसे पार पाना फिलहाल तो बंगाल में किसी के लिए संभव नहीं लगता

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्री पहले पांच में हो सकते थे और एक इस सूची से बाहर