सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री सर्वेक्षण में छठे से दसवें स्थान पर जो मुख्यमंत्री हैं, उनमें से कम से कम दो ऐसे हैं, जो शीर्ष पांच में आते-आते रह गए. संभव है कि आगे के सर्वेक्षणों में इन दो में से कोई या दोनों चोटी के पांच मुख्यमंत्रियों में दिखें. इनमें पहला नाम है ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का और दूसरा, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता का.

नवीन पटनायक इस सर्वेक्षण में छठे स्थान पर हैं. वे लंबे समय से ओडिशा की सत्ता पर काबिज हैं. पहले वे भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में ओडिशा के मुख्यमंत्री थे. 2008 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बावजूद उनमें ओडिशा के लोगों ने अपना विश्वास बनाए रखा. एक तरह से देखा जाए तो ओडिशा में उन्हें हराना बेहद मुश्किल लगता है. विकास और गवर्नेंस के मामले में उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं तो अच्छा तो माना ही जा सकता है. पार्टी के अंदर हैसियत के मामले में उन्हें पूरे नंबर मिलेंगे.

जहां तक राज्य के बाहर असर की बात है तो इस मामले में वे औसत से नीचे दिखते हैं. उन्हें देश का सियासी और पढ़ा-लिखा वर्ग तो जानता है लेकिन आम लोगों में राजनीतिक पहचान के मामले में वे कम पड़ जाते हैं. हालांकि खास लोगों में पहचान की वजह से गठबंधन राजनीति में वे स्वीकार्य दिखते हैं.

जहां पटनायक अपनी सौम्य छवि की वजह से स्वीकार्य लगते हैं, वहीं जयललिता के आसपास एक ऐसा रहस्यमयी आवरण दिखता है जिससे वे राष्ट्रीय स्तर की गठबंधन राजनीति को थोड़ा कम जंचती हैं.

कुछ इसी तरह की स्थिति तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की है. सत्याग्रह के महामुख्यमंत्री सर्वेक्षण में वे सातवें स्थान पर हैं. जयललिता ने भी तमाम चुनावी सर्वेक्षणों को पीछे छोड़ते हुए इस साल सत्ता में वापसी की है. विकास, गवर्नेंस और पार्टी में हैसियत के मामले में उनकी स्थिति बिल्कुल नवीन पटनायक जैसी है. राज्य से बाहर असर के मामले में भी दोनों की स्थिति एक जैसी है. पटनायक के मुकाबले जयललिता एक जगह पीछे दिखती हैं. वह है गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता.

जहां पटनायक अपनी सौम्य छवि की वजह से स्वीकार्य लगते हैं, वहीं जयललिता के आसपास एक ऐसा रहस्यमयी आवरण दिखता है जिससे वे राष्ट्रीय स्तर की गठबंधन राजनीति को थोड़ा कम जंचती हैं. लेकिन उनका राज्य बड़ा है, इसलिए केंद्र में अगर कोई भी वैकल्पिक राजनीति ढांचा खड़ा करने की बात चलती है तो जयललिता भी उसमें एक धुरी की तरह दिखती ही हैं.

महामुख्यमंत्री सर्वेक्षण में आठवें स्थान पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव हैं. आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद वे नए राज्य को अपने हिसाब से एक दिशा में ले जाते दिखते हैं. विकास और गवर्नेंस के मोर्चे पर उनकी एक सोच है और वे उस सोच के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं. कई लोगों को उनकी यह सोच तेलंगाना में उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली लगती है लेकिन संभवतः राव ने यह रास्ता इसलिए पकड़ा है क्योंकि अभी वहां के लोगों में अलग राज्य के लिए चले आंदोलन की यादें बिल्कुल ताजा हैं. समय के साथ ये यादें धुंधली पड़ेंगी और तेलंगाना की नीतियां भी और अधिक समावेशी हो सकती हैं.

पार्टी के अंदर केसीआर सर्वेसर्वा की स्थिति में हैं. राज्य से बाहर उनके असर को उनकी पहचान के जरिए समझा जा सकता है जो एक ऐसे नेता की है जिसने तेलंगाना के लिए संघर्ष किया. लेकिन दूसरे राज्यों में इस वजह से उन्हें समर्थन मिलता नहीं दिखता. हालांकि गठबंधन राजनीति में वे किसी के लिए अछूत नहीं हैं.

जम्मू कश्मीर सही-गलत कई वजहों से लगातार सुर्खियों में रहता है और इस वजह से वहां के मुख्यमंत्री को दूसरे राज्यों में भी लोग जानते ही हैं.

नौवें स्थान पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह हैं. चोटी के दस मुख्यमंत्रियों में वे सबसे पुराने मुख्यमंत्रियों में से एक हैं. विकास और गवर्नेंस के मामले में रमन सिंह का प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा है. उन्होंने इन दोनों मोर्चों पर कई ऐसे प्रयोग किए जिन्हें बाद में न सिर्फ दूसरे राज्यों में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लागू किया गया. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में स्मार्ट कार्ड का इस्तेमाल जिस तरह से उनकी सरकार ने शुरू किया, उसकी तारीफ हर तरफ हुई.

रमन सिंह कमजोर पड़े हैं तो अपनी पार्टी भाजपा के अंदर अपनी हैसियत के मोर्चे पर. जब नरेंद्र मोदी गांधीनगर तक सीमित थे तो उस वक्त पार्टी के अंदर रमन सिंह की हैसियत अभी के मुकाबले कहीं अधिक थी. लेकिन अब वे इस मोर्चे पर थोड़े कमजोर नजर आते हैं. कुछ उसी तरह जैसे शिवराज सिंह चौहान दिखते हैं. गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता के मामले में भी वे शिवराज सिंह चौहान की बराबरी करते दिखते हैं. मतलब साफ है कि अब तक के उनके कार्यकाल में उन पर कोई ऐसा दाग नहीं लगा कि गठबंधन राजनीति में वे अछूत हो जाएं.

दसवें स्थान पर जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती हैं. वे इसी साल मुख्यमंत्री बनी हैं. उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद से विरासत में मिली है. पिता के निधन के बाद लंबे समय तक विचार-विमर्श करने के बाद वे मुख्यमंत्री बनीं. विकास और गवर्नेंस के मामले में वे अपने पिता की नीतियों को ही आगे बढ़ाते दिख रही हैं. पार्टी के अंदर उनकी हैसियत सबसे अधिक है.

जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य का मुख्यमंत्री होना, उन्हें एक राष्ट्रीय पहचान दिलाता है. जम्मू कश्मीर सही-गलत कई वजहों से लगातार सुर्खियों में रहता है और इस वजह से वहां के मुख्यमंत्री को दूसरे राज्यों में भी लोग जानते ही हैं. वे इसलिए भी ताकतवर दिखती हैं, क्योंकि जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील समझे जाने वाले राज्य में केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टी के सहयोग से सरकार चला रही हैं. जानने वाले जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर में दिल्ली का कितना दखल होता है. गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता को पैमाने पर भी वे औसत से थोड़ा आगे दिखती हैं.

बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी में जो हुआ उसके चलते महबूबा मुफ्ती पिछले दिनों कुछ कमजोर भी हुई हैं. इसके चलते वे इस सूची में नीचे फिसलते-फिसलते रह गईं. लेकिन जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल छह साल का होता है. अगर इसे देखें तो उनके पास अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अभी भी समय कम नहीं है.

महामुख्यमंत्री-2016

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 आखिर नीतीश कुमार में ऐसा क्या है कि वे सत्याग्रह के पहले महामुख्यमंत्री हैं?

#2 अनिश्चितता का पर्याय होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल उम्मीदें जगाते हैं

#3 क्योंकि चंद्रबाबू नायडू अपनी पिछली गलतियों से जरूरी सबक ले चुके हैं

#4 शिवराज सिंह 2013 जितने ताकतवर नहीं हैं पर भाजपा के मुख्यमंत्रियों में सबसे ज्यादा हैं

#5 ममता बनर्जी : जिनसे पार पाना फिलहाल तो बंगाल में किसी के लिए संभव नहीं लगता

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्री पहले पांच में हो सकते थे और एक इस सूची से बाहर