1958 की बात है. लोकसभा का सत्र चल रहा था. इसी दौरान ट्रेजरी बेंच पर बैठे एक सांसद के बोलने की बारी आई. वह जो कहने वाला था उससे नैतिकता के ऊंचे आदर्शों का दावा करने वाली जवाहर लाल नेहरू सरकार हिलने वाली थी.

सांसद ने बोलना शुरू किया. उसने आरोप लगाया कि भारतीय जीवन बीमा निगम यानी एलआईसी ने कुछ ऐसी कंपनियों के बाजार से कहीं ज्यादा कीमत पर करीब सवा करोड़ रु के शेयर खरीदे हैं जिनकी हालत पतली है. ये कंपनियां कलकत्ता के एक कारोबारी हरिदास मूंदड़ा की थीं. सत्ताधारी पार्टी के ही सांसद की तरफ से हुए इस हमले से विपक्ष और आलोचकों को मानो मनमांगी मुराद मिल गई थी.

इससे सकते में आए तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णमचारी ने पहले तो इससे सीधे इनकार किया. लेकिन यह सांसद अपनी बात पर अड़ा था. आखिर हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अगुआई में एक जांच आयोग बना. आरोप सच साबित हुए. कृष्णमचारी को इस्तीफा देना पड़ा. यह नेहरू सरकार की साफ-सुधरी छवि पर एक बड़ी चोट थी. इस राजनेता का नाम था फीरोज गांधी. विडंबना यह थी कि फीरोज जवाहर लाल नेहरू के दामाद थे.

लेकिन ऐसा काम उन्होंने पहली बार नहीं किया था. जो फीरोज गांधी को जानते थे उनके लिए यह बात अजूबा भी नहीं थी. भारत के सबसे ताकतवर परिवार के इस दामाद को नेहरू की नीतियों के प्रति अपने विरोध के लिए ही जाना जाता था.

फीरोज जहांगीर गंधी (गांधी नहीं) का जन्म 12 सितंबर 19912 को मुंबई (तब बंबई) के एक पारसी परिवार में हुआ था. मुंबई के कई पारसियों की तरह यह परिवार भी गुजरात से यहां आया था. पेशे से मरीन इंजीनियर उनके पिता जहांगीर फरदून भरुच से ताल्लुक रखते थे जबकि उनकी मां रतिमाई सूरत से थीं.

फीरोज के जन्म के कुछ समय बाद ही पहला विश्व युद्ध छिड़ गया. इसके चलते उनके पिता को लंबे समय तक समुद्री यात्राएं करनी पड़तीं. इस वजह से उन्होंने परिवार को इलाहाबाद भेज दिया जहां उनकी बहन शिरीन रहती थीं. शिरीन शहर के एक अस्पताल में सर्जन थीं. इस तरह फीरोज का बचपन इलाहाबाद में ही बीता.

इंदिरा गांधी से मुलाकात

1930 में शहर में कांग्रेस का एक धरना था. कमला नेहरू और इंदिरा गांधी सहित कांग्रेस की कई महिला कार्यकर्ताएं इसमें हिस्सा ले रही थीं. संयोग से यह उसी कॉलेज के बाहर हो रहा था जहां से फीरोज ग्रेजुएशन कर रहे थे. बताते हैं कि तेज धूप में कमला नेहरू बेहोश हो गईं और इस दौरान फीरोज ने उनकी मदद की. आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों का जज्बा देखकर अगले ही दिन उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए. उसी साल फीरोज गांधी को जेल की सजा हुई और उन्होंने फैजाबाद जेल में 19 महीने गुजारे. तब इलाहाबाद जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष लाल बहादुर शास्त्री भी इसी जेल में थे. बताते हैं कि इसी दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर फीरोज गंधी से फीरोज गांधी रख लिया था. जेल से छूटने के बाद फीरोज तब के यूनाइटेड प्रोविंस (उत्तर प्रदेश) में किसानों के अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलन में शामिल हुए. इसमें उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के साथ करीब से काम किया. इस दौरान उन्हें फिर दो बार जेल हुई.

फीरोज ने 1933 में पहली बार इंदिरा के सामने शादी करने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन इंदिरा और उनकी मां कमला नेहरू ने इससे इनकार कर दिया. तब इंदिरा सिर्फ 16 साल की थीं और इस इनकार के पीछे उनकी मां का यही तर्क था. बाद के वर्षों में फीरोज की नेहरू परिवार से करीबी बढ़ती गई. खासकर कमला नेहरू से. टीबी के चलते जब कमला नेहरू को नैनीताल के पास भोवाली सैनटोरियम में रखा गया तो इस दौरान फीरोज ही उनके साथ रहे. यह 1934 की बात है. बाद में हालत बिगड़ने पर जब उन्हें यूरोप भेजा गया तो भी फीरोज उनके साथ थे. 28 फरवरी 1936 को जब कमला नेहरू ने दम तोड़ा तो फीरोज उनके सिरहाने ही बैठे थे.

शादी

इसके बाद फीरोज और इंदिरा की घनिष्ठता बढ़ती गई. मार्च 1942 में उन्होंने शादी कर ली. बताते हैं कि जवाहर लाल नेहरू इस शादी के खिलाफ थे और उन्होंने महात्मा गांधी से कहा था कि वे इंदिरा को समझाएं. अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इस दंपत्ति को जेल में भेज दिया गया. तब उनकी शादी को छह महीने भी नहीं हुए थे. फीरोज एक साल तक इलाहाबाद की नैनी सेंट्रल जेल में रहे.

इसके बाद के पांच साल इस दंपत्ति के लिए पारिवारिक व्यस्तताओं के साल रहे. फीरोज और इंदिरा के दो बच्चे हुए. 1944 में राजीव का जन्म हुआ और 1946 में संजय का. आजादी के बाद फीरोज और इंदिरा बच्चों के साथ इलाहाबाद चले गए. फीरोज द नेशनल हेराल्ड के प्रबंध निदेशक बन गए. यह अखबार उनके ससुर जवाहर लाल नेहरू ने ही शुरू किया था.

1952 में जब भारत में पहली बार आम चुनाव हुए तो फीरोज गांधी उत्तर प्रदेश के रायबरेली से सांसद चुने गए. तब तक इंदिरा दिल्ली आ गई थीं और इस दंपत्ति के बीच मनमुटाव की चर्चाएं भी होने लगी थीं. हालांकि इंदिरा ने रायबरेली आकर पति के चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी.

अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज

जल्द ही फीरोज अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाली एक असरदार शख्सियत बन गए. 1955 में उनके चलते ही उद्योगपति राम किशन डालमिया के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ. यह भ्रष्टाचार एक जीवन बीमा कंपनी के जरिये किया था. इसके चलते डालमिया को कई महीने जेल में रहना पड़ा. इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि अगले ही साल 245 जीवन बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करके एक नई कंपनी बना दी गई. इसे आज हम एलआईसी के नाम से जानते हैं.

यानी एक तरह से फीरोज गांधी को राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया शुरू होने के पीछे की वजह भी कहा जा सकता है. उन्होंने टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव (टेल्को) के राष्ट्रीयकरण की भी मांग की थी. उनका तर्क था कि यह कंपनी सरकार को जापानियों से दोगुनी कीमत पर माल दे रही है. इसके चलते उनका अपना पारसी समुदाय भी उनके खिलाफ हो गया था. लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की. यही वजह थी कि उनकी प्रतिष्ठा हर पार्टी और वर्ग में थी.

1957 में फीरोज गांधी रायबरेली से दोबारा चुने गए. 1958 में उन्होंने नेहरू सरकार को वह झटका दिया जिसका जिक्र लेख की शुरुआत में हो चुका है.

लोकप्रिय राजनेता होने के बावजूद फीरोज गांधी अपने आखिरी दिनों में अकेले पड़ गए थे. उनके दोनों बेटे राजीव और संजय गांधी अपनी मां के साथ प्रधानमंत्री निवास में ही रहते थे. आठ सितंबर 1960 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.