हमें सीधे इस सवाल का सामना करना चाहिए कि राष्ट्रहित में ज्यादा जरूरी क्या है - कश्मीर का भारत में संवैधानिक विलय या फिर भारत की पकिस्तान से दोस्ती और कश्मीर घाटी के लोगों के साथ न्याय? कानूनी दांव-पेचों में इस सवाल का जवाब नहीं मिल सकता. इसके लिए एक परिपक्व और व्यवहारिक मूल्यांकन की जरूरत है. जहां तक मैं समझता हूं, मौजूदा नीति से होने वाले नुकसान उससे होने वाले फायदों की तुलना में कहीं ज्यादा हैं.

सबसे पहले मैं ‘कश्मीर घाटी के लोगों से न्याय’ के मुद्दे पर चर्चा करूंगा. इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं कि घाटी के लोगों ने इस कानूनी विलय को स्वेच्छा से स्वीकार किया है. किसी भी संवैधानिक एकीकरण की तब तक कोई अहमियत नहीं होती जब तक लोगों का भावनात्मक एकीकरण न हो. आज के दौर में यह तो असंभव है कि छोटी या बड़ी, किसी भी आबादी को स्थायी तौर से बलपूर्वक थामा जा सके. यदि हम ऐसा करना जारी रखते हैं तो कभी भी दुनिया से नजरें मिलाकर लोकतंत्र, न्याय और शांति की बातें नहीं कर सकेंगे. न ही, ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण हम आत्मनिर्णय के अधिकार की सीमाओं का आश्रय ले सकते हैं. कश्मीर के बलपूर्वक विलय की नीति का सबसे हानिकारण परिणाम शायद भारतीय धर्मनिरपेक्षता की मौत और उग्र हिंदू सांप्रदायिकता की ताजपोशी के रूप में सामने आएगा. और तय है कि ऐसी सांप्रदायिकता अंततः हिंदू समुदाय को भी निशाना बनाएगी और उसे नष्ट कर देगी.

जहां तक पकिस्तान से दोस्ती का सवाल है, तार्किक आधारों पर समझते हैं कि हमारे लिए यह कितनी ज्यादा जरूरी है. एक देश, कोई भी कीमत चुकाकर दोस्ती नहीं खरीद सकता. इसलिए फायदे और नुकसान का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं. सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि अगर हम कश्मीर को लेकर अपनी मौजूदा नीतियों पर अड़े रहे तो पकिस्तान के साथ कोई दोस्ती नहीं हो सकती. उस देश के नेताओं ने इस मुद्दे पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है. अगर हम उन पर विश्वास नहीं करते तो इसके लिए दोषी हम ही होंगे.

भारत-पाकिस्तान की दोस्ती जरूरी है, ऐसा मुझे कई कारणों के चलते लगता है. पहला, यदि पाकिस्तान भारत का दुश्मन बन जाता है, और मुझे डर है कि अगर हम अपनी पूर्ण संवैधानिक विलय की नीति पर अड़े रहे तो वह बन ही जाएगा, तो देश की सुरक्षा सौ गुना ज्यादा मुश्किल हो जाएगी. देश के कई हिस्सों - खासकर असम, नेफा (आज का अरुणाचल प्रदेश) और नागालैंड- की सुरक्षा लगभग असंभव हो जाएगी. दूसरी तरफ भारत-पाकिस्तान की दोस्ती स्वतः ही हमारी रक्षा क्षमता को बेहद मजबूती देगी. हमारा संवाद भी खुद ही दस गुना ज्यादा मजबूत हो जाएगा. जहां तक लद्दाख की सुरक्षा का सवाल है, मुझे पूरा यकीन है कि कश्मीर मुद्दे का कोई भी मैत्रीपूर्ण समझौता इसका भी रास्ता खोल देगा.

दूसरी बात यह है कि सौभाग्य से इतिहास और भूगोल, दोनों ने भारतीय उपमहाद्वीप को वह मौका दिया है कि वह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे अहम् भूमिका निभा सके. लेकिन जब तक भारत और पाकिस्तान आपस में ही भिड़ते रहेंगे, दोनों ही देशों की इस क्षेत्र में छा-जाने की काबिलियत बेहद सीमित बनी रहेगी. क्षेत्र के देशों को आकर्षित करने के लिए भारत की कोई भी पहल तब तक प्रभावी नहीं हो सकती, जब तक भारत और पकिस्तान साथ में आगे नहीं बढ़ते. वर्तमान में ये दोनों देश एक-दूसरे को ही काट रहे हैं. इससे एक महाशक्ति के उभरने का जो स्थान बन रहा है उसे और कोई नहीं बल्कि चीन ही भर सकता है.

तीसरी बात यह है कि भारत की दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में जैसी स्थिति है, लगभग वैसी ही स्थिति उसकी पूरी दुनिया में भी है. वैश्विक मंच पर भारत की छवि काफी हद तक कश्मीर को लेकर उसके जूनून और पाकिस्तान से उसके संबंधों के आधार पर तय होती है. इन दो बड़े एशियाई देशों की आपसी लड़ाई ने अफ्रीका और इससे सटे एशिया के हिस्से में भी इन दोनों देशों की साख को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है और इनके कूटनीतिक प्रभाव को भी कम किया है.

चौथा, इन दोनों देशों के झगड़े बहुत बड़े आर्थिक नुकसान की वजह भी बन रहे हैं. इसमें कोई संदेह ही नहीं है कि इन दोनों देशों का विकास बहुत तेजी से हुआ होता अगर ये आर्थिक क्षेत्र में एक-दूसरे को सहयोग करते.

इस झगड़े का अंतिम और एक तरह से सबसे भयावह परिणाम इसका वह मानवीय और नैतिक पहलू है जो लोगों में अलगाव की भावना पैदा होने के खतरे की तरफ इशारा करता है. अगर यह झगड़ा ऐसे ही जारी रहा तो भारत में मुस्लिम और पकिस्तान में हिंदू समुदाय के लोग शक के साए में जीने को मजबूर होंगे और भीषण सांप्रदायिक अशांति का शिकार होंगे. सांप्रदायिक दंगों का डर हमेशा बना रहेगा. ऐसी परिस्थितियां निश्चित ही दोनों तरफ बड़े पैमाने पर खून-खराबे का कारण बनेंगी. भारतीय उपमहाद्वीप का राजनीतिक विभाजन इस तथ्य को कभी नहीं छिपा सकता कि भारत और पकिस्तान के लोग असल में एक ही हैं. यह कोई पहली बार नहीं है जब भारत का राजनीतिक विभाजन हुआ हो. लेकिन अलग-अलग रियासतों और गणराज्यों में बंटने के बाद भी यहां के लोगों में एकता और एक-पहचान की भावना हमेशा बनी रही है. आज, क्षेत्रों के बंटवारे के बाद भी, पश्चिम और पूरब के बंगाली एक ही हैं. इसी तरह दोनों देशों के पंजाबी, सिंधी, पठान, जाट और राजपूत भी एक ही भारतीय पहचान बनाते हैं जो दुनिया के बाकी सभी लोगों से अलग हैं. राज्य बनते-बिगड़ते रहते हैं लेकिन जनता सनातन होती है. इसीलिए मैं मानता हूं कि भारत और पाकिस्तान के लोगों का एक-दूसरे से यह अलगाव मौजूदा झगड़े का सबसे भयावह परिणाम है.

तो संक्षेप में यह वह बैलेंसशीट है जो मैं देख सकता हूं. हमें बचकानी भावनाओं से नहीं बल्कि इन्हीं तर्कों और कारणों से इस विवाद को देखने और सुलझाने की जरूरत है. मैं जानता हूं कि कश्मीर मुद्दे का समाधान अपने-आप में ही भारत-पाकिस्तान की दोस्ती स्थापित नहीं कर देगा. लेकिन यह निश्चित ही इस राह की सबसे बड़ी बाधा को हटा देगा और वह मनोवैज्ञानिक स्थिति बना देगा जो इसके लिए जरूरी है. मैं यह भी जानता हूं कि यह दोस्ती एक-तरफ़ा नहीं हो सकती. लेकिन मैं इस बात से भी आश्वस्त हूं कि यह दोस्ती पकिस्तान के लिए भी उतनी ही उपयोगी है जितनी भारत के लिए और वे भी इसे स्थापित करने के उतने ही इच्छुक होंगे जितना हम खुद को बना सकें.

एक आखिरी बात सरकार में मौजूद नेताओं के लिए. इस महत्वपूर्ण समय में यह उनका कर्तव्य है कि वे जनभावनाओं की फ़िक्र छोड़कर लोगों का नेतृत्व करें. पार्टी में अपना पद और लोकमत गंवाने का डर कमजोर नेतृत्व की ही निशानी होता है. लोकमत बनाना और पिछड़ी सोच वालों को शिक्षित करना एक नेता की ही जिम्मेदारी है. यदि वे इसमें असफल होते हैं तो वे निर्णय की इस घड़ी में देश का भारी नुकसान करेंगे.