नीतू कुमार पूर्व मीडियाकर्मी हैं और नोएडा में रहती हैं.


मेरा बचपन खुशहाल था. छोटे से परिवार में बड़े दिलवाले मम्मी-पापा थे. न किसी तरह का भेदभाव था, न कभी किसी चीज की कमी. कभी कोई दुखद घटना भी नहीं हुई. जब जो चाहा पापा ने मुझे दिया, कभी सबके सामने तो कभी मां से छिपाकर.

परिवार में हम पांच सदस्य थे. मम्मी, पापा, भैया, दीदी और मैं. मुझे लगता था मां और पापा दोनों मुझसे बहुत प्यार करते हैं. लेकिन यह भ्रम एक दिन अचानक ही टूट गया. खाना खाते वक्त मेरी दीदी ने अचार की फरमाइश की तो मां ने मुझसे कहा – ‘मोना (मेरा घर का नाम), जाओ दीदी को अचार दे दो.’ मैंने मना करते हुए कहा कहा – ‘मां मैं थकी हुई हूं. अभी स्कूल से आई हूं. दीदी तो घर पर ही थी. वो क्यों नहीं ले सकती खुद से.’ इतना सुनते ही मां गुस्से में आ गईं और बोली - ‘जो बोला है वो करो.’ मैं पैर पटककर अपना विरोध जताते हुए दीदी के लिए अचार ले आई. उस दिन मुझे अपनी बहन पर बहुत गुस्सा आया. वो मुझसे पांच साल बड़ी थी. फिर भी मन किया उसको दो-चार तमाचे जड़ दूं. मुझे लग रहा था कि वो मुझसे तो काम करवाती है और खुद आराम फरमाती है.

हर रोज शाम को मैं टीवी देखती थी. घर में सांझ दिखाना, आरती करना दीदी का काम था. लेकिन उस दिन मां ने रोल बदल दिया था. टीवी के सामने दीदी डटी हुई थी और पूजा की थाल मेरे हाथ में थी

वो दिन शायद था ही बुरा. हर रोज शाम को मैं टीवी देखती थी. घर में सांझ दिखाना, आरती करना दीदी का काम था. लेकिन उस दिन मां ने रोल बदल दिया. टीवी के सामने मेरी दीदी डटी हुई थी और पूजा की थाली मुझे थामने के लिए कहा गया. मैं परेशान हो गई कि अचानक कुछ सात-आठ घंटे में ऐसा क्या हो गया कि मेरी मां का प्यार मेरे लिए एकदम कम हो गया. मेरे मन में यह सवाल बार-बार कौंध रहा था. क्या बरसों से मेरी ये सोच गलत थी कि मां मुझे दीदी से ज्यादा प्यार करती है. मन जल रहा था कि मां आज दीदी को इतना क्यों चाहने लगी है.

इस नये शक की वजह सिर्फ इतनी थी कि मां सारे काम मुझसे करवाए जा रही थी. मैंने फिर विरोध किया. फिर वही जवाब मिला - 'जो बोल रही हूं वो करो, ज़ुबान मत लड़ाओ.' इतने सबके बाद मेरी तो जैसे दुनिया हिल गई थी. मां ने मुझसे पहले कभी ऐसे बात नहीं की थी. मैंने बड़े दुखी मन से सांझ दिखाई. आरती के वक्त भगवान से सारी शिकायतें भी कर दी – ‘अरे भगवानजी, ऐसा मेरे साथ क्यों हो रहा है? मां अचानक दीदी को ज्यादा प्यार करने लगी है. मुझसे अब कोई प्यार नहीं करता.’

ऐसा अगले चार दिन तक चलता रहा और पांचवें दिन सब नॉर्मल हो गया. दीदी अचार खुद लेने लगी. मैं शाम को टीवी देखने लगी और मां ने फिर पूजा करने का आदेश नहीं सुनाया. मैं उस वक्त करीब 11-12 साल की थी. ज़िंदगी पटरी पर लौट आई थी, पुराना रूटीन जम गया था. लेकिन अगले महीने फिर ऐसा हो गया और फिर हर महीने होने लगा. मां कभी मुझसे प्यार करती और कभी बिल्कुल नहीं करती. एक दिन मैंने उनसे पूछ ही लिया और मां ने हंसकर बस इतना कहा कि एक दिन मुझे यह बात खुद-ब-खुद समझ आ जाएगी.

इस बीच एक और बड़ी बात पड़ोस में हुई. हमारे घर के पास फूलकुमारी रहती थी. महीने में ज्यादातर दिन उसके मम्मी-पापा उसे सचमुच के फूल की तरह रखते और दुलार करते थे. लेकिन हर महीने चार-पांच दिन वो कांटे की तरह घर से बाहर निकाल दी जाती, उसका बिस्तर घर के बाहर गार्डन में लगाया जाता. उन दिनों वो खाना भी अलग बर्तन में ही खाती थी और उसका घर के अंदर आना भी मना था. मेरी दीदी और मां उसे इस हालत में देखकर कुछ कानाफूसी करते थे. लेकिन जब मैं पूछती कि फूलकुमारी के साथ ऐसा क्यों हो रहा है तो वे मुझे कुछ नहीं बताते थे. उल्टा मुझे डांटकर वहां से जाने के लिए कह दिया जाता. ऐसे में मुझे फिर लगता कि मां अब मुझसे प्यार नहीं करती. और फूलकुमारी की मां तो उससे बिल्कुल ही नहीं करती.

पापा के जाने के बाद दीदी और मौसी ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर मुझसे पूछा - 'कब से?' मैंने कहा - 'कल से. जब से स्कूल से आई हूं तब से'

खैर यह सब लंबे समय तक चलता रहा और एक दिन वो हुआ जिसने मुझे बुरी तरह डरा दिया. मेरी मां का एक छोटा-सा ऑपरेशन हुआ था और वो अस्पताल में भर्ती थी. मैं स्कूल में स्पोर्ट्स डे की तैयारी कर रही थी. घर में हमारा ख्याल रखने के लिए मौसी थी. स्कूल में दो सौ मीटर की रेस शुरू होने वाली थी और मैं ट्रैक पर खड़ी थी. अचानक पेट में तेज़ दर्द शुरू हुआ. ऐसा लगा जैसे किसी ने चाकू मार दिया हो. टीचर्स ने घर भेज दिया. घर में जब भी मैं टॉयलेट जाती, हर बार ब्लड आता. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है!

शुरू में मुझे लगा कुछ हो गया होगा. खुद ठीक हो जाएगा. लेकिन जब एक दिन गुजर गया और ब्लड आता रहा तो मैंने ये सोच लिया कि अब मैं मरने वाली हूं. मुझे कैंसर जैसी कोई बड़ी भयानक बीमारी हो गई है. मैं इतना डर गई कि मुझे बुखार आ गया और मैं टॉयलेट में ही बेहोश होकर गिर गई. जब होश आया तो देखा मैं बिस्तर पर थी. पापा मुझे अस्पताल ले जाने की तैयारी कर रहे थे. दीदी ने मुझसे तबीयत के बारे में पूछा तो मैंने कहा - ‘दीदी मैं मरने वाली हूं.’ और इतना कहते ही फूट-फूटकर रोने लगी. पापा बहुत डरे हुए थे, बार-बार मेरे बारे में पूछ रहे थे. लेकिन न जाने दीदी को क्या हुआ, उसने पापा को बाहर जाने को कह दिया.

पापा के जाने के बाद दीदी और मौसी ने एक दूसरे की तरफ देखा और फिर मुझसे पूछा - 'कब से?' मैंने कहा - 'कल से... जब से स्कूल से आई हूं तब से.' दीदी ने फिर मुझे समझाया कि ऐसा हर लड़की के साथ होता है. और उसके साथ ही मुझे उन दिनों क्या करना है और क्या नहीं करना है इसकी लंबी-चौड़ी लिस्ट बता दी गई. ये भी बताया गया कि ये बात पापा और भाई से छिपाई जाती है. नसीहतों की फेहरिस्त में यह भी शामिल था कि आप उन दिनों पूजा नहीं कर सकते, मंदिर नहीं जा सकते और अचार भी नहीं छू सकते. धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि मां, दीदी से ज्यादा प्यार नहीं करती. वो तो उन दिनों की वजह से मुझसे ज्यादा काम करवाती थी. ये भी समझ आया कि फूलकुमारी को हर महीने पांच दिन के लिए घर निकाला क्यों दिया जाता था?

मुझे अपनी मां और बहन से बस इतनी सी शिकायत है कि अगर उन लोगों ने मुझे वक्त रहते पीरियड्स के बारे में समझा दिया होता तो मैं एक पूरी रात ये ना सोचती कि मैं मरने वाली हूं. और मेरी तबीयत इतनी खराब नहीं होती कि कुछ दिनों तक घर पर ही रहना पड़ता. बार-बार इस असमंजस में भी नहीं पड़ती कि मां मुझे प्यार नहीं करती. अब मैं एक बेटी की मां हूं. मैंने तय किया है अपनी बेटी को सबकुछ अच्छे से समझा दूंगी. उसके लिए पाबंदियां नहीं होगी. वो अचार भी छू सकेगी और भगवानजी को भी. मैं उसे बताऊंगी कि ये एक नॉर्मल सी बात है. इससे डरने या इसे छिपाने की जरूरत नहीं है. और ना ही इसे चिल्ला-चिल्लाकर बताने की ही कोई वजह है. यह एक ऐसा वरदान है जो सिर्फ महिलाओं को मिला है. इस वरदान से मैं उसकी मां बनी और एक दिन वो भी इसी वरदान से एक नये जीवन को धरती पर लाएगी.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)