आज याने 13 नवम्बर 2017 को गजानन माधव मुक्तिबोध अगर जीवित होते तो अपनी आयु के 101वें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते. यह, सब कुछ के बावजूद, हिंदी की आलोचना-बुद्धि की शक्ति और तेजस्विता को पहचानने की उसकी सामर्थ्य का ज्वलंत प्रमाण है: अपने जीवनकाल में अपना पहला कविता संग्रह तक प्रकाशित न देख पाने वाले मुक्तिबोध, अपनी मृत्यु के आधी सदी बाद भी आज प्रासंगिकता और सार्थकता के शिखर पर हैं.

यह भी उल्लेखनीय है कि उनकी उत्कृष्टता पर जो मतैक्य विकसित हुआ है और उन्हें लेकर जो लिखा गया है उसका श्रेय सिर्फ विचारधारात्मक प्रयत्नों को ही नहीं दिया जा सकता. वाम से असहमत रहने वाले अनेक लेखकों ने उन पर गइराई और समझ के साथ लिखा है. इस मतैक्य में उनकी भी भागीदारी है जो उन्हें, पिछले लगभग 75 वर्षों के दौरान, हिंदी का एक श्रेष्ठ लेखक मानते रहे हैं.

मुक्तिबोध के लेखन में एक बुनियादी अंतर्विरोध लगभग शुरू से रहा है. अपनी कविता में वे बराबर अंत तक आत्मसंशयग्रस्त रहे लेकिन अपनी आलोचना में उनका आत्मविश्वास अनेक रूपों में प्रगट और विन्यस्त होता है. यह बात पहले भी कई बार कही जा चुकी है कि अपने जीवनकाल में मुक्तिबोध को कभी इसकी आश्वस्ति नहीं थी कि वे एक बड़े लेखक हैंः यह कोई ओढ़ा हुआ विनय नहीं था - यह एक आत्मचेतस् लेखक का ईमानदार खरा संशय था. यह भी दिलचस्प है कि उनके निकट जो लेखक-मित्र थे - नेमिचन्द्र जैन, शमशेर बहादुर सिंह, हरिशंकर परसाई, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा आदि - उनमें से कोई भी उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाया जबकि उनमें से हरेक बहुत शिद्दत से उनके महत्व को महसूस करता था.

साहित्य के इतिहास में दोनों तरह के उदाहरण मिलते हैंः ऐसे बड़े लेखक जो मुक्तिबोध की तरह संशयग्रस्त रहे और ऐसे भी जो आत्मविश्वास से भरे-पूरे थे. यह तर्क किया जा सकता है कि कम से कम हमारे समय में जब सब कुछ प्रायः संशय-ग्रस्त हो गया है, संशय ही बड़े सृजन का आधार बन सकता है, उसका अभाव नहीं. पर संशय प्रतिभा का हनन भी कर सकता है. लेकिन वह बड़ी प्रतिभा का ऐसा हनन नहीं कर पाता.

याद करें कि महान् कथाकार फ्रैंज काफ़्का को अपने साहित्य की अकिंचनता पर इतना भरोसा था कि उन्होंने अकालमृत्यु से पहले अपने घनिष्ठ मित्र से सारी पांडुलिपियां नष्ट करने का मित्राग्रह किया था जो, सौभाग्य से, उसने नहीं माना. बाद में वे सभी कृतियां प्रकाशित हुई और काफ़्का की अक्षय कीर्ति का आधार बनीं.

अपनी उपलब्धि और कीर्ति के इस व्यापक एहतराम पर मुक्तिबोध को कभी यक़ीन न आता. उनकी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान इतने प्रखर और प्रश्नवाची थे कि वे कुछ भी आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते थे. आज जब बहुत सारे महत्वाकांक्षी युवा मान्यता के लिए तरह-तरह के जतन और समझौते करते हैं तो उन्हें उस उजले मुक्तिबोध की याद दिलाना चाहिये.

‘बारीक बेइमानियों का सूफ़ियाना अन्दाज़’

मुक्तिबोध को भाषा-शिल्पी नहीं माना जाता है. उनकी भाषा के अटपटेपन और उनकी कविता के अराजक शिल्प को काफ़ी देखा-समझा गया है. पर यह भी याद करने की ज़रूरत है कि उनके गढ़े अनेक पद हिंदी आलोचना में बहुमान्य रहे हैंः ‘सभ्यता-समीक्षा’, ‘ज्ञानात्मक संवेदन’, ‘संवेदनात्मनक ज्ञान’, ‘सत्-चित्-वेदना’ आदि.

इधर उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘पक्षी और दीमक’ फिर पढ़ते हुए उसके अंतिम अंश की ओर ध्यान गया, विशेषतः इस पंक्ति की ओरः ‘बारीक बेइमानियों का सूफ़ियाना अन्दाज़ उसमें कहां’! आगे का अंश आख्यानपरक नहीं एक तरह का आत्मस्वीकार या आत्माभियोग है जो, वैसे भी मुक्तिबोध की विशेषता है, भले हिंदी कहानी में वह उनसे पहले या बाद में कम ही नज़र आते हैं.

अंश हैः ‘और अब मुझे सज्जायुक्त भद्रता के मनोहर वातावरण वाला अपना कमरा याद आता है... अपना अकेला धुंधला-धुंधला कमरा. उसके एकांत में प्रत्यावर्तित और पुनः प्रत्यावर्तित प्रकाश के कोमल वातावरण में मूल-रश्मियों और उनके उद्गम स्रोतों पर सोचते रहना, खयालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुंदर और भद्रतापूर्ण है. उससे न कभी गर्मी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं. किन्तु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिलाती दोपहर में रास्ता नापते रहना और धूल फांकते रहना कितना त्रासदायक है! पसीने से तरबतर कपड़े इस तरह चिपचिपाते हैं ओर इस क़दर गंदे मालूम होते हैं कि लगता है... कि अगर कोई इस हालत में हमें देख ले तो वह बेशक हमें निचले दर्ज़े का आदमी समझेगा. सजे हुए टेबल पर रखे क़ीमती फाउंटेनपेन - जैसे नीरव - शब्दांकनवादी हमारे व्यक्तित्व, जो बड़े खुशनुमा मालूम होते हैं - किन्हीं महत्वपूर्ण परिवर्तनों के कारण - जब वे आंगन में और घर-बाहर चलती झाडू- जैसे काम करने वाले दिखायी दें तो इस हालत में वे यदि सड़क-छाप समझे जायें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है. लेकिन, मैं अब ऐसे कामों की शर्म नहीं करूँगा, क्योंकि जहां मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है.’

यह कहानी 1959 के बाद कभी लिखी गयी ओर 1962 में ‘कल्पना’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी. उस समय किसी कहानी का समापन ऐसा नहीं होता था. कथा में मनोजगत् आदि का प्रवेश हो चुका था लेकिन शायद ही कोई किसी कहानी का समापन ऐसे वाक्य से कर सकता थाः ‘.. क्यों कि जहां मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्य है.’ एक दुर्दम्य बौद्धिक साहित्यकार बुद्धि और ज्ञान पर नहीं संवेदना पर ज़ोर दे रहा है और उसे भाग्यविधायक बता रहा है. यह अनूठा है - मुक्तिबोध के यहां ज्ञान, बुद्धि और संवेदना के बीच की दूरियां उनकी आत्मा के ताप में पिघलकर एकमेक हो जाती थीं. आज के ‘तुमुल कोलाहल’ में क्या हममें यह ताब बची है कि हम ‘हृदय की बात’ सुन सकें जिसे मुक्तिबोध ने दारुण संत्रणा के बावजूद कहा और सुना था? क्या हमारे समय में हम लगभग रोज़ बारीक बेइमानियों को सूफ़ियाना अंदाज़ में ज़ाहिर होते नहीं देख रहे हैं?

‘नर्मदा की सुबह’

1956-57 की बात है. श्रीकांत वर्मा ने बिलासपुर से एक पत्रिका निकाली थी ‘नयी दिशा’. उस समय वे संभवतः किसी मिडिल स्कूल में अध्यापक थे. उसमें एक विज्ञापन छपा था जिसमें यह सूचना थी कि गजानन माधव मुक्तिबोध के संपादन में मध्यप्रदेश के युवा कवियों का एक संकलन प्रकाशित होने जा रहा है जिसका नाम होगा ‘नर्मदा की सुबह’. उनके बड़े बेटे रमेश मुक्तिबोध को अपने दिवंगत पिता के कागज़ात में इस संकलन के लिए एकत्र की गयी कविताओं की पांडुलिपि मिल गयी है. रायपुर के राजेन्द्र मिश्र ने इस पांडुलिपि को देखकर उसे विन्यस्त किया है. मुक्तिबोध शती के दौरान उसे प्रकाशित करने की योजना है.

जिस समय मुक्तिबोध यह उपक्रम कर रहे थे उस समय बल्कि उसके आठ साल बाद तक, उनकी मृत्यु होने तक उनका अपना कोई कविता-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ था. फिर भी उनकी कोशिश, इस संचयन के माध्यम से, मध्यप्रदेश की युवा प्रतिभा को सामने लाने की थी. यह संकलन प्रकाशित नहीं हो पाया और अब लगभग 60 वर्ष बाद प्रकाशित होने जा रहा है.

संकलन में कुल आठ कवि शामिल किये जा रहे थेः श्रीकांत वर्मा, प्रमोद वर्मा, श्रीकृष्ण अग्रवाल ‘शैल’, जीवनलाल वर्मा ‘विद्रोही’, विपिन जोशी, हरि ठाकुर, रामकृष्ण श्रीवास्तव, अनिल कुमार और रामकृष्ण श्रीवास्तव. इन कवियों में से श्रीकांत और प्रमोद वर्मा ही आगे चलकर कुछ यश और उपलब्धि अर्जित कर पाये. यह कहना कठिन है कि इस संकलन के पीछे एक चुनौती के रूप में उस समय तक प्रकाशित और अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ और ‘दूसरा सप्तक’ की क्या भूमिका थी. ‘तार सप्तक’ में तो स्वयं मुक्तिबोध भी शामिल थे.

अपनी समवर्ती रचनाशीलता में किसी लेखक की दिलचस्पी और उसमें हस्तक्षेप करने के कई रूप हो सकते हैं. बहुत सारे लेखक पत्रिकाएं निकालते हैं. कई अपनी समवयसियों पर आलोचना लिखते और पुस्तकों की समीक्षा करते हैं. आजकल फ़ेसबुक इत्यादि पर आत्मसंवर्द्धन का जो बड़ा मंच मिल गया है उसमें परस्पर टिप्पिणयों की बाढ़ भी ऐसी ही कोशिश का हिस्सा है. बहुत कम अज्ञेय और मुक्तिबोध की तरह इस तरह के संकलन कर ऐसी अधिक एकाग्र और सुनियोजित कोशिश करते हैं.

अब यह देखा जा सकता है कि उस समय मध्य प्रदेश में जो कवि थे उनमें से मुक्तिबोध का किया चयन विवादास्पद ही हो सकता था. यह भी स्पष्ट है कि उनमें से बहुत कम आगे चलकर प्रसिद्धि या उपलब्धि पा सके. पर, यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ फिर भी है. अगर तभी प्रकाशित हो जाता तो निश्चय ही यह तबके मध्यप्रदेशीय परिदृश्य में एक विचारोत्तेजक हस्तक्षेप होता. यह भी उल्लेखनीय है कि इस चयन में मुक्तिबोध ने अपनी वैचारिक दृष्टि को थोपने का यत्न नहीं किया और उनकी संपादकीय दृष्टि समावेशी है. अज्ञेय और मुक्तिबोध दोनों ने ऐसे संपादन में ऐसी समावेशी दृष्टि और रुचि का परिचय दिया थाः ऐसा समावेश आज कितना दुर्लभ है!