मैं एक अलग ही दुनिया का आदमी हूं. मेरी दुनिया निराली है. मेरा दावा है कि मेरे पास प्रेम है. उस प्रेम का अनुभव मैं सतत ले रहा हूं. मेरे पास मत नहीं हैं, मेरे पास विचार हैं. विचारों का लेन-देन होता है. विचार मुक्त होते हैं. उन्हें चहारदीवारी नहीं होती, वे बंधे हुए नहीं होते. सज्जनों के साथ विचार-विमर्श कर उनके विचार ले सकते हैं और अपने विचार उन्हें दे सकते हैं. हम खुद अपने विचार बदल सकते हैं. इस तरह विचारों का विकास होता रहता है. इसका अनुभव मुझे निरंतर आता है. इसलिए मैं कोई वादी नहीं हूं. कोई भी मुझे अपना विचार जंचा दे और कोई भी मेरा विचार जंचा ले.

प्रेम और विचार में जो शक्ति है, वह और किसी में नहीं है. किसी संस्था में नहीं, सरकार में नहीं, किसी प्रकार के वाद में नहीं, शास्त्र में नहीं, शस्त्र में नहीं. मेरा मानना है कि शक्ति प्रेम और विचार में ही है. इसलिए पक्के मतों की अपेक्षा मुझसे न करें. विचारों की अपेक्षा रखें. मैं प्रतिक्षण बदलने वाला व्यक्ति हूं. कोई भी मुझपर आक्रमण कर अपना विचार समझाकर मुझे अपना गुलाम बना सकता है. विचार को समझाए बिना ही कोई कोशिश करेगा तो लाख कोशिश करने पर भी किसी की सत्ता मुझ पर चलेगी नहीं.

मैं केवल व्यक्ति हूं. मेरे माथे पर किसी प्रकार का लेबल लगा हुआ नहीं है. मैं किसी संस्था का सदस्य नहीं हूं. राजनैतिक पक्षों का मुझे स्पर्श नहीं है. रचनात्मक संस्थाओं के साथ मेरा प्रेम-संबंध है. मैं ब्राह्मण के नाते जन्मा और शिखा काटकर ब्राह्मण की जड़ ही काट डाली. कोई मुझे हिंदू कहते हैं. पर मैंने सात-सात बार कुरान-बाइबिल का पारायण किया है. यानी मेरा हिंदुत्व धुल ही गया. मेरी बातें लोगों को अच्छी लगती हैं, क्योंकि मेरे कार्य की जड़ में करुणा है, प्रेम है और विचार है. विचार के अलावा और अन्य किसी शक्ति का इस्तेमाल न करने की मेरी प्रतिज्ञा है. मेरे पास मत नाम की चीज नहीं है, विचार है. मैं इतना बेभरोसे का आदमी हूं कि आज मैं एक मत व्यक्त करूंगा और कल मुझे दूसरा मत उचित लगा तो उसे व्यक्त करने में हिचकिचाऊंगा नहीं. कल का मैं दूसरा था, आज का दूसरा हूं. मैं प्रतिक्षण भिन्न चिंतन करता हूं. मैं सतत बदलता ही आया हूं.

मेरे विषय में एक स्पष्टता मुझे कर देनी चाहिए. कुछ लोग मुझे गांधीजी के विचार का प्रतिनिधि मानने लगे हैं. लेकिन इससे अधिक गलती कोई नहीं होगी

मेरे विषय में एक स्पष्टता मुझे कर देनी चाहिए. कुछ लोग मुझे गांधीजी के विचार का प्रतिनिधि मानने लगे हैं. लेकिन इससे अधिक गलती कोई नहीं होगी. गांधीजी के बताए हुए काम, जो-जो मुझे ठीक लगे, करने में मेरा अभी तक का सारा जीवन गया, यह बात सही है. लेकिन ‘जो-जो मुझे ठीक लगे’ इतना यद्-वाक्य हमेशा उसमें रहा. उनकी संगति से और विचारों से मैंने भर-भरकर पाया, लेकिन दूसरों के विचारों में से भी पाया और जहां-जहां से जो भी विचार मुझे जंचे हैं, मैंने ले लिए हैं. और जो नहीं जंचे, मैंने छोड़ दिये हैं. इसलिए मैं एक अपने विचार का प्राणी बन गया हूं. गांधीजी इस चीज को जानते थे. फिर भी उन्होंने मुझे अपने साथियों में से मान लिया था क्योंकि वे स्वतंत्रता-प्रेमी थे, मुक्तिवादी थे. इसलिए गांधीजी के विचारों का प्रतिनिधित्व करने की मैं इच्छा रखूं, तो भी अधिकारी नहीं हूं. वैसी इच्छा भी मैं नहीं करता.

देश में अनेक विचार-प्रवाह काम कर रहे हैं और चूंकि मैं जनता के सीधे संपर्क में रहता हूं, मुझे उनका बारीकी से निरीक्षण करने का मौका मिलता रहता है. इसका परिणाम, जहां तक मेरा ताल्लुक है, यह हो रहा है कि मैं बहुत अधिक तटस्थ बन रहा हूं और मुझे समन्वय का सतत भान रहता है. मेरा किसी से वाद नहीं. किसी का नाहक विरोध करूं, यह मेरे खून में नहीं है. उल्टे मेरी स्थिति वैसी ही है, जैसे तुकाराम ने कहा है - ‘विरोध का मुझे सहन नहीं होता है वचन’.

मैं ‘सुप्रीम सिमेंटिंग फैक्टर’ हूं, क्योंकि मैं किसी के पक्ष में नहीं हूं. परंतु यह तो मेरा निगेटिव वर्णन हो गया. मेरा ‘पॉजिटिव’ वर्णन यह है कि सब पक्षों में जो सज्जन हैं, उन पर मेरा प्रेम है. इसलिए मैं अपने को ‘सुप्रीम सिमेंटिंग फैक्टर’ मानता हूं. यह मेरा व्यक्तिगत वर्णन नहीं है. जो शख्स ऐसा काम उठाता है, जिससे कि हृदय-परिवर्तन की प्रक्रिया से क्रांति होगी, वह एक देश के लिए नहीं, बल्कि सब देशों के लिए ‘सिमेंटिंग फैक्टर’ होगा. मैंने लुई पाश्चर की एक तस्वीर देखी थी. उसके नीचे एक वाक्य लिखा था- ‘मैं यह नहीं जानना चाहता कि तुम्हारा धर्म क्या है. तुम्हारे खयालात क्या हैं, यह भी नहीं जानना चाहता. सिर्फ यही जानना चाहता हूं कि तुम्हारे दुख क्या हैं. उन्हें दूर करने में मदद करना चाहता हूं.’ ऐसा करनेवाले इनसान का फर्ज अदा करते हैं. मेरी वैसी ही कोशिश है.

मेरी यही भावना रहती है कि सब मेरे हैं और मैं सबका हूं. मेरे दिल में ऐसी बात नहीं कि फलाने पर ज्यादा प्यार करूं और फलाने पर कम. मुहम्मद पैगंबर के जीवन में एक बात आती है. अबुबकर के बारे में मुहम्मद साहब कहते हैं, ‘मैं उस पर सबसे ज्यादा प्यार कर सकता हूं, अगर एक शख्स पर दूसरे शख्स से ज्यादा प्यार करना मना न हो’. यानी खुदा की तरफ से इसकी मनाही है कि एक शख्स पर दूसरे शख्स से ज्यादा प्यार करें. इस तरह की मनाही नहीं होती तो अबुबकर पर ज्यादा प्यार करते. यही मेरे दिल की बात है. यानी प्यार करने में मैं फर्क नहीं कर सकता.

ज्ञान की एक चिंगारी की दाहक शक्ति के सामने विश्व की सभी अड़चनें भस्मसात् होनी ही चाहिए, इस विश्वास के आधार पर निरंतर ज्ञानोपासना करने में और दृढ़ ज्ञान का प्रसार करने में मेरा आजतक का जीवन खर्च हो रहा है

मेरे जीवन में मुझे मित्रभाव का दर्शन होता है. और वह मुझे खींचता है. मां के लिए मुझे आदर है. पितृभाव के लिए भी आदर है. गुरु के लिए तो अत्यंत आदर है. इतना होते हुए भी मैं सबका मित्र ही हो सकता हूं और सब मेरे मित्र. मित्र के नाते ही मैं बोलता हूं. और जब प्रहार करता हूं, तो वह भी इसी नाते करता हूं. फिर भी मेरे अंदर इतनी मृदुता है कि मानो कुल दुनिया की मृदुता उसमें आ गई.

वैसे ही मैं गुरुत्व का स्वीकार नहीं कर सकता. ‘एक-दूसरे की सहायता करें, सब मिलकर सुपंथ पर चलें’ - यह मेरी वृत्ति है. इसलिए गुरुत्व की कल्पना मुझे जंचती नहीं. मैं गुरु के महत्व को मानता हूं. गुरु ऐसे हो सकते हैं कि जो केवल स्पर्श से, दर्शन से, वाणीमात्र से, बल्कि केवल संकल्पमात्र से भी शिष्य का उद्धार कर सकते हैं. ऐसे पूर्णात्मा गुरु हो सकते हैं. फिर भी यह मैं कल्पना में ही मानता हूं. वस्तुस्थिति में ऐसे किसी गुरु को मैं नहीं जानता. ‘गुरु’ इन दो अक्षरों के प्रति मुझे अत्यंत आदर है. लेकिन वे दो अक्षर ही हैं. ये दो अक्षर मैं किसी भी व्यक्ति पर लागू नहीं कर सका. और कोई उन्हें मुझ पर लागू करे, तो वह मुझे सहन ही नहीं होता.

एक बार हंगरी से आए एक भाई ने मुझे पूछा कि आपका काम आगे कौन चलाएगा? आपका कोई शिष्य हो तो वह चला सकता है. मैंने कहा कि मेरा काम आगे वही चलाएगा, जिसने मुझे प्रेरणा दी. मैं काम करनेवाला हूं, ऐसी भावना मेरी नहीं है. मेरी न कोई संस्था है, न मेरा हुक्म माननेवाला कोई है, जिस पर मैं डिसिप्लिनरी एक्शन ले सकता हूं. ऐसी हालत में जिस ताकत ने मुझे प्रेरणा दी है, वही ताकत आगे काम करेगी. इसलिए मेरा कोई शिष्य बनेगा, ऐसा मैं नहीं मानता. फिर मैंने कहा मेरे पीछे सब महापुरुषों के आशीर्वाद हैं. वे मेरे पीछे हैं, आगे हैं, अंदर हैं, बाहर हैं, ऊपर हैं, नीचे हैं. जैसे सूर्य की किरणें मैं स्पष्ट देखता हूं, वैसे ही सर्वत्र ये आशीर्वाद देखता हूं.

ज्ञान की एक चिंगारी की दाहक शक्ति के सामने विश्व की सभी अड़चनें भस्मसात् होनी ही चाहिए, इस विश्वास के आधार पर निरंतर ज्ञानोपासना करने में और दृढ़ ज्ञान का प्रसार करने में मेरा आजतक का जीवन खर्च हो रहा है. यदि दो-चार जीवनों को भी उसका स्पर्श हो जाए, तो मेरा ध्येय साकार हो सकेगा.

मेरे पास अनेक श्रेष्ठ विचार हैं, लेकिन उनमें सबसे श्रेष्ठ विचार यही है कि मेरे विचार का किसी पर आक्रमण न हो

मैं जो भी कदम उठाता हूं, उसकी गहराई में जाकर जड़ पकड़े बगैर नहीं रहता. मैंने अपनी जिंदगी के तीस साल एकांत चिंतन में बिताए हैं. उसी में जो सेवा बन सकी वह मैं निरंतर करता रहा. लेकिन मेरा जीवन निरंतर चिंतनशील रहा, यद्यपि मैं उसे सेवामय बनाना चाहता था. समाज में जो परिवर्तन लाना चाहिए, उसकी जड़ के शोधन के लिए वह चिंतन था. बुनियादी विचारों में मैं अब निश्चिंत हूं. कोई समस्या मुझे डराती नहीं. कोई भी समस्या, चाहे जितनी भी बड़ी हो, मेरे सामने छोटी बनकर आती है. मैं उससे बड़ा बन जाता हूं. समस्या कितनी भी बड़ी हो, लेकिन वह मानवीय है, तो मानवीय बुद्धि से हल हो सकती है. इसलिए मेरी श्रद्धा डांवाडोल नहीं होती. वह दीवार के समान खड़ी रहती है, या गिर जाती है.

मेरे पास अनेक श्रेष्ठ विचार हैं, लेकिन उनमें सबसे श्रेष्ठ विचार यही है कि मेरे विचार का किसी पर आक्रमण न हो. मेरा विचार किसी को अगर जंचता है, तो मुझे खुशी होती है. मेरा विचार किसी को नहीं जंचता है और वह उस पर अमल नहीं करता है, तो भी मुझे खुशी होती है. मेरा विचार किसी को न जंचे और किसी दबाव वगैरह से मान ले, तो मुझे बड़ा दुख होता है. लेकिन विचार पसंद होने के बावजूद यदि कोई उसे अमल में नहीं लाता तो मैं आशा रखता हूं कि आज नहीं तो कल अवश्य लाएगा. और मैं स्वयं किसी की सत्ता नहीं मानता, इसलिए किसी पर सत्ता चलाना भी नहीं चाहता, सत्ता का तो मैं दुश्मन ही हूं. सेवा को काटनेवाली यह चीज है.

मुझ पर परमेश्वर की एक बड़ी कृपा है कि गलतफहमियों के कारण लोगों की ओर से मुझ पर लगाए हुए आक्षेपों आदि का कोई असर मेरे चित्त पर नहीं होता. मैं पुण्य का अभिलाषी नहीं हूं, सेवा का अभिलाषी हूं. मैं केवल सेवा उत्सुक हूं. और मेरी इच्छा यह है कि वह सेवा भी मेरे झोले में जमा न हो. क्योंकि मैं जो सेवा कर रहा हूं, वह सहजप्राप्त है और आज के जमाने और परिस्थिति के लिए जरूरी है. यानी वह जमाने की मांग है. इसका मतलब यह होगा कि जो भी सेवा मैंने की, वह जमाने ने ही करवा ली. तब उस सेवा का श्रेय मुझे कैसे मिलेगा? मैंने जो सेवा उठायी है, वह प्रवाह के विरुद्ध होती और थोड़ी सी भी होती तो भी उसका श्रेय मुझे मिलता. लेकिन वह सेवा प्रवाह को पकड़कर चल रही है और जमाने की मांग के कारण हो रही है, इसलिए वह मेरे नाम पर जमा नहीं होगी. इसका पक्का बंदोबस्त मैंने कर रखा है. यद्यपि मैं सेवा की इच्छा रखता हूं, लेकिन उसका श्रेय मेरे पल्ले न पड़े इसका मेरा प्रयत्न रहता है.

जिस प्रदेश में मेरी भाषा लोग समझते नहीं थे, और उन्हें मेरे भाषणों का टूटा-फूटा अनुवाद सुनना पड़ता था, उन सभी प्रदेशों में भी आत्मदर्शन का ही अनुभव मुझे आया और इसका प्रमाण यह है कि लोगों का भी यही अनुभव था

मैं कभी-कभी विनोद में कहता हूं कि मुझे अपना चेहरा शीशे में देखने का खास मौका कभी मिलता नहीं. उसकी जरूरत भी नहीं. मेरी तो यही भावना है कि ये जो विविध चेहरे मैं देखता हूं, उन सबमें विविधता से सजे-धजे मुझे ही मैं देख रहा हूं. मेरी यात्रा में मैंने सतत यह अनुभव लिया है. जिस प्रदेश में मेरी भाषा लोग समझते नहीं थे, और उन्हें मेरे भाषणों का टूटा-फूटा अनुवाद सुनना पड़ता था, उन सभी प्रदेशों में भी आत्मदर्शन का ही अनुभव मुझे आया और इसका प्रमाण यह है कि लोगों का भी यही अनुभव था. मैं जहां-जहां गया, वहां के लोगों ने यह कभी नहीं माना कि मैं दूसरे प्रदेश से आया हूं. उलटे, अनुभव यह रहा कि महाराष्ट्र के लोग मुझे जितनी आत्मीयता से चाहते हैं, उतनी ही आत्मीयता से सभी प्रांतों के लोग चाहते हैं.

हर प्रांत में, जहां मेरा प्रथम ही प्रवेश हुआ, मुझे एक अप्रत्यक्ष ढंग से ही काम करना पड़ा. और वह लाभदायी साबित हुआ. उस प्रांत का नया-नया परिचय मुझे मिलता रहा. असम जाने से पहले असम का अध्ययन करने के लिए कितनी ही पुस्तकें मैंने पढ़ी थी. लेकिन वहां जाने पर नया ही दर्शन मुझे हुआ. ऐसे ही कश्मीर में हुआ. तमिलनाडु, केरल, बिहार, पंजाब आदि प्रदेशों में पदयात्रा से पहले भी जाना हुआ था. लेकिन खास कर कश्मीर और असम, दोनों का बिल्कुल ही नया दर्शन हुआ. मैं प्रवेश बहुत सावधानी से करता हूं. सावधानी से बोलता हूं. उस प्रदेश के बारे में कम बोलता हूं, सुनता और देखता ज्यादा हूं.

(विनोबा भावे के आत्मकथ्य ‘अहिंसा की तलाश’ का संपादित अंश)