लियो टॉल्सटॉय को निर्विवाद रूप से रूस का सबसे महान साहित्यकार कहा जाता है. ‘वार एंड पीस’ और ‘अन्ना करेनिना’ उनकी सर्वकालिक महान रचनाएं है. अमीर घराने से ताल्लुक रखने वाले टॉलस्टॉय ने 55 साल की उम्र तक आते-आते बिलकुल सादा जीवन अपना लिया था: नंगे पांव चलना, खेती करना और किसानों जैसे कपड़े पहनना. उन्होंने धूम्रपान, शिकार करना और मांसाहार सब छोड़ दिया था. 1891 में अपनी जायदाद का ज्यादातर हिस्सा अपनी पत्नी और बच्चों में बांट कर वे ग्रामीण जीवन से जुड़ गए और दुनिया भर के धर्मों को मानने वालों के साथ संगत करने लगे.

टॉलस्टॉय ने अपने विचारों से चर्च की व्यस्थाओं पर ज़बरदस्त प्रहार किया था. बक़ौल टॉल्सटॉय, ‘चर्च का इतिहास क्रूरतापूर्ण और भयावह है और ईसा के सिद्धातों के खिलाफ है....’ यह बात हर जगह, हर धर्म के लिए क्यों इतनी सटीक मालूम होती है? हर धर्म - नए या पुराने - के तथाकथित रक्षकों ने अपना-अपना दमन चक्र चलाया है. यूरोप और ईसाई धर्म भी इससे अछूता नहीं रहा. टॉलस्टॉय सरकारों के ख़िलाफ़ भी मुखर होकर बोले. उन्होंने लिखा, ‘...एक इंसान का दूसरे के लिए सबसे बड़ा उपहार है ‘शान्ति’ और फिर भी यूरोप के ईसाई देशों ने अपने मातहत लगभग तीन करोड़ लोगों के भाग्य का फ़ैसला हथियारों से किया है...’

इस हिंसा का जवाब उन्होंने ईसा के सिद्धातों पर चलने से दिया - ‘अगर तुम ईसाई हो तो अपने पडोसी से झगड़ो मत, और न ही हिंसा का सहारा लो; किसी और को पीड़ा देने से अच्छा है खुद पीड़ित हो जाओ और बिना किसी प्रतिरोध के हिंसा के सामना करो...’

उनकी सोच ने महात्मा गांधी पर गहरा प्रभाव डाला. उनके सामाजिक जीवन को टॉलस्टॉय के विचारों की ही देन कह सकते हैं. आइये देखें कि कैसे?

जिस तरह टॉलस्टॉय ने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा बांट दिया था, ठीक उसी प्रकार गांधी ने भी वे सब उपहार, गहने, और पैसे लोगों में बांट दिए जो उन्हें और परिवार को साउथ अफ्रीका में आंदोलन के दौरान लोगों ने प्रेम स्वरुप दिए थे. गांधी के ‘सत्याग्रह’ का आधार भी शांति और सविनय अवज्ञा ही था. गोपाल कृष्ण गोखले गांधी के राजनैतिक गुरु थे पर टॉलस्टॉय शायद उनके आध्यत्मिक गुरु थे. विचारों की इसी समानता ने दोनों को एक-दूसरे के करीब ला खड़ा किया.

दोनों के बीच रिश्ते की शुरुआत टॉलस्टॉय की किताब ‘ईश्वर की सत्ता तुम्हारे अंदर ही है’ से हुई. इससे प्रभावित होकर उन्होंने एक अक्टूबर 1909 को टॉलस्टॉय को पहला खत लिखा. इसमें गांधी जी ने ट्रांसवाल, साउथ अफ़्रीका में अपने द्वारा चलाये गए सविनय अवज्ञा आंदोलन, जिसको आम भाषा में ‘सिविल डिसओबीडिएंस मूवमेंट’ कहते हैं, का ज़िक्र किया. गांधी का आंदोलन टॉलस्टॉय की विचारधारा से प्रभावित था.

इस खत का ज़िक्र टॉलस्टॉय ने अपनी डायरी में कुछ इस तरह से किया है, ‘आज मुझे एक हिंदू द्वारा लिखा हुआ दिलचस्प पत्र मिला है.’ इसके जवाब में उन्होंने गांधी को लिखा, ‘मुझे अभी आपके द्वारा भेजा गया दिलचस्प पत्र मिला है और इसे पढ़कर मुझे अत्यंत ख़ुशी हुई. ईश्वर हमारे उन सब भाइयों की मदद करे जो ट्रांसवाल में संघर्ष कर रहे हैं. ‘सौम्यता’ का ‘कठोरता’ से संघर्ष, ‘प्रेम’ का ‘हिंसा’ से संघर्ष हम सभी यहां पर भी महसूस कर रहे हैं..... मैं, आप सभी का अभिवादन करता हूं.’

गांधी ने उन्हें दूसरा ख़त 4 अप्रैल, 1910 में लिखा और साथ में अपनी क़िताब ‘हिंद स्वराज’ भी भेजी और आग्रह किया कि अगर उनकी (टॉलस्टॉय की) सेहत ठीक हो तो किताब के बारे में उनके विचारों से अवगत कराएं. ये टॉलस्टॉय के जीवन के आख़िरी महीनों की बात है. तब उनकी तबियत अमूमन बिगड़ी रहती थी. लेकिन उस समय भी काफी लोग उनसे मिलने आते थे. उनकी डायरी में 10 अप्रैल 1910 की तारीख़ में एक वाकया दर्ज है, ‘आज मुझसे दो जापानी मिलने आये जो यूरोपियन सभ्यता पर क़सीदे पढ़े जा रहे थे और वहीं मुझे एक हिंदू का पत्र और उसकी क़िताब मिली जो यूरोप की सभ्यता में कमियों को साफ़-साफ़ उजागर करते हैं.

अगले दिन, यानी 11 अप्रैल को एक और बात उनकी डायरी में दर्ज है, ‘आज मैंने गांधी की जीवनी पढ़ी और मुझे लगता है कि मुझे उनको इस बारे में लिखना चाहिए.’ जिस जीवनी का ज़िक्र उन्होंने किया है वह जेजे डोक द्वारा लिखी हुई थी.

गांधी जी के ख़त के जवाब में टॉलस्टॉय ने 24 अप्रैल 1910 को लिखा, ‘मुझे आपका पत्र और किताब मिली... सत्याग्रह सिर्फ हिंदुस्तान के लिए ही नहीं वरन, संपूर्ण विश्व के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण है...’

गांधी 15 अगस्त 1910 को लिखे अपने अगले खत में टॉलस्टॉय को बताते हैं कि उन्होंने और उनके एक साथी - कालेनबाख - ने जोहनासबर्ग में ‘टॉलस्टॉय फार्म’ की स्थापना की है. ये वही कालेनबाख हैं जिनके महात्मा गांधी के साथ समलैंगकिक रिश्ते का ज़िक्र जोसफ लेलीवेल्ड ने अपनी किताब ‘द ग्रेट सोल’ में किया था. गांधी पर टिप्पणी करके हर कोई कुछ न कुछ पा ही जाता है - कभी आचार्य रजनीश को ‘ओशो’ बनने का रास्ता मिल जाता है और कभी जोसफ लेलीवेल्ड सरीख़े लेखक पुलित्ज़र विजेता बन जाते हैं. और वहीं लुइस फिश्चर की गांधी पर लिखी जीवनी को रिचर्ड एटनबरो अपने जीवन की सबसे महान पिक्चर बना देते हैं. वो कहते हैं न,

‘नेक ने तो नेक जाना बद ने बद जाना मुझे,

हर किसी ने अपने ही रुतबे में पहचान मुझे.’

ख़ैर आगे बढ़ते हैं. गांधी जी के इन खतों ने और ख्यालों ने टॉलस्टॉय की उनमें दिलचस्पी बढ़ा दी थी और वह इसलिए कि गांधी उनके विचारों को मूर्त रूप दे रहे थे. अब उनकी डायरी में ‘गांधी’ शब्द कई बार आने लग गया था और वे उनके ट्रांसवाल के संघर्ष में काफी दिलचस्पी भी ले रहे थे. इधर गांधी का उदभव हो रहा था, उधर टॉलस्टॉय के जीवन की शाम बस ढलने ही को थी. उन्होंने गांधी को अपना आख़िरी ख़त 20 सितम्बर 1910 को लिखा जो उनका गांधी को लिखा सबसे लंबा खत भी था:

‘अब जब मौत को मैं अपने बिलकुल नज़दीक देख रहा हूं तो मैं कहना चाहता हूं जो मेरे जेहन में साफ़- साफ नज़र आता है और जो आज सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, और वह है - ‘निष्क्रय प्रतिरोध ‘ (इसे आप ‘सत्याग्रह’ भी कह सकते हैं) जोकि कुछ और नहीं बल्कि प्रेम का पाठ है... प्रेम इंसान के जीवन का एकमात्र और सर्वोच्च नियम है और यह बात हर इंसान की आत्मा भी जानती है; और अगर इंसान किसी गलत अवधारणा को न माने, तो शायद वह इसे समझ सकता है. इसी प्रेम की उद्घोषणा सभी संतों ने की है फिर वह चाहे भारतीय हो, चीनी हो, यहूदी हो, यूनानी हो या रोमन हो. जब प्रेम में बल का प्रवेश हो जाता है तो फिर वह जीवन का नियम नहीं रह पाता और हिंसा का रूप धारण कर लेता है और ताकतवर की शक्ति बन जाता है...’

टॉलस्टॉय अपने आख़िरी दिनों में उदास रहे और कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि जो ‘वॉर एंड पीस’ जैसा सर्वकालिक उपन्यास लिखे और जो जीवन में शांति की महत्ता को समझता हो, वह अपने समाज में फैली हिंसा को देखकर उदास क्यों नहीं होगा! गांधी जी भी तो अपने अंतिम दिनों में उदास थे. 20 नवम्बर, 1910 को टॉलस्टॉय ने अंतिम सांस ली

चलते-चलते

गांधी और कालेनबाख ने 1910 में ‘टॉलस्टॉय फार्म’ की स्थापना की थी जिसमे गांधी जी छह साल से 16 साल तक के बच्चों को व्यायसायिक प्रक्षिक्षण देते थे. यह शायद असफल प्रयोग था जिसे 1913 में बंद कर दिया गया था.

1945 में भारत में जन्मे अंग्रेज जॉर्ज ओरवेल की एक क़िताब ‘एनिमल फार्म’ पब्लिश हुई थी जो 1917 की रुस क्रांति के बाद जन्मे समाजवाद पर अब तक का सबसे बड़ा व्यंग है.

यह सिर्फ लफ़्फ़ाज़ी है, या दिमागी तिकडम कि अपनी किताब को नाम देते वक़्त गांधी और समाजवाद के धुर विरोधी, जॉर्ज ओरवेल के ज़हन में ‘टॉलस्टॉय फार्म’ नाम गूंज रहा होगा ?