अरिजीत सिंह अपने करियर का सफलतम गीत ‘क्योंकि तुम ही हो’ कभी नहीं गा पाते. कमाल आर खान क्या बला है, आप संपूर्णता में नहीं जान पाते. हिंदी कविता के नए कूल स्वरूप को देख-सुनकर दांतों तले उंगलियां नहीं दबा पाते और बफर नामक प्रकिया के दौरान अथाह धीरज का होना क्यों जरूरी होता है, आप जान ही नहीं पाते अगर ये मुआ यूट्यूब न होता!

संगीत निर्देशक जीत गांगुली ने ‘आशिकी 2’ के लिए नयी आवाज को तलाशते वक्त नए-नवेले अरिजीत को यूट्यूब पर ही खोजा था. उनके गाए सिर्फ दूसरे गीत ‘राब्ता’ को सुनते-देखते वक्त. कमाल आर खान के व्यक्तित्व को दुनिया ने संपूर्णता में जांचा-परखा-खोजा था, तब जब यूट्यूब ने बेहूदगियों, फूहड़ताओं और गालियों से सनी फिल्म समीक्षाओं के लिए उन्हें मंच उपलब्ध कराया था. हिंदी कविता का स्वरूप भी पुराना वाला ही होता अगर इसी नाम का एक यूट्यूब चैनल हमारी नजर नहीं होता. पुरानी हिंदी कविताओं को नए दर्शक नहीं मिलते, पुराने प्रेमियों को कविताओं के प्रेम में दोबारा पड़ने के नए मौके नहीं मुहैया होते.

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आपको यह ज्ञान काफी पहले से मुहैया है कि इंटरनेट ने जब से हमारे हर सवाल का जवाब देना शुरू किया है, तब से एक सवाल समय को झाड़कर यक्ष प्रश्न की तरह बार-बार खड़ा हुआ है. अगर गूगल नहीं होता तो क्या होता? जवाब इसका बेहद लंबा है, और थकाऊ भी, इसीलिए फिर कभी. आज टटोलकर देख लेते हैं कि हिंदुस्तान में गूगल की ही तरह मूलभूत हो चुका यूट्यूब नहीं होता तो...!

चलती-फिरती छवियों से मिलने वाली सुख-प्राप्ति टेलीविजन तथा सिनेमा के विशाल परदे तक ही सीमित रहती. मुख्यधारा का मनोरंजन हथेली बराबर मोबाइल में नहीं मिलता. 720पी और 1080पी की क्वालिटी का अंतर दुनिया के समझाने के बावजूद कम समझ आता, अगर क्वालिटी बदलने का विकल्प यूट्यूब में नहीं होता.

यूट्यूब के सर्च बॉक्स में जाकर ‘यूज द फोर्स ल्यूक’ (use the force luke) सर्च करने पर वह जादू देखने को नहीं मिलता, जो आपको तब मिलेगा जब आप अबकी बार यूट्यूब खोलेंगे! गूगल की ही तरह एक दूसरा सर्च इंजन भी उतना ही मौजूं नहीं होता और अपने बड़े भाई की तरह खुद में असीम संभावनाएं नहीं रखता. कई दूसरे मैजिक अपने अंदर सुरक्षित भी नहीं रख पाता – जैसे जब उसके सर्च बॉक्स में ‘डू द हरलेम शेक’ (do the harlem shake) डालकर एंटर दबाया जाता, वह मुस्कुराहटों को मुफ्त में नहीं बांटता.

यह भी नहीं पता चलता कि सिर्फ कूल युवा और बच्चे ही यूट्यूब का उपयोग नहीं करते. कॉमस्कोर का एक अध्ययन यह भी नहीं बताता कि 2016 में दुनिया भर में यूट्यूब का उपयोग करने वालों में से 43% अभिभावक हैं, 51% फुल-टाइम रोजगार वाले और 49% महिलाएं. हमारे यहां आते-आते ये प्रतिशत जरूर गिर जाते, क्योंकि इस देश में आज भी परिवारों को यूट्यूब से ज्यादा टेलीविजन पर ‘नागिन-भाग एक और दो’ देखना भाते हैं!

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यूट्यूब नहीं होता तो यह कैसे पता लगता कि दुनिया अभी भी किस करने के तरीकों से अनभिज्ञ है. क्योंकि इस वीडियो शेयरिंग वेबसाइट पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले ट्यूटोरियल में से एक ‘हाउ टू किस’ है! दुनिया को वो वाले सलमान खान भी नहीं मिलते जिन्हें फोर्ब्स जैसी मैगजीन ‘दुनिया का सबसे बड़ा स्कूल’ कहती है और वह स्कूल रात-दिन खुला रहता है, बिना वक्त की किसी पहरेदारी के. हर मिनट 100 घंटे से ज्यादा के वीडियो इंटरनेट के इस मंच पर अपलोड नहीं होते और दुनिया भर के गणितज्ञ इस सवाल पर माथापच्ची नहीं करते कि अगर कोई बेमिसाल व्यक्ति यूट्यूब के सभी वीडियोज देखना चाहे, तो आखिर उसे कितने हजार साल लगेंगे, यह कारनामा कर दिखाने में.

एक नए तरीके की आंखो देखी पत्रकारिता का जन्म भी नहीं होता जिसमें घटनाओं-दुर्घनाओं को तुरंत कैमरों में कैद करके दुनिया के सामने पेश करने के लिए एक मंच नहीं मुहैया होता. ‘जहां न पहुंचें टीवी न्यूज के रिपोर्टर-स्ट्रिंगर, वहां पहुंचें यूट्यूबर्स’ कहने का चलन भी नहीं स्थापित होता. आतंकी संगठनों द्वारा प्रोपेगेंडा वीडियो दुनिया भर में फैलाना आसान नहीं हुआ होता, अगर यूट्यूब होता भी तो अपने वीडियो अपलोड करने के नियमों में थोड़ा कठोर होता.

बॉलीवुड के लिए अछूती रहने वाली कहानियों को नया माध्यम, नया परदा नहीं मिलता. हमें ‘पिचर्स’, ‘परमानेंट रूममेट्स’ से लेकर ‘बैंग बाजा बारात’ व ‘टीवीएफ ट्रिपलिंग’ जैसी वेब आधारित नई कहानियां और सिनेमा के अफसानानिगारों को उन्हें कहने के नए सलीके नहीं मिलते. इन वेब सीरीज को बनाने वाले वे कल के छोकरे-छोकरी क्षितिज पर नहीं चमकते जिन्हें यशराज जैसा अति विशाल स्टूडियो भी यूट्यूब के संसार में अपना गुरू मानता है. फिल्म इतिहास को चकमा देकर वह नया ट्रेंड भी स्थापित नहीं होता जिसमें घाटे की वजह से बालाजी जैसे स्टूडियो फिल्म निर्माण करना तो बंद कर देते लेकिन यूट्यूब पर प्रसारित होने वाली वेब सीरीज बनाते रहने के लिए धन और अक्ल खर्च करना जारी रखते.

ये भी नहीं होता कि एक वीडियो शेयरिंग वेबसाइट विश्वभर के लाखों-करोड़ों लोगों को रोजगार देती, लेकिन ऐसा नया निजाम रचती जिसमें वह इन यूट्यूबर्स की एम्प्लॉयर नहीं कहलाती. खुद का कुछ करके पैसा कमाने की चाह रखने वालों को सिर्फ कैमरे, कमरे और हाई स्पीड इंटरनेट के दम पर अनूठा बिजनेसमैन नहीं बनाती. यूट्यूब नहीं होता तो फेसबुक, ट्विटर जैसे कंजूस सेठ ही दुनिया में राज कर रहे होते, जिनकी दुकानों पर आप रोज घंटों बिता देते, लेकिन बदले में वो आपको फूटी कौड़ी नहीं देते. वे आपको खाली जेब वाला फेम देते लेकिन लखपति-करोड़पति होने का मौका नहीं. और आपके कद्रदानों की बढ़ती संख्या पर कभी चांदी का तो कभी सोने का और 10 मिलियन सब्सक्राइबर्स हो जाएं तो हीरे का बना एक बड़ा यूट्यूब लोगो भी आपके घर पर नहीं भिजवाते.

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लोगों की पहुंच से दूर रहने वाले लोगों के पास सामान्य ज्ञान के एक-दो प्रश्न ज्यादा नहीं होते. ‘बताओ, यूट्यूब पर शेयर किया गया पहला वीडियो कौन सा था?’ ‘यूट्यूब पर अपलोड हुआ सबसे लंबा वीडियो कितना लंबा है?’ यह भी नहीं होता कि किसी वेब आधारित सेवा के ऐसे कद्रदान मिलते जो बताते कि यूट्यूब के सहसंस्थापक करीम द्वारा 23 अप्रैल 2005 को अपलोड किया गया सिर्फ 18 सेकंड लंबा ‘मी एट द जू’ (ऊपर) नामक वीडियो यूट्यूब पर अपलोड हुआ पहला वीडियो था. यह भी कौन ही बताता कि वीडियोज के इस गहरे समंदर में मौजूद सबसे लंबा वीडियो 596.5 घंटों का है. अर्थात्, अगर किसी दिन किसी का मन इसे देखने का हुआ तो उसे अपने पास तकरीबन 25 दिन खाली रखने पडेंगे.

ऐसा गुणी और तेजस्वी यूट्यूब अगर नहीं होता तो वायरल होना बीमार होना ही होता. फेसबुक पोस्ट, ट्वीट, फोटो, वाट्सएप संदेशों के तूफान मचाने से बहुत पहले यूट्यूब के ही वीडियोज ने दुनिया को वायरल होना न सिखाया होता. साथ ही, बदकिस्मती से दुनिया को नम्बर ऑफ व्यूज की भाषा में बात करना भी किसी और ने नहीं सिखाया होता. न ही वीडियो की गुणवत्ता और मौलिकता पर बात करते वक्त व्यूज की अधिकता को सबसे अहम पैमाना बनाया होता और सच तो यह भी है जनाब कि अगर यूट्यूब नहीं होता, तो ढेर सारा कचरा भी किसी ने चारा बनाकर नेटजनों के सामने नहीं परोसा होता.

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मानवता के ऐसे फोकट दिन भी आएंगे जब कैट वीडियोज वायरल होंगे, हवाई जहाजों के जमीन छोड़ने और छूने पर लोग लाखों वीडियो बनाएंगे, बकरों के आदमी की तरह मिमियाने की आवाज वाले वीडियो को 35 मिलियन व्यूज मिलेंगे (ऊपर) और इस एक सर-फोड़ू वीडियो (नीचे) को 140 मिलियन से ज्यादा बार लोग देखेंगे, यह भी तो यूट्यूब के अलावा किसी और ने हमें नहीं सिखाया-दिखाया होता! मशहूर होना शायद इतना जरूरी नहीं होता अगर आसानी से मशहूर बनाने वाला यूट्यूब नहीं होता.

टेलीविजन पर प्रसारित होने से काफी पहले ट्रेलर और फिल्मों के नए गीत देख लेना मुमकिन नहीं होता, और हमारा बुद्धू बक्सा छोटे-मोटे कामों में भी इतना लेट नहीं होता, अगर सुपरफास्ट यूट्यूब नहीं होता. अभिभावकों के लिए टेलीविजन के अलावा यूट्यूब पर भी पेरेंटल कंट्रोल रखना क्यों बेहद जरूरी होता, आपने समझा नहीं होता, अगर बेचैन नौनिहालों ने फोन आपका छीनकर यूट्यूब पर कार्टून देखना सीखा नहीं होता. हाल ही में लांच हुए यूट्यूब किड्स ऐप की उपयोगिता का भी आपने मजाक उड़ाया होता, अगर नौनिहालों ने गलती से उन वीडियोज को न चला दिया होता जो उनकी उम्र के लिए बने ही नहीं हैं.

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किसी मूलभूत सुविधा के बैन होने पर कैसा लगता है, इसका अंदाजा नहीं लगता अगर कुछ अरसे पहले तक पड़ोसी देश पाकिस्तान में यूट्यूब बैन नहीं रहता. हमने अपनी कल्पनाशीलता के घोड़े दौड़ाकर उस बंदिश को महसूस नहीं किया होता और पाकिस्तान, चीन, ईरान, सीरिया, टर्की, नार्थ कोरिया जैसे कभी न कभी यूट्यूब को बैन करने वाले देशों जैसा न होने के लिए हिंदुस्तान को कई दफा शुक्रिया नहीं कहा होता.

हमारी जिंदगी में चलते-फिरते दृश्यों का जमावड़ा थोड़ा कम लगता. मनोरंजन मिलता रहता लेकिन एक बिलियन से ज्यादा वीडियोज का खजाना हाथ नहीं लगता. फिल्मी संगीत का मोह आईट्यून्स से टूटा न होता और हिंदी फिल्मों के दीवानों को ज्यूकबॉक्स पर बफर करके नए गाने मुफ्त में सुनने का मौका नहीं मिलता. सैकड़ों आम नौजवानों को सुनहरे सपने नहीं आते कि वे भी कलाकार बन सकते हैं, बिना बॉलीवुड का किवाड़ खुलवाए भी अपनी कबाड़ किस्मत के दरवाजे खोल सकते हैं. हर बड़े-छोटे शहर-कस्बे में यूट्यूबर बनने के लिए नौजवान बेचैन न होता, अगर रचनात्मकता को यूट्यूब का सहारा न मिला होता.

आखिर में यह भी होता कि रोचकता की गगनचुंबी इमारत की मुंडेर पर खड़े होकर डरते-डरते नीचे झांकते वक्त यह कहने में मजा नहीं आता कि अगर यूट्यूब नहीं होता तो हिंदुस्तानियों के लिए इंटरनेट आधा और अधूरा होता.

वहां तफरीह करने में मजा उतना नहीं आता जितना अभी आता है.