जाने-माने इतिहासकार और राजनीतिक चिंतक हॉब्सबॉम ने बीसवीं सदी को एक संक्षिप्त सदी की संज्ञा दी थी. उनके मुताबिक उन्नीसवीं सदी बहुत लंबी थी जो फ्रांसिसी क्रांति से शुरू हुई और प्रथम विश्वयुद्ध तक चली. इसके बाद बीसवीं सदी शुरू हुई जो 1991 तक आते-आते ख़त्म हो गई. जाहिर है वे सदियों को सौ वर्षों में नहीं, प्रवृत्तियों में देख रहे थे.

लेकिन एक शख़्स ऐसा था जिसने हम सबके लिए बीसवीं सदी को बचाए रखा था. वह बीसवीं सदी को इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई तक खींच लाया. इस शुक्रवार को वह चला गया और उसके साथ बीसवीं सदी भी अंतिम तौर पर विदा हो गई.

वह फिदेल कास्त्रो था. बीसवीं सदी अपने उत्तरार्ध में जिस तरह शीतयुद्ध को लेकर बंटी रही, उसी तरह कास्त्रो को लेकर प्रशंसा और आलोचना के दो ध्रुवांतों में बंटी रही. फिदेल कास्त्रो थे, इसलिए अमेरिका को मुंह चिढ़ाता और सारी दुनिया के लिए एक मिसाल बनता क्यूबा था. अगर फिदेल न होते तो कोलकाता, दिल्ली या मुंबई से भी कम आबादी वाला यह देश दुनिया के विशाल नक्शे पर एक खोया हुआ बिंदु भर होता जिसके राष्ट्रपतियों का आना-जाना, जीना-मरना दुनिया भर के अख़बारों की सुर्खियों का विषय न होता. महान कम्युनिस्ट नेताओं की प्रारंभिक सूची में अगर लेनिन और माओ के साथ फिदेल, चेग्वेरा और हो ची मिन्ह जैसे बनिस्बत छोटे मुल्कों से जुड़े नेताओं के नाम भी न सिर्फ लगातार जुड़ते रहे, बल्कि कहीं ज़्यादा स्वप्निल क्रांतिकारिता के साथ लिए और जिए जाते रहे तो इसलिए कि वे बस क्यूबा या वियतनाम के नहीं थे, वे पूरी दुनिया के साझा सपनों के वाहक थे- समानता और स्वतंत्रता के उन सपनों के, जिन्हें एक क्रांति द्वारा अर्जित किया जाना था और संपन्नता की क्रूरता को ख़त्म किया जाना था.

अगर फिदेल न होते तो क्यूबा दुनिया के विशाल नक्शे पर एक खोया हुआ बिंदु भर होता जिसके राष्ट्रपतियों का आना-जाना, जीना-मरना दुनिया भर के अख़बारों की सुर्खियों का विषय न होता

यह परियोजना क्यों अधूरी छूट गई या बहुत सारी दूसरी विडंबनाओं की शिकार हो गई- यह शोकांतिका एक अलग अध्ययन की मांग करती है, लेकिन फीदेल के निधन से अचानक याद आया कि बहुत दूर नहीं, बिल्कुल हाल में ही एक ऐसी बीसवीं सदी थी जहां ये सारे सपने ज़िंदा थे और जिनके लिए लड़ाई जारी थी. दो-दो विश्वयुद्धों से लहूलुहान और एक शीत युद्ध से झुलसी इस बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ऐसी क्रांतिकारी जमातें थीं जो यूरोपीय साम्राज्यवाद और अमेरिकी पूंजीवाद के विराट तंत्र से लोहा लेती हुई अपनी बहुत भंगुर, गरीब, मगर अकातर व्यवस्था बनाने में जुटी थीं- एक ऐसी व्यवस्था जिसमें मनुष्य की गरिमा पूंजी के वैभव से फीकी न पड़ती हो. फिर दुहराने की जरूरत है कि अक्सर ये व्यवस्थाएं अपने सपनों के ख़िलाफ़ जाती नज़र आईं और बहुत फौलादी हाथों वाले तानाशाही भरे तंत्र की भी शिकार हुईं, जिनके असली दंश वे महसूस करते हैं जो इनके निशाने पर रहे, मगर शायद यही चीज़ थी जिसने इन्हें ख़त्म भी कर डाला. रूसी क्रांति को उसकी क़ब्र तक ले जाने वाले गोर्बाच्यौव ने अपनी किताब ‘पेरेस्त्रोइका’ में लिखा है कि कोई भी क्रांति एक दौर में पूरी नहीं होती- साम्यवादी क्रांति को भी कई रूपांतरणों से गुज़रना होगा.

लेकिन ये सब अब किसी और जमाने की बातें लगती हैं. फिदेल का अटूट जीवट जैसे एक असंभव वृत्तांत जान पड़ता है. 100 से भी कम योद्धाओं के साथ ग्रैन्मा नाम के पोत से क्यूबा लौटकर एक पहाड़ पर शिविर बनाने और बतिस्ता को उखाड़ फेंकने की दास्तान एक परिकथा लगती है. अमेरिका ने पता नहीं, कितनी बार फिदेल को मारने की कोशिश की मगर नाकाम रहा. उसने चिली के अयेंदे को मार डाला. फिदेल कास्त्रो के दोस्त रहे गैब्रियल गार्सिया मारखेज ने लिखा है कि जीवन भर हथियार न उठाने वाला अयेंदे बिल्कुल आखिरी समय में फिदेल कास्त्रो की दी हुई राइफ़ल लेकर कई घंटे अपने हमलावरों का सामना करता रहा.

तो फिदेल कास्त्रो के साथ वह शख़्स चला गया है जो अमेरिका और उसकी साज़िशों से लड़ने के लिए किसी को उपहार में राइफल दे सकता था. अब तो अमेरिका हथियार भी देता है, पैसे भी देता है, साज़िश भी करता है और साज़िश से लड़ने के नाम पर अंदरूनी राजनीति में घुसपैठ भी करता है. पूरब और पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक पूंजी और पूंजीवाद की ऐसी पताका फहरा रही है कि उसके आगे बाकी सारे मूल्य दरक और बिखर से गए हैं. बराबरी का कोई सपना जितना हास्यास्पद लगता है, उससे ज्यादा हास्यास्पद बराबरी की लड़ाई लगती है. दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियां या तो अपनी विडंबनाओं और अपने भितरघातों की शिकार होकर बरबाद हो चुकी हैं या इस ग्लोबल दुनिया के नए तौर-तरीकों पर ही चल रही हैं या फिर संसदीय लोकतंत्र की लगभग अपरिहार्य मान ली गई व्यवस्था में खप गई हैं. अब तो यह हो रहा है कि बिल्कुल संकीर्ण सांप्रदायिक और राष्ट्रवादी धारणाओं के बीच मजबूत हो रहे राजनीतिक दल और उनके बुद्धिजीवी हर बीमारी के लिए साम्यवाद को दोषी ठहराते हुए उसके समूल नाश की शपथ लेते हुए चुटिया बांधते दिखाई पड़ते हैं- बिना यह समझे कि साम्यवादी व्यवस्था ख़ुद ख़ुदकुशी कर रही है.

ऐसे समय में कास्त्रो का जाना कुछ उदास करता है- क्योंकि यह खयाल आता है कि हम अपनी कितनी सारी ज़रूरी और मानवीय लड़ाइयां भूल चुके हैं

लेकिन इन साम्यवादी व्यवस्थाओं की मौत बराबरी के सपने की मौत नहीं है. यह सच है कि दुनिया भर की पूंजीवादी व्यवस्थाओं और सरकारों को भी अपनी वैधता के लिए समाजवादी नारों और मुहावरों की ही मदद लेनी पड़ती है. अमेरिका में ट्रंप भी यह करते दिखे और अपने यहां मोदी भी करते दिख रहे हैं.

विडंबना बस इतनी है कि समाजवाद का यह छद्म अब उस पूंजीवाद के काम आ रहा है जो ऊपर से बहुत चमकीला है मगर भीतर से खोखला और भयावह- हमारे नए बनते शहरों की तरह, जहां चमचमाते फ्लाईओवरों के बीच ऊपर से दमकती हुई गाड़ियां गुज़रती हैं और उनके नीचे की गंदगी और घुटन में कई लोग रैनबसेरे को मजबूर होते हैं. लेकिन हमारा सबकुछ इस नई संपन्नता को समर्पित है.

इस नई दुनिया में फिदेल कास्त्रो किसी को अजूबे लग सकते हैं- लुप्त हो चुकी डायनासौर प्रजाति के अंतिम वंशज. उनका जाना कुछ उदास करता है- क्योंकि यह खयाल आता है कि हम अपनी कितनी सारी ज़रूरी और मानवीय लड़ाइयां भूल चुके हैं, कि एक विराट चक्के के तले सारी अस्मिताएं कुचली जा रही हैं और भव्यता के छोटे-छोटे टापू बढ़ते जा रहे हैं, कि श्रम और मानवीय गरिमा की क़द्र लगातार घट रही है और घर-परिवार, मुहल्ले, शहर सब एक विराट मॉल में बदलते जा रहे हैं. इस दुनिया के ख़िलाफ़ फिदेल ने प्रतिरोध का जो टापू बनाया था, वह क्यूबा भी बदल रहा है. जाते-जाते कास्त्रो याद दिला रहे हैं कि कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा- न कविता, न संगीत, न देशप्रेम, न घर, न मुहल्ले, न परिवार, न राजनीति, न प्रतिरोध- लेकिन यह स्मृति भी बता रही है कि सपना बचा हुआ है और फिदेल कास्त्रो की वह प्रेरणा बची हुई है जो बहुत सारे नौजवानों को अब भी दिशा दे सकती है.