पहले उस घटना का जिक्र जो भारत जैसे देशों में सत्ता शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए मिसाल हो सकती है. यह घटना अप्रैल, 2010 में मैक्सिको की खाड़ी में हुई थी. अमेरिका में लुइसियाना के समुद्र तट से करीब 66 किलोमीटर दूर समंदर के भीतर तेल का कुआं था, ‘डीप वॉटर होराइजन रिग’. यहां से तेल निकालने का काम ब्रिटिश पेट्रोलियम (बीपी) की सहयोगी ट्रांसओशन नाम की कंपनी करती थी. इस कुएं में 20 अप्रैल को अचानक धमाका हुआ और आग की लपटों के साथ तेल बहकर समुद्र के पानी में मिलने लगा. हादसे में 11 लोगों की मौत हो गई जबकि 17 घायल हुए. आग पर काबू पाने की तमाम कोशिशें बेकार हो गईं. दो दिन बाद यहां स्थित पूरा संयंत्र समुद्र में डूब गया. अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक, इस घटना के बाद रोज करीब 60,000 बैरल कच्चा तेल समुद्र में मिलने लगा था.

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, जून तक मिसीसिपी, अलबामा और फ्लोरिडा के तट से लगते हुए 1,770 किलोमीटर के दायरे में समुद्र का पानी कच्चे तेल से बुरी तरह प्रदूषित हो चुका था. यह इस दशक की सबसे बड़ी पर्यावरणीय दुर्घटना थी. खुशकिस्मती से इस हादसे में ज्यादा लोगों की जान नहीं गई लेकिन दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका को यह अच्छी समझ थी कि इसकी वजह से पर्यावरण को जो नुकसान हुआ है, उसका खमियाजा आने वाली कई पीढ़ियों को भुगतना होगा. लिहाजा, उसने संयंत्र की मालिक कंपनी को यूं ही नहीं जाने दिया. उसने न सिर्फ कंपनी पर अदालती कार्यवाही की, बल्कि उससे पूरे समुद्री इलाके की सफाई पर होने वाला खर्च भी वसूल लिया. मुआवजा लिया, वह अलग. यह सब सिर्फ छह साल में हो गया. माना जाता है कि इस पूरे मामले में बीपी को करीब 50 अरब यूरो (4,299 अरब रुपए) खर्च करने पड़े.

और अब उस हादसे की बात, जो त्रासदियों की अनंत कथा बन चुका है. भोपाल गैस कांड. कहने के लिए यह हादसा 1984 में दो-तीन दिसंबर की दरम्यानी रात को हुआ था. उस रात यूनियन कार्बाइड के कारखाने से रिसी मिथाइल आइसोसाइनेट गैस (एमआईसी) ने देखते ही देखते 3,000 से ज्यादा (यह उस वक्त का सरकारी आंकड़ा है) जिंदगियां लील लीं. लेकिन यकीन जानिए उस हादसे के बाद भी बीते 33 साल से लगातार कुछ न कुछ रिस रहा है. गैस पीड़ितों के जख्म रिस रहे हैं. राज्य और केंद्र में बैठी सरकारों की लापरवाहियां रिस रही हैं. और यूनियन कार्बाइड के बंद कारखाने में अब तक पड़े लगभग 346 टन रासायनिक कचरे से जमीन के भीतर जहर रिस रहा है. पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, इस जहर ने आस-पास के करीब चार-पांच किलोमीटर के दायरे की जमीन और उसके नीचे के पानी को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया है.

अब तक दर्जनों अध्ययन लेकिन सरकारी एक भी नहीं

यूनियन कार्बाइड के बंद कारखाने के भीतर कौन सा रसायन, कितनी मात्रा में है, इस संबंध में अब तक सरकार ने कोई विशिष्ट अध्ययन नहीं कराया है. सत्याग्रह से बातचीत में खुद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल (सीपीसीबी) के क्षेत्रीय प्रभारी आरएस कोरी यह स्वीकार करते हैं. उनके मुताबिक, ‘हमने अभी इस रासायनिक कचरे से पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में भी कोई अध्ययन नहीं किया है.’ अलबत्ता, मध्य प्रदेश के लोकस्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की राज्य स्तरीय शोध प्रयोगशाला ने जरूर 1991 और 1996 में दो अध्ययन किए थे. इन अध्ययन रिपोर्टों में माना था कि यूनियन कार्बाइड कारखाने से लगने वाली पांच-छह कालोनियों के हैंडपंपों का पानी बुरी तरह प्रदूषित हो चुका है. यानी इन इलाकों में जमीन के नीचे का पानी किसी भी तरह से इस्तेमाल लायक नहीं है. लेकिन इन रिपोर्टों को गोपनीय बताकर दबा दिया गया.

हालांकि यह बात अलग है कि 1999 में दुर्घटनावश 1996 की रिपोर्ट में दर्ज अहम जानकारी लीक हो गई. लेकिन इसके बावजूद इन रिपोर्टों को सरकार ने कभी गंभीरता से नहीं लिया. दूसरी तरफ, 1989 से 2010 तक विभिन्न संस्थाओं द्वारा पेश की गईं करीब 10 अध्ययन रिपोर्ट चीख-चीखकर बताती हैं कि भोपाल की आबो-हवा में जहर अब तक भरा है. ऐसी ही एक रिपोर्ट भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन (बीजीआईए) ने 1990 में दी थी. इसमें बताया था कि फैक्ट्री परिसर के आसपास की कॉलोनियों से लिए गए पानी-मिट्‌टी के नमूनों में आठ खतरनाक रसायन मिले हैं. ये हैं - बेंजीन, ऑक्सीबिस, डाइक्लोरोबेंजीन, ट्राइक्लोरोबेंजीन, फ्थैलेट्स, पॉलीन्यूक्लियर एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, नेफ्थालेनॉल और ट्राइमिथाइल ट्राइएंजिन्ट्रॉएन. यानी सीधे तौर पर मानें तो ये सभी जहरीले रसायन फैक्ट्री परिसर में पड़े कचरे में भी मौजूद हैं.

पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ग्रीनपीस ने 1999 में जो रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें जहरीले रसायनों से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में भी बताया था. मसलन, डाइक्लोरोबेंजीन शरीर में ज्यादा चले जाने से लिवर और किडनी फेल हो सकती हैं. इस अध्ययन में कुछ अन्य रसायनों को भी पानी-मिट्‌टी के नमूनों में पाया गया. जैसे कि ट्राइक्लोरोएथीन, जिसके कारण बोलने-चलने में मुश्किल होने लगती है. किडनी, लिवर, दिल, आदि इसके कारण भी फेल होते हैं. इंसान कोमा में जा सकता है, यहां तक कि मौत भी सकती है. क्लोरोफॉर्म और कार्बनटेट्राक्लोराइड भी इन नमूनों में मिले, जिन्हें अमेरिका का स्वास्थ्य एवं मानवसेवा विभाग इंसानों के तंत्रिका तंत्र, किडनी, लिवर आदि के लिए बेहद हानिकारक करार दे चुका है. इनकी अधिकता से भी मौत होने तक की नौबत आ जाती है.

…और मौतें तो लगातार हो ही रही हैं

हानिकारक रसायनों से मौत और प्रभावितों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी शारीरिक विकृतियों का सिलसिला लगातार जारी भी है. शुरुआत से ही इस मामले में संघर्ष कर रहे भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के प्रमुख अब्दुल जब्बार के मुताबिक, ‘सरकार ने 1989 में यूनियन कार्बाइड से मुआवजा संबंधी समझौते के वक्त महज 3,700 मौतों और 1,02,000 घायलों का आंकड़ा ही स्वीकार किया था. लेकिन तीन अक्टूबर 1991 को शीर्ष अदालत के फैसले बाद से जब दावा अदालतें बैठीं तो उन्होंने 15,274 मौतों और 5.74 लाख से ज्यादा घायलों के लिए मुआवजा वितरित किया.’ जब्बार पूछते हैं, ‘घायलों और मरने वालों की संख्या आखिर कैसे बढ़ गई. और हमारा तो आकलन है कि अब तक करीब 35,000 मौतें गैस के दुष्प्रभाव और जहरीले रसायनों के कारण हो चुकी हैं.’

जहरीला कचरा हटाने के अब तक सिर्फ ट्रायल ही हुआ है

जहरीले रसायनों के दुष्प्रभाव लगातार सामने आ रहे हैं. इसके बावजूद अब तक यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर से रासायनिक कचरे को हटाने का कोई ठोस प्रयास सामने नहीं आया है. कोई पुख्ता योजना भी नहीं दिखती. सीपीसीबी के चेयरमैन कोरी कहते हैँ, ‘मामला न्यायालय के विचाराधीन है. उसकी इजाजत के बिना कुछ नहीं हो सकता. जब हमें ऊपर से निर्देश मिले थे तब पीथमपुर एक टीएसडीएफ (वेस्ट ट्रीटमेंट स्टोरेज एंड डिस्पोजल फैसिलिटी) में 10 टन कचरा जलाने का ट्रायल हुआ था. यह सफल रहा. आगे हमें ऊपर से जैसा निर्देश मिलेगा, उसके मुताबिक कार्रवाई करेंगे.’ इस बाबत मध्य प्रदेश सरकार के गैस राहत मंत्री विश्वास सारंग से जब सत्याग्रह ने सवाल किए तो उन्होंने कहा, ‘यूनियन कार्बाइड के कचरे का निपटारा करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है. उसके बारे में अगर अध्ययन कराना है, तो यह भी उसका ही काम है. हम तो चाहते हैं कि जल्द से जल्द यह काम पूरा हो. इसके लिए हम सीपीसीबी से बार-बार आग्रह भी कर रहे हैं. लेकिन इसमें राज्य सरकार की कोई भूमिका है नहीं.’

जहरीला कचरा जलाने में भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट भी है

मामला सिर्फ सरकारी लापरवाही तक नहीं दिखता, जहरीला कचरा जलाने में भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट भी है. पिछले साल एक बड़े स्थानीय अखबार में छपी खबर से इस आशंका को बल मिलता है. खबर के मुताबिक पीथमपुर की टीएसडीएफ की मालिक रामकी कंपनी ने खुद बताया है कि 10 टन कचरा जलाने के ट्रायल के दौरान महज एक करोड़ रुपए का खर्च आया है. फिर जैसा कि जब्बार बताते हैं, ‘केंद्र सरकार ने 346 टन कचरे को निपटाने के लिए 310 करोड़ का रुपए का प्रावधान किया हुआ है.’ इसका मतलब है कि सरकार के आकलन के अनुसार एक टन कचरा निपटाने में करीब एक करोड़ रुपए लग जाएंगे. खर्च का यह बढ़ाचढ़ा आकलन ही संदेह की मुख्य वजह है. वहीं दूसरी तरफ सरकार ने 67 एकड़ में फैले फैक्ट्री परिसर की जमीन को 20-25 फीट नीचे तक खोदकर मिट्‌टी को प्रदूषणमुक्त करने का खर्च भी अभी अपने आकलन में संभवत: जोड़ा नहीं है. इतना ही नहीं, इस कचरे को निपटाने का ठेका जिस रामकी कंपनी को मिला है, उसके बारे में तो यहां तक कहा जा रहा है कि वह मौजूदा उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू के रिश्तेदार की है. हालांकि सत्याग्रह इसकी पुष्टि नहीं करता.

जहरीले रासायनिक कचरे की अनदेखी, उसे निपटाने में की जा रही लापरवाही इस अनंत त्रासद कथा का सिर्फ एक पहलू है. मुआवजे से लेकर गैस पीड़ितों को दी जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही या दखलंदाजी, दोषियों को सजा न मिल पाना, हादसे के सबसे बड़े दोषी वॉरेन एंडरसन (यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन के तत्कालीन मुखिया) को भागने में मदद करने वालों पर कार्रवाई न होना और ऐसे न जाने कितने पहलू हैं, जो इस त्रासदी के जख्म सूखने नहीं देते. हर साल दिसंबर की तीन तारीख नजदीक आते-आते ये हरे होने लगते हैं. इस बार भी हो रहे हैं.