एक के लिए जो शौर्य दिवस है, दूसरे के लिए यौमे गम (शोक दिवस) है. दोनों शताब्दियों के पड़ोसी हैं और एक का दावा है कि वह दूसरे का बड़ा भाई है.

जिस संदर्भ में यह बात हो रही है, वह छह दिसंबर की तारीख है. पिछले साल एक अंग्रेज़ी अखबार ने इस तारीख के बारे में अगले दिन यों रिपोर्ट लिखी:

क्या हुआ: अयोध्या में कोई हलचल नहीं.

इसका आशय: उत्तर प्रदेश चुनाव में शायद राम मंदिर निर्माण मुद्दा न रहे.

आगे क्या होगा: अगले साल बाबरी मस्जिद ध्वंस की पचीसवीं सालगिरह होगी.

आज बाबरी मस्जिद ध्वंस की 25वीं सालगिरह है, अगले साल 26वीं हो जाएगी. यह एक भावनाशून्य वाक्य है. इस वाक्य से यह ध्वनित होता है कि बाबरी मस्जिद प्रसंग भारतीय स्मृति के लिए महत्त्वहीन हो चुका है.

अखबार की रिपोर्ट से किसी मसले पर राय बनाने के हमारे तरीके पर भी रोशनी पड़ती है. कोई बात सही है या गलत, यह पूछने की जगह अब हम यह पूछते हैं कि इसका चुनाव पर क्या असर होगा. उदाहरण के लिए सार्वजनिक चर्चा में आज यह पूछा जाता है कि नोटबंदी और जीएसटी का गुजरात चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ेगा! मानो, इसी से उसका औचित्य-अनौचित्य सिद्ध होता है.

कुछ वर्ष पहले तक बाबरी मस्जिद के ध्वंस को सार्वजनिक तौर पर वे लोग भी एक अपराध की तरह ही लेते थे जिन्होंने उसे ध्वस्त करने के लिए एक लंबा अभियान चलाया था. हालांकि उसी दम वे यह भी कहते रहे कि मंदिर वहीं बनना चाहिए. बिना मस्जिद गिराए उसी जगह मंदिर कैसे बन सकता था, इसका उत्तर उनके पास न था!

जिसे राम जन्मभूमि निर्माण अभियान कहा गया लेकिन जो दरअसल बाबरी मस्जिद ध्वंस अभियान था, उसके नायक लालकृष्ण आडवानी अब उसपर बात भी नहीं करना चाहते. एक विदेशी अंग्रेज़ी अखबार के संवाददाता ने कुछ समय पहले जब उन्हें इस सिलसिले में फोन किया था तो उनके दफ्तर से जवाब मिला कि इस विषय पर बात करने में उनकी रुचि नहीं है. लेकिन जिन्हें उनका अभियान याद है, जिसमें वे राम रूप धरकर अयोध्या को कूच कर रहे थे, वे उसके हिंसक और मूल रूप से मुस्लिम विरोधी संदेश को भूल नहीं सकते.

हम सबको, जिन्होंने आडवानी की यात्रा देखी है, याद है कि अपने अभियान को उन्होंने धार्मिक बताया था. लेकिन कुछ वक्त गुजर जाने के बाद उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह धार्मिक नहीं, राजनीतिक अभियान था. यह राजनीतिक हिंदू मतदातावर्ग के निर्माण और उसके संगठन का सबसे बड़ा और सफल अभियान था.

आडवानी ने यह कहने के बावजूद इस अभियान के परिणाम, यानी बाबरी मस्जिद के ध्वंस की कोई जवाबदेही नहीं ली. अटल बिहारी वाजपेयी पहले ही इसपर आंसू गिरा चुके हैं. हालांकि हम सबने अयोध्या आए कारसेवकों को दिए गए उनके भाषण को देखा है जिसमें वे चतुराई से कूट भाषा में कार सेवकों को वह करने को कह रहे हैं, जो उन्होंने अगले दिन किया.

राम जन्मभूमि निर्माण या यज्ञ में आरंभ से लेकर आज तक छल-कपट, झूठ और कायरता से काम लिया गया है. नवम्बर, 1949 को रात के अंधेरे में हिंदू प्रशासनिक अधिकारियों ने षडयंत्रपूर्वक बाबरी मस्जिद के भीतर मूर्तियां रखीं. इसे वे और उनके वंशज गर्वपूर्वक कहते रहे हैं. बाद में उन्होंने प्रचारित किया कि राम लला प्रकट हुए हैं.

इसका अर्थ बिलकुल साफ़ है: मस्जिद को मंदिर में बदलने का काम चोरी-छिपे रात के अंधेरे में किया गया. यह कोई शूरवीरता न थी. यह काम उन्होंने किया जिनका जिम्मा मस्जिद की हिफाजत का था. लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्य से ठीक उलटा काम किया. बाद में वे दोनों ही भारतीय जन संघ के नेता बने. जन संघ ने ऐसे व्यक्तियों को शामिल किया जिन्होंने अपनी शपथ का उल्लंघन किया था. इसे कैसे तर्कसंगत माना जाए?

राम जन्मभूमि अभियान पर इसीलिए हम हिंदुओं को अधिक बात करने की आवश्यकता है, मुसलमानों के मुकाबले. यह इसलिए कि हिंदुओं ने छद्मवीरता को शौर्य मान लिया है. सिर्फ इस पर विचार कीजिए कि अगर आप ऐसी पुलिस और सुरक्षा बल के घेरे में हैं, जो आपके साथ राम नाम जप रही है और आप ऐसी जगह पर चढ़ाई कर रहे हैं, जिसकी रक्षा को कोई है ही नहीं तो उसमें कैसी वीरता!

अनिल यादव और राघवेंद्र दुबे ने कुछ समय पहले 1992 की छह दिसंबर की याद की. वाजपेयी, आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, आदि के अनुयायी कार सेवकों ने, जो उन्हीं के आह्वान पर इकट्ठा हुए थे, किस तरह की शूरवीरता का परिचय दिया, इसका वर्णन इन दोनों के संस्मरणों में पढ़ा जा सकता है.

अनिल यादव किसी तरह जान बचा कर अयोध्या से निकले. अगर राघवेंद्र दुबे न होते तो कारसेवकों ने उन्हें मार ही डाला था. अनिल इसे याद करते हुए लिखते हैं, ‘छह दिसंबर की दोपहर बाबरी मस्जिद के गुंबदों के गिरने का समय दर्ज करते हुए, सन्निपात में चिंघाड़ते, बड़बड़ाते पागल हो गए लोगों के चेहरे देखते हुए, दंगे में जलते हुए घरों के बीच फैजाबाद की ओर किसी से उधार ली गई मोटरसाइकिल पर भागते हुए, खबर लिखते हुए, कारसेवकों की पिटाई के दर्द को सुन्न हो जाने तक पीते हुए मैं यही अपने मन में बिठाता रहा कि लोकतंत्र एक नाटक है, आदमी अब भी पत्थर युग जितना ही बर्बर है, देश में कुछ निर्णायक रूप से बदल चुका है, असल मुद्दों को दफन कर की जाने वाली शार्टकट धार्मिक जहालत की कुर्सी दिलाऊ राजनीति को सदियों लंबा नया मैदान मिल गया है… मैं हैरान था क्योंकि इसी से जुड़ा एक व्यक्तिगत उपलब्धि जैसा भाव भी उमड़ रहा था - मैने सभ्यता का दूध नहीं खून पीते लंबे दांतों और टपकते पंजों वाले इतिहास को नंगधड़ंग अट्टहास करते देख लिया है.’

अनिल यादव के तकरीबन पचीस साल बाद एक गैर हिंदू दानिश मिर्जा इस निर्णायक रूप से बदल चुके भारत में अभी भी खुद को धर्म नगरी कहने वाली अयोध्या की यात्रा पर निकलते हैं. उन्होंने लिखा है कि हरिद्वार ऋषिकेश जैसी जगहों पर जिस आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है, वैसा कुछ भी अयोध्या में न था. उन्हें अयोध्या में श्रद्धा में डूबकर राम को याद करता शायद ही कोई नज़र आया, अधिकतर लोग बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने की ही बात कर आ रहे थे.

यानी मस्जिद को गिरा दिए जाने के बाद भी वही हिंदू याद पर हावी है. यह एक तरह का शेक्सपीयरीय क्षण कहा जा सकता है. जैसे हेमलेट को हमेशा अपने हाथों पर खून के धब्बों का भ्रम होता रहा, वैसे ही राम मंदिर की हर कल्पना बाबरी मस्जिद के ध्वंस से उठी गर्द से ढकी रहेगी.

क्या यह अपने आप में विडंबना नहीं है कि अयोध्या के राम एक तरह से बाबरी मस्जिद के मलबे के मालिक हैं? या मुहाफिज? क्या राम के इसी नए रूप की अर्चना करना हिंदू स्वीकार कर चुके हैं?