राहुल कोटियाल सत्याग्रह में वरिष्ठ संवाददाता हैं और दिल्ली में रहते हैं.


बचपन में हम सबको ‘बड़ा होकर कुछ बनना होता है.’ मुझे क्या बनना था? अब ठीक से याद नहीं. लेकिन हां, यह अच्छे से याद है कि मुझे बड़ा होकर क्या नहीं बनना था. बचपन में मेरा सबसे बड़ा डर था कि कहीं बड़ा होकर मैं थैला न बन जाऊं. सचमुच का थैला नहीं, डर था कि मैं मोहल्ले के उन अंकल जैसा न बन जाऊं जिन्हें सब थैला कहा करते थे.

उन्हें थैला क्यों कहते थे! इसके शायद दो कारण थे. एक तो वे जहां भी जाते, उनके कंधे पर हमेशा एक थैला लटका होता. दूसरा, उनका पायजामा इतना ढीला होता मानो कोई थैले में पैर डाले चल रहा हो. इसलिए हममें से ही किसी बच्चे ने मजाक-मजाक में उनका नाम थैला रख दिया था. धीरे-धीरे मोहल्ले के बड़े-बूढ़े भी उन्हें थैला ही कहने लगे.

मैं अकेला ऐसा बच्चा नहीं था जिसे बड़ा होकर थैला बन जाने का डर था. मेरे कई दोस्त जैसे राजू, मन्नू, राजीव, अज्जू, संतोष, गोपाल और सोनू भी इस बात से डरते थे. यानी मोहल्ले के सभी लड़के, सिर्फ एक को छोड़कर. थैला अंकल का बेटा - जो हमसे उम्र में काफी बड़ा था - इस संभावना से नहीं डरता था. उसे शायद पता ही नहीं था कि हम सब उसके पापा जैसा बन जाने के ख़याल से भी डरते हैं.

थैला अंकल कई बार चुपके से हमारी गेंद लौटा दिया करते थे. चुपके से यानी अपनी पत्नी से छिपकर. पत्नी के सामने न तो वे गेंद लौटा पाते और न ही अपनी पत्नी को हमारी गेंद हड़प लेने से रोक पाते थे

हम लोग थैला अंकल जैसा क्यों नहीं बनना चाहते थे? यह बताने से पहले आपको अपने मोहल्ले के बारे में कुछ बताता हूं. हमारा मोहल्ला उत्तराखंड के टिहरी जिले में बनी एक कॉलोनी का हिस्सा था. पहाड़ पर बसी कॉलोनी के इस हिस्से में कुल आठ घर थे. हर घर के आगे एक छोटा-सा आंगन था. उसके आगे एक छोटा-सा खेत, ये बिलकुल वैसे ही थे जैसे अधिकतर पहाड़ी गांवों में सीढ़ीनुमा खेत हुआ करते हैं. मोहल्ले के सभी घर एक-दूसरे से बिलकुल सटे हुए थे. सिर्फ थैला अंकल का घर ही था जिसके बगल में कुछ जगह खाली थी. यहीं हम लोग जमकर क्रिकेट खेला करते थे.

चूंकि हमारे खेलने की जगह थैला अंकल के घर से सबसे नजदीक थी इसलिए हमारी गेंद सबसे ज्यादा उन्हीं के खेत में गिरा करती थी. ऐसा होने पर हम गेंद लेने खेत में कूद पड़ते और उनकी सब्जियों को तहस-नहस कर देते. इसके बावजूद भी थैला अंकल ने कभी हमें वहां खेलने से मना नहीं किया. हां, उनकी बीवी जरूर हमारी सबसे बड़ी दुश्मन थीं. हम जब भी क्रिकेट खेलते, वे अपने आंगन में आकर बैठ जातीं. उनकी नज़रों के सामने जब हमारी गेंद उनके खेत में गिरती, तो फिर वह गेंद हमेशा के लिए उन्हीं की हो जाती. उन्होंने हमारी इतनी गेंदे रख ली थीं कि हमें लगता था जरूर वे बाज़ार जाकर पुरानी गेंदों की दुकान लगाती होंगी.

थैला अंकल कई बार चुपके से हमारी गेंद लौटा दिया करते थे. चुपके से यानी अपनी पत्नी से छिपाकर. पत्नी के सामने न तो वे गेंद लौटा पाते और न ही अपनी पत्नी को हमारी गेंद हड़प लेने से रोक पाते थे. यह बात हम बच्चों को बड़ा अखरती थी. हमें लगता था कि थैला अंकल अपनी पत्नी से बहुत डरते हैं. पत्नी से डरने वाला मर्द भी कोई मर्द हुआ भला! इसलिए हम मानने लगे थे कि थैला अंकल नामर्द हैं.

थैला अंकल की दिनचर्या भी कुछ ऐसी थी कि उनके ‘नामर्द’ होने का हमारा विश्वास लगातार मजबूत हुए जाता था. रोज़ सुबह मोहल्ले की औरतें या लड़कियां अपने-अपने आंगन में झाड़ू लगाया करती थी लेकिन थैला अंकल के आंगन में झाड़ू लगाने का काम उनकी बेटी या पत्नी नहीं, वे खुद करते थे. झाड़ू लगाने के बाद वे कभी अपने खेत में पानी सींचते, तो कभी खेत की बाड़ को मजबूत करते दिखते. फिर लगभग साढ़े नौ बजे वे कंधे पर अपना थैला लटकाए काम पर चल देते.

बात राजू को चिढ़ाने से शुरू हुई थी कि वह इतना डरता है कि बड़ा होकर जरूर थैला बनेगा. इस पर राजू ने प्रतिरोध किया - ‘अचानक आई बॉल से कोई भी डर सकता है. लेकिन मैं थैला अंकल की तरह अपनी बीवी से नहीं डरने वाला.’

शाम को जब वे ऑफिस से लौटते तो उनका थैला कुछ ज्यादा भरा-भरा होता जिसमें से कुछ सब्जियां बाहर झांक रही होती. घर लौटते ही वे अपना थैला-रुपी पायजामा पहन लेते और फिर से घर के कामों में लग जाते. छुट्टी वाले दिन वे अक्सर घर की छत पर कपड़े सुखाते और शाम को सूखे हुए कपड़े उतारते नज़र आते. पूरे मोहल्ले में थैला अंकल के अलावा और कोई मर्द ऐसा नहीं था जो घर के इतने कामकाज करता हो. इसलिए हम बच्चों को उनके ‘मर्द’ होने पर शक था.

मोहल्ले में एक अंकल थे जिनकी बाइक, और बाइक चलाने की स्टाइल के हम सभी बच्चे दीवाने थे. एक अंकल थे जिनकी लंबाई-चौड़ाई हमें उनके बाहुबल का दीवाना बनाती थी. एक और अंकल थे जो रामलीला में हनुमान बनते थे और उनका अभिनय हम बच्चों को ही नहीं बल्कि हजारों दर्शकों को अभिभूत कर देता था. लेकिन थैला अंकल में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसकी हम सराहना करते या जिसे देखकर हम भी उनके जैसा बनना चाहते. हालांकि उनके जैसा न बनने का डर भी हममें अब तक पैदा नहीं हुआ था. यह डर एक दिन खेल के मैदान में हुई एक घटना के बाद पैदा हुआ.

हम लोग क्रिकेट खेल रहे थे. एक दोस्त गोपाल बॉलिंग कर रहा था और दूसरा दोस्त राजू कवर पर खड़ा था. एक बॉल पर बैट्समैन ने शॉट लगाया तो राजू कैच लपकने की जगह बॉल से घबराकर नीचे बैठ गया. बॉल सरसराती हुई बाउंड्री से बाहर निकल गई. गोपाल को राजू की इस हरकत पर इतना गुस्सा आया कि वह उस पर चीख पड़ा, ‘साले इतना डरता क्यों है? तू थैला है क्या?’ गोपाल की इस बात पर हम सभी ठहाका लगाकर हंस दिए. अब ‘थैला’ हमारे लिए ‘डरपोक’ का भी पर्यायवाची बन गया.

उस दिन मैदान से घर लौटते हुए ‘थैला’ ही हमारी चर्चा का विषय बना रहा. बात राजू को चिढ़ाने से शुरू हुई थी कि वह इतना डरता है कि बड़ा होकर जरूर थैला बनेगा. इस पर राजू ने प्रतिरोध किया - ‘अचानक आई बॉल से कोई भी डर सकता है. लेकिन मैं थैला अंकल की तरह अपनी बीवी से नहीं डरने वाला.’ यह चर्चा इसी दिशा में और आगे बढ़ी और सब एक-दूसरे को चिढ़ाने लगे कि कौन-कौन बड़ा होकर ‘जोरू का गुलाम’ बनने वाला है. हर बार थैला अंकल का उदाहरण दिया जाता और एक-दूसरे को चिढ़ाया जाता. ‘तू तो थैला अंकल की तरह रोज़ घर में झाड़ू लगाएगा’, ‘तो तू उनकी तरह बीवी का पेटीकोट भी धोएगा’, ‘तू तो अपनी बीवी के आगे चूं भी नहीं करेगा.’ घर पहुंचने तक हम एक-दूसरे को इसी तरह चिढ़ाते रहे और अपने-अपने बचाव में कहते भी रहे कि ‘मेरी बीवी ज्यादा बोलेगी तो मैं घुमा के उसे दो थप्पड़ लगा दूंगा’, ‘मैं तो अपने कच्छे भी अपनी बीवी से ही धुलवाऊंगा’, ‘मैं तो कभी घर में झाड़ू-पोंछा नहीं लगाऊंगा, सारे काम बीवी से करवाऊंगा.’

हमारी इस ‘मर्द’ की परिभाषा में वे अंकल आते थे जो शराब पीकर अपनी पत्नी और बच्चों को मारते थे, वे अंकल भी जो दिन-दिन भर मोहल्ले के चबूतरे पर ताश खेला करते थे और जिन्हें कई बार पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी

थैला अंकल पर हमारी जो चर्चा उस दिन शुरू हुई, फिर बढ़ती ही गई. अब हम अक्सर एक-दूसरे को उनके जैसा बन जाने की संभावना पर चिढ़ाते. साथ ही अपना-अपना बचाव करते हुए कहते, ‘चाहे जो हो जाए मैं कभी थैला नहीं बनूंगा.’ इसी दौर में गोविंदा की फिल्म ‘जोरू का गुलाम’ भी रिलीज़ हुई थी. इसके गाने सुनने के बाद हमने थैला अंकल को भी चिढ़ाना शुरू कर दिया. वे जब भी हमारे सामने से गुजरते तो हम मिलकर गाने लगते, ‘शाम-सवेरे अब मैं जोरू-जोरू कहूंगा. मैं तो जोरू का गुलाम बनकर रहूंगा.’

थैला अंकल हमारी इस हरकत पर भी कभी नाराज़ नहीं हुए. पता नहीं वे हमें जानबूझकर अनसुना कर देते थे या जानते ही नहीं थे कि हम उन्हें चिढ़ाने के लिए यह गाना गाते हैं. हमारी ऐसी हरकतों से मोहल्ले के बाकी लोग यह जान गए कि हम बच्चे थैला अंकल के बारे में क्या सोचते हैं और कैसी बातें करते हैं. लेकिन कभी किसी ने हमें इस बात के लिए डांटा नहीं. यहां तक कि मोहल्ले की औरतों को भी जब मालूम हुआ कि हम थैला अंकल को ‘औरतों के काम करने वाला’, ‘पत्नी से डरने वाला’ और ‘जोरू का गुलाम’ कहते हैं तो उन्होंने भी हमें नहीं डांटा. उन आंटी ने भी कभी थैला अंकल की अच्छाइयों के बारे में हमें नहीं समझाया जिनके पति अक्सर शराब पीकर उनसे गाली-गलौच किया करते थे. बल्कि वे भी हमारे इस मज़ाक में शामिल हो गईं कि कौन-कौन बड़ा होकर थैला बनेगा. अब कई बार तो ऐसा भी होता कि मोहल्ले की सभी आंटियां मिलकर आपस में थैला अंकल का मज़ाक बना रही होतीं.

थैला अंकल को लेकर हम बच्चे जो बातें किया करते थे, उसमें जब मोहल्ले के बड़े भी मज़ाक-मज़ाक में शामिल हो गए, तो हमारा यह विश्वास और भी मजबूत हो गया कि थैला अंकल जैसा बनने से बुरा शायद और कुछ नहीं हो सकता. हमने समझ लिया था कि थैला अंकल जैसे लोगों की कोई इज्ज़त नहीं होती इसलिए हमें बड़ा होकर थैला नहीं बल्कि ‘मर्द’ बनना है. इस ‘मर्द’ की परिभाषा में वे अंकल भी आते थे जो शराब पीकर अपनी पत्नी और बच्चों को मारते थे, वे अंकल भी जो दिन-दिन भर मोहल्ले के चबूतरे पर ताश खेला करते थे और जिन्हें कई बार पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी और वे भी जो सबके सामने अपनी पत्नी को बुरी तरह डांट दिया करते थे. बस थैला अंकल ही हमारी ‘मर्द’ की उस परिभाषा से बाहर थे जो हमें बनना था.

आज थैला अंकल के बारे में सोचता हूं तो उनके जैसा बन जाने की संभावना से डर नहीं लगता. बल्कि यह एहसास होता है कि उस आदमी को तब भी हम बच्चों का आदर्श होना चाहिए था

कुछ समय बाद मेरा दाखिला रानीखेत के एक बोर्डिंग स्कूल में हो गया. वहीं से मैंने स्कूल की पढ़ाई पूरी की, फिर देहरादून से कॉलेज की पढ़ाई की और फिर नौकरी के लिए दिल्ली चला आया. इस दौरान कई बार बचपन की यादें आती रही जिनमें थैला अंकल से जुड़े किस्से भी शामिल थे. लेकिन अब थैला अंकल को याद करने पर वैसा नहीं लगता था जैसा बचपन में हम सोचते थे. बल्कि धीरे-धीरे लगने लगा कि उनसे अच्छा शायद ही कोई और आदमी पूरे मोहल्ले में रहा हो. उन्हें कभी हमने किसी से ऊंची आवाज़ में बात करते नहीं सुना था, कभी अपनी पत्नी पर नाराज़ होते नहीं देखा था, कभी अपने बच्चों को पीटते नहीं देखा था, कभी किसी से झगड़ते नहीं पाया और कभी बीड़ी-सिगरेट पीते या शराब पिए हुए भी नहीं देखा था. उनके बारे में मैं जब भी सोचता तो वह हंसमुख चेहरा ही याद आता जो मुस्कुराते हुए हम बच्चों को उनकी बॉल लौटाया करता था.

धीरे-धीरे यह भी समझ आया कि ‘नामर्द’, ‘औरतों के काम करने वाला’ और ‘जोरू का गुलाम’ जैसे जिन खांचों में हमने उन्हें डाल दिया था, वे कितने फूहड़ और खोखले थे. आज महिला विमर्श काफी आगे बढ़ चुका है. हर क्षेत्र में महिलाओं की भागेदारी लगातार बढ़ रही है, रोज़मर्रा के कामों को ‘औरतों वाले काम’ कहने का प्रचलन कम हो रहा है और पुरुष भी घरेलू कामों में हाथ बंटाने लगे हैं. लेकिन थैला अंकल आज से लगभग बीस साल पहले एक छोटे से पहाड़ी कस्बे में रहते हुए यह सब कर रहे थे. वे तब भी यह समझ रहे थे कि उन्हें अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए अपनी पत्नी को डराने-धमकाने या पीटने की जरूरत नहीं है. वे तब भी यह जानते थे कि ‘जोरू का गुलाम’ कहे जाने के डर से वे अपनी उन जिम्मेदारियों को नहीं नकार सकते जो हर पुरुष की होनी चाहिए. वे उस दौर में भी वे सारे काम कर रहे थे जिन्हें तब सिर्फ ‘औरतों वाले काम’ के रूप में ही देखा जाता था.

आज थैला अंकल के बारे में सोचता हूं तो उनके जैसा बन जाने की संभावना से डर नहीं लगता. बल्कि यह एहसास होता है कि उस आदमी को तब भी हम बच्चों का आदर्श होना चाहिए था. कारण शायद यही था कि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम बड़े हुए, या आज भी जो बच्चे बड़े हो रहे हैं, उसमें थैला अंकल जैसे लोग आदर्श नहीं बनाए जाते. क्योंकि उस समाज में घरेलू कामकाज में हाथ बंटाना ‘जोरू का गुलाम’ बन जाना होता है और पत्नी को धमकाकर न रखना नामर्द होने की निशानी.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)