मार्केटिंग के पेशे से जुड़े नवीन चौधरी शौकिया लेखक हैं और गाजियाबाद में रहते हैं.


आमतौर पर हम जब किसी ऐसे दोस्त या रिश्तेदार के घर जाते हैं, जिनके घर छोटे बच्चे हों, तो अक्सर चॉकलेट ले जाते हैं. हम मानकर चलते हैं कि बच्चों को चॉकलेट पसंद होती है. असल में बच्चों को चॉकलेट नहीं मीठा पसंद होता है. जब मैं छोटा बच्चा था मैं भी इसका अपवाद नहीं था. तब मुझे मीठा इतना पसंद था कि अगर कोई मुझे मिर्च देकर कहता कि यह मीठा है तो मैं उसे भी खा सकता था.

मम्मी भी अक्सर मेरे लिए कुछ न कुछ मीठा बनाती ही रहती थीं - कभी खीर तो कभी चीनी वाला परांठा. लेकिन यह सब रोज तो नहीं बन सकता था. इसके अलावा ज्यादातर छोटे बच्चों की तरह मेरी भी दिक्कत यह थी कि मैं खाना तो सब चाहता था पर इसमें मेहनत और समय नहीं लगाना चाहता था. यानी चबाने में भी आलस आता था. मैं चाहता था कि खाने की कोई चीज ऐसी हो कि मुंह में डाली, खाया और खेलने भागे. इस लिहाज से मेरे जैसे मीठे के शौकीन बच्चों के लिए चॉकलेट और टॉफ़ी जैसी चीजें ही सही होती हैं.

मैंने बचपन में चॉकलेट के नाम पर कभी-कभार फाइव स्टार ही खाई थी वरना हमें ज्यादातर टॉफ़ी ही मिला करती थी जैसे एक्लेयर्स, पार्ले किसमी, पॉपिंस वगैरह. डेरी मिल्क जैसी बाकी बड़ी-बड़ी चॉकलेट के बारे में ज्यादा पता नहीं था. यह सब मुझे टीनएज में तब पता चला जब किसी ने वैलेंटाइन डे के बारे में बताया. खैर, तब तक मेरी चॉकलेट खाने की उम्र के साथ-साथ मीठा खाने की रूचि भी ख़त्म हो चुकी थी. बचपन की मेरी एक हरकत की वजह से ऐसा हुआ था.

मैंने चुपचाप डिब्बा उठाया और मुट्ठीभर चीनी निकाल कर खा ली. वह मेरे लिए यूरेका मोमेंट था. मुझे लगा अब टॉफ़ी की क्या जरूरत! जब मीठा खाना है, मुट्ठी भरकर चीनी खाओ

मेरी उम्र तकरीबन साढ़े चार साल थी जब पापा का ट्रान्सफर तिरुपति (आंध्र प्रदेश) हुआ था. वहां हमारे रिश्तेदार तो थे नहीं, जान-पहचान के नाम पर भी सिर्फ पापा के स्टाफ वाले लोग थे. इसलिए मेहमानों और रिश्तेदारों से मिलने वाला मेरा चॉकलेट का कोटा लगभग ख़त्म हो चुका था. पापा जरूर हमें कभी-कभी टॉफ़ी दिलाते थे लेकिन कम खाने की हिदायतों के साथ. दांत-हित में कही गई उनकी बातों को मानने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं था. इसलिए मेरा टॉफ़ी का इंतज़ार ख़त्म होकर भी हमेशा बना रहता था.

उसी समय की बात है. एक दिन मम्मी ने मेरे लिए चीनी का परांठा बनाया और बनाने के बाद चीनी का डब्बा नीचे ही छोड़ दिया. अब यह तो ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता कि तब मेरे दिमाग में क्या आया लेकिन मैंने चुपचाप डिब्बा उठाया और मुट्ठीभर चीनी निकाल कर खा ली. वह मेरे लिए यूरेका मोमेंट था. मुझे लगा अब टॉफ़ी की क्या जरूरत! जब मीठा खाना है, मुट्ठी भरकर चीनी खाओ. न तो परांठे की तरह तोड़कर खाने की मेहनत और न ही वक्त का खर्चा. इन सबसे भी बड़ी बात कि चीनी खाना दांतों के लिए हानिकारक है, ऐसा कभी किसी ने मुझे कहा नहीं था. अब जैसे ही चीनी का डब्बा नीचे दिखता, मैं एक मुट्ठी चीनी फांक लिया करता था. यह हरकत एक दिन मम्मी की नजर में आ गई तो चीनी का डब्बा ऊपर रखा जाने लगा. एक बार फिर मेरे मीठा खाने पर ब्रेक लग गया.

मेरी छोटी बहन उस समय तकरीबन डेढ़ साल की थी. हम मैथिल लोग बड़े भाई को भाई जी बोलते हैं. वह भी मेरे पीछे आईजी-आईजी (उस समय तक वह साफ़ नहीं बोल पाती थी) करती घूमती रहती थी. मुझे जिस तरह चीनी पसंद थी, उसे सिंकी हुई मूंगफली. उसे मूंगफली को दांत से कटकट करके खाने में बड़ा मजा आता. पता नहीं उसे खाने में मजा आता या कटकट की आवाज करने पर, क्योंकि हर आवाज पर वह मुझसे कहती ‘आईजी कट.’ जिस तरह मुझे चीनी खाने से रोका जाता, वैसे ही उसे मूंगफली खाने से रोका जाता था. थी तो छोटी ही और मूंगफली के 5-10 दाने ही खाती थी पर उस उम्र के बच्चे के लिए उतना भी बार-बार खाना शायद पेट-हित में सही नहीं था. लेकिन बच्चों को इन सबसे क्या मतलब! हमें भी नहीं था, हमें जो खाना था, वो खाना था.

मैं एक छोटी सी लकड़ी की चौकी पर चढ़ जाता और उसके बाद अपनी बहन को गोद में जितना हो सकता, ऊपर उठा लेता था. ऐसा करने पर उसके हाथ स्लैब पर रखे डब्बों तक पहुंच जाते थे

मम्मी अक्सर मूंगफली सेंक कर रखती थीं जो बाद में भुने हुए चूड़ा (चिवड़ा) में डालने के या चटनी बनाने में काम आती थीं. अक्सर काम आने वाली चीजें मम्मी रसोई के स्लैब पर रखती थीं. मूंगफली और चीनी का डब्बा भी स्लैब पर ही रखा होता था. हम हिन्दुस्तानी लोग जुगाड़ू बचपन से ही होते हैं सो मैं भी था. मैंने बहन के साथ गठजोड़ किया और जुगाड़ा कि कैसे हम एक-दूसरे की मदद कर अपनी पसंदीदा चीजें खा पाएंगे.

हमने जो जुगत भिड़ाई वह कुछ यूं थी कि मैं एक छोटी सी लकड़ी की चौकी पर चढ़ जाता और उसके बाद अपनी बहन को गोद में जितना हो सकता, ऊपर उठा लेता था. ऐसा करने पर उसके हाथ स्लैब पर रखे डब्बों तक पहुंच जाते और हम दोनों का काम बन जाता था. यह क्रम कई दिनों तक चला लेकिन एक दिन मम्मी को हमारी मिलीभगत के कारनामे का पता चल गया. इसके बाद से डब्बे स्लैब से हटकर ऊपर रैक में रखे जाने लगे. इस तरह मेरे दिन फिर से बिना मीठे के गुजरने लगे.

उस दिन शायद महीने की पहली तारीख रही होगी क्योंकि पापा महीने भर का राशन लेकर आए थे. सब सामान रसोई में रखा गया. मेरी बचपन से आदत है, मम्मी रसोई में हों तो मैं उनके इर्द-गिर्द मंडराता रहता हूं. जब मम्मी सब चीजों को पैकेट से निकालकर डब्बों में रख रही थीं तभी दरवाजे पर ठक-ठक हुई. कोई पड़ोसी आया था. मम्मी उससे मिलने गईं तो बातों में लग गईं और यहां मेरे हाथ चीनी का डब्बा लग गया. मैं उस पर टूट पड़ा. मैंने चीनी खानी शुरू की पर एक मुट्ठी से मन न भरा. एक के बाद दूसरी मुट्ठी, तीसरी मुट्ठी, चौथी, पांचवीं... और बस मुट्ठी भर-भर के चीनी मुंह में जानी शुरू हुई.

पापा आए तो देखा डब्बे में चीनी की मात्रा ठीक-ठाक कम हो चुकी थी. मुझसे कुछ नहीं बोले और मम्मी से कहा - छोड़ दो इसे डब्बे के साथ और खाने दो जितना खाए

मैं चीनी फांकने में लगा था और पता ही नहीं चला कि मम्मी कब आ गईं. जब हमारी नजरें मिली तो वे मुझे गुस्से से देख रही थीं. अचानक मम्मी वहां से चली गईं. मैं समझ गया कि पापा को बुलाने गई हैं. फिर भी इस बीच मैंने मौका देखकर एक मुट्ठी चीनी और फांक ली. पापा आए तो देखा डब्बे में चीनी की मात्रा ठीक-ठाक कम हो चुकी थी. मुझसे कुछ नहीं बोले और मम्मी से कहा - छोड़ दो इसे डब्बे के साथ और खाने दो जितना खाए. मैंने यह सुनते ही चीनी पर हमला बोल दिया. डब्बे में दो किलो चीनी आती थी और जब मैं रुका तब तक शायद आधे से ज्यादा डब्बा खाली कर दिया होगा.

अब पेटभर के चीनी खा तो ली लेकिन कुछ ही देर बाद पेट में दर्द (मरोड़) उठना शुरू हुआ. उसके बाद जो पेट ख़राब हुआ कि पूछो मत. उल्टी भी हुई. डॉक्टर को दिखाया गया. अगले दो-तीन दिन तबीयत शायद ऐसी ही रही. मम्मी पापा से नाराज थीं कि रोक लेते इसे तो इतनी बात न बिगड़ती. पापा बोले- एक बार मन की कर ली न, अब खुद ही नहीं खाएगा. पापा सही थे. उसके बाद से दूध में चीनी होती तो मैं दूध नहीं पीता था, चीनी वाला परांठा देखते ही उबकाई आती, चीनी देखते ही अजीब सा लगता. उसके बाद शायद 12-13 साल की उम्र तक मैंने चीनी का एक दाना नहीं छुआ. चॉकलेट टॉफ़ी से भी नफरत हो गई.

फिर बाद में कभी एक बार बुआ आईं और उन्होंने किसी तरह मुझे दूध में फिर से थोड़ी-थोड़ी चीनी देनी शुरू की. मैं अब मीठा खाता हूं पर जरूरत भर का. मीठे से मेरी बेरुखी देखकर कई बार लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या आपको डायबिटीज है? या क्या आप डाइटिंग पर हैं? मैं सबको यह किस्सा तो नहीं बता पाता बस उनके सवालों पर मुस्कुराकर रह जाता हूं.