‘न्यू ईयर’ शब्द अपने आप में अकेला लगता है. इसमें पूर्णता तभी आती है जब इसके पहले हैप्पी या बाद में रिजॉल्यूशन लगा दिया जाए. रिजॉल्यूशन यानी संकल्प के नाम पर छोटे-बड़े सब, नए साल पर कुछ ऐसे या इससे मिलते-जुलते सुरों में बातें करते नजर आते हैं - मैंने सोच लिया है, मैं इस साल सिगरेट पीना छोड़ दूंगा... अब बस तय रहा कि एक तारीख से रेगुलर एक्सरसाइज शुरू, ज्यादा वजन तो बीते साल की बात थी... इस साल पूरे बारहों महीने पढ़ाई करनी है और टॉप करना है...

नया साल जिंदगी के नए पन्ने की शुरूआत करने का सबसे अच्छा मौका लगता है लेकिन अक्सर ही नए साल की हैप्पीनेस खत्म होते-होते किया गया रिजॉल्यूशन भी हवा हो जाता है. अगर आपने भी कोई ऐसी कसम ली है और वह कुछ दिनों में टूट जाए तो ज्यादा दुखी होने की जरूरत नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर की कुल आबादी में से लगभग 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग नए साल पर कोई न कोई संकल्प लेते हैं और इनमें पूरे होने वाले संकल्पों की गिनती न के बराबर होती है. संकल्प करने वालों को एक बड़ा हिस्सा तो सालों-साल एक ही वादा दोहराता है और उसे कभी पूरा नहीं करता. बिलकुल हमारी सरकारों की तरह.

कनाडा की कार्लटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टिमोथी पायकल अपने ब्लॉग में लिखते हैं कि इस तरह के संकल्प टूटना हमारी टालमटोल वाली प्रवृत्ति का ही एक रूप है. कोई भी व्यक्ति खुद को नए सिरे से खोजने का रिस्क लेने से डरता है क्योंकि वह अपनी आदत के मुताबिक सुविधाजनक जीवन जीने का आदी हो चुका होता है. वह किसी भी तरह के बदलाव से बचना चाहता है. पायकल बताते हैं कि उनके साथी प्रोफेसर पीटर हरमन ने इस तरह के संकल्पों और कोशिशों को फाल्स होप सिंड्रोम नाम दिया है. उनके अनुसार लोगों के संकल्प इसलिए टूटते हैं क्योंकि वे अवास्तविक, सतही और उनके विचारों से मेल न खाने वाले होते हैं. वे जब शुरूआती दिनों में इसका पालन कर रहे होते हैं तो इस तरह के विचार सकारात्मक और दृढ़ होने का भ्रम पैदा करते हैं.

लोग क्या करना है, से ज्यादा, उन्हें क्या करना चाहिए को ध्यान में रखकर संकल्प तय करते हैं और उनके संकल्प पूरे न होने के रास्ते में यही सबसे बड़ी बाधा है

कुछ अन्य शोध भी बताते हैं कि ज्यादातर लोग क्या करना है, से ज्यादा, उन्हें क्या करना चाहिए को ध्यान में रखकर संकल्प तय करते हैं. क्या करना चाहिए सैद्धांतिक रूप से सही होते हुए भी उस व्यक्ति के हिसाब से भी सही हो यह जरूरी नहीं. ऐसे आदर्श संकल्प करने के बाद व्यक्ति को अपने व्यवहार में पूरी तरह से बदलाव लाने की जरूरत पड़ती है और इसके लिए नए सिरे से सोचना शुरू करना पड़ता है.

लेकिन सोच बदलने के काम को साधने के लिए दिमाग की व्यवस्था ही बदलनी होती है. वैज्ञानिकों के अनुसार मस्तिष्क के एमआरआई स्कैन से पता चलता है कि हमारा सोचने का तरीका दिमाग में एक तंत्रिका मार्ग (न्यूरल पाथवेज) बना देता है. यह किसी आदत के बनने के लिए जरूरी है. संकल्प कायम रहने के लिए जरूरी है कि नई तरह से सोचा जाए और नई तरह से सोचने के लिए मस्तिष्क में नए तंत्रिका मार्ग बनाने की जरूरत होती है जिसमें समय लगता है. यह ठीक वैसा ही है जैसे शहर में एक बार सड़कें बनने के बाद नए रास्ते बनाने में समय लगता है.

नए साल पर लिए जाने वाले संकल्प, अक्सर संकल्प न होकर लक्ष्य होते हैं. इन लक्ष्यों को पाने के लिए एक निर्धारित समय होता है. कई बार इतना ही समय तंत्रिका मार्गों के बनने में भी लग जाता है. यानी 31 दिसंबर की रात अचानक लिए फैसलों के लिए दिमाग पूरी तरह तैयार नहीं होता और इसलिए ज्यादातर लक्ष्यों के शुरू होने के साथ ही खत्म होने का काउंटडाउन भी शुरू हो जाता है.