सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान धर्म के नाम पर वोट मांगने पर प्रतिबंध लगा दिया है. सोमवार को सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने 4-3 के बहुमत से फैसला सुनाया है कि चुनावों के दौरान धर्म के नाम पर वोट मांगना गैर-कानूनी है और अगर कोई ऐसा करता है तो उसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत भ्रष्ट आचरण माना जाएगा. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-123 (3) में दर्ज है कि प्रत्याशी और उनके एजेंट द्वारा ‘उसके धर्म’ का इस्तेमाल कर वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जाएगा. 'उसके धर्म' शब्दावली को स्पष्ट करते हुए चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर व अन्य तीन जजों ने कहा कि इसका आशय मतदाता, प्रत्याशी और उसके एजेंट इत्यादि के धर्म और जाति से है. सुप्रीम कार्ट का यह फैसला चुनावों के दौरान हिंदुत्व शब्द के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने से जुड़ी याचिकाओं पर आया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में चुनाव को धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया बताया है. शीर्ष अदालत ने आगे यह भी कहा है कि धर्म के साथ-साथ जाति, नस्ल, समुदाय और भाषा के आधार पर वोट मांगना संविधान की भावना के खिलाफ है. धर्म को निजी पसंद का मामला बताते हुए अदालत ने सरकारों द्वारा किसी विशेष धर्म के पक्ष लेने को भी गलत बताया.

सुप्रीम कोर्ट में पिछले छह दिनों से इन मामलों की लगातार सुनवाई चल रही थी. इस दौरान राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात सरकारों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि धर्म को चुनाव से अलग नहीं किया जा सकता, लेकिन प्रत्याशी द्वारा धर्म के नाम पर वोट मांगना भ्रष्टाचार माना जाए. इस पर चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने सवाल उठाया कि राज्य सरकारें धर्म को राजनीति को जोड़ने का समर्थन क्यों कर रही हैं, जबकि इसके विरोध में संसद की स्पष्ट राय है. इस साल पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं. इनमें उत्तर प्रदेश और पंजाब चुनाव के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को काफी अहम माना जा रहा है.

हालांकि, इससे पहले चीफ जस्टिस ने उस फैसले की समीक्षा करने से इंकार कर दिया था, जिसमें हिंदुत्व को जीवनशैली बताया गया था. 1995 में तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि चुनाव के दौरान हिंदुत्व या हिंदूवाद का इस्तेमाल भ्रष्ट आचरण नहीं है, क्योंकि इसे भारत में जीवनशैली के रूप में देखा जाता है.