एक निजी कंपनी में कार्यरत सुनील कुमार स्वतंत्र समाजसेवी भी हैं और दिल्ली में रहते हैं.


समय - 1993-94 का साल, शहर - दिल्ली. तब शायद मैं छठवीं कक्षा में और छोटा भाई चौथी कक्षा में रहे होंगे. हम यहीं, देश की राजधानी के एक सरकारी स्कूल में पढ़ते थे. इसी दौरान एक बार हमें अपनी पढ़ाई के लिए गाइड खरीदनी थी. चूंकि उसमें सारे सवालों के हल होते थे, यानी गाइड हमारी उस नन्ही सी उम्र की भारी माथापच्ची को कम सकती थी. ऊपर से हमारे कई दोस्तों के पास भी गाइडें थीं सो हमारे पास भी हो, यह भी एक बालसुलभ इच्छा थी.

यह सब होते हुए भी हमें इस बात का एहसास था कि यह मांग हमारी अनिवार्य जरूरत नहीं है. इसे मम्मी-पापा के सामने रखे जाने पर हमें किताबों से पढ़ाई करने की सलाह दी जा सकती है. फिर इसके लिए घर से पैसे ले पाना भी इतना आसान नहीं होगा. दरअसल उन दिनों घर की माली हालत कमजोर थी. कई बार बहुत जरूरी कामों के लिए भी वक्त पर पैसे मिल पाना मुश्किल हो जाता था. लेकिन इसी बीच किस्मत ने हमारा साथ दिया और जल्दी ही हमारे लिए ऐसे पैसों का इंतजाम हो गया जो अतिरिक्त आय में गिने जा सकते थे.

हुआ यूं कि घर पर कुछ रिश्तेदार आए हुए थे. क्या वजह थी या क्या आयोजन था, अब याद नहीं है. उस मौके पर कई बड़े-बुजुर्ग रिश्तेदार आए थे जिसमें मेरी दादी के भाई भी शामिल थे. शाम को जब वे जाने लगे उन्होंने घर की सभी बहुओं को शगुन दिया. ताइयों और चाची के साथ मम्मी को भी 50 रुपये का एक नोट मिला. बस इस नोट पर हमने अपनी नजर गड़ा दी. गाइड हम दोनों भाइयों को ही चाहिए थी लेकिन मैं बड़ा था इसलिए मेरी जिद छोटे भाई के सामने छोटी पड़ गई. हम दोनों के बीच ही यह तय हो गया कि 50 रुपये खर्च करके छोटे भाई के लिए गाइड खरीदी जाएगी.

अभी आधा रास्ता भी तय नहीं किया था कि हमें पता चला एक लड़का हमारे पीछे-पीछे ही चल रहा है. वह शायद काफी देर से हमारी बातें सुनते आ रहा था

अगले दिन जैसे ही सुबह हुई हम दोनों गाइड के लिए पैसों की जिद करने लगे. हमने खूब चिरौरी की और चूंकि वो अतिरिक्त रुपये थे इसलिए मम्मी ज्यादा देर तक विरोध न कर सकीं. आखिरकार पचास रुपये का वो नोट हमें मिल गया. और फिर पैसे मिलने की खुशी में मगन होकर हम दोनों गाइड खरीदने चल दिए. अभी आधा रास्ता भी तय नहीं किया था कि हमें पता चला एक लड़का हमारे पीछे-पीछे ही चल रहा है. वो उम्र में मुझसे बड़ा था. वह हमारे इतने नजदीक था और हम भी जोर-जोर से बातें कर ही रहे थे तो शायद उसे पता चल गया था कि हम गाइड खरीदने जा रहे हैं. और यह भी कि हमारे पास पचास रुपये का नोट है.

मुझे अच्छे से याद है कि फिर कैसे उसने साथ चलते-चलते हम से सब पूछ लिया कि कौन से स्कूल में हो, कहां रहते हो और अभी कहां जा रहे हो. उसने बातों में उलझाकर हमसे यह भी उगलवा लिया कि हम गाइड खरीदने जा रहे हैं. इसके बाद उसने अपना दांव मारा जिसकी गिरफ्त में हम आ गए. उसने कहा कि उसके पास पुरानी गाइड रखी है जिसे वह हमें आधे दाम पर दे-देगा. हमें थोड़ा लालच आ गया. लड़के ने कहा कि हमें उसके घर तक चलना होगा जहां वो हमें गाइड दे देगा और 25 रुपये भी लौटा देगा. तो हम अब दुकान की तरफ न जाकर उसके साथ हो लिए. वह हमें कॉलोनी की गलियों में जहां-तहां घुमाते हुए कहीं ले जा रहा था. इस बीच हमें फुसलाकर उसने वो पचास रुपए का नोट भी अपने पास ही रख लिया.

उन दिनों हमारी कॉलोनी में कई प्लॉट खाली पड़े थे. वह हमें ऐसे ही एक खाली प्लॉट की तरफ ले गया जिसके दो तरफ तो घरों की दीवारें थी और प्लॉट पर हमारी तरफ लोहे की एक ग्रिल लगी थी. वो लड़का मुझसे बोला कि अभी वो दूसरी तरफ से गाइड लेकर आ रहा है और तब तक हम ग्रिल के इस तरफ उसका इंतजार करें. फिर वह इस ऊंची सी ग्रिल को फांदकर चला गया. चूंकि हम ग्रिल पर चढ़कर उस पार नहीं जा सकते थे तो हमने उसकी बात मान ली और वहीं इंतजार करने लगे. लेकिन आधे घंटे बाद भी उसका कोई अता-पता नहीं. और वक्त बीता तो मैं घबराने लगा और मुझे रोना आ गया. फिर मैंने वहीं खड़े होकर जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया. उधर छोटा भाई यह देखकर वहां से रोते-रोते घर चला गया.

फिर वह लड़का ऊंची सी ग्रिल को फांदकर चला गया. चूंकि हम ग्रिल पर चढ़कर उस पार नहीं जा सकते थे तो हमने उसकी बात मान ली और वहीं इंतजार करने लगे

मेरे लगातार रोने की आवाज सुनकर वहीं पड़ोस के किसी मकान से एक आंटी पूरा माजरा समझने आईं. मैंने रोते-रोते उन्हें सब बताया. उन्हें लगा कि कोई मेरे पचास पैसे का सिक्का लेकर भाग गया है सो उन्होंने अठन्नी मेरे हाथ पर रख दी और घर जाने के लिए कह दिया. यह देखकर मैं और जोर से रोने लगा. अब मैंने उन्हें समझाया कि वो लड़का मेरे पचास रुपये लेकर भागा है. इस पर आंटी पहले तो बहुत हैरान हुईं, बाद में मुझे दिलासा देते हुए समझाने लगीं कि अब कुछ नहीं हो सकता और अब मुझे घर जाना चाहिए.

मेरे घर पहुंचने से पहले ही छोटे भाई ने सारा मामला खोलकर रख दिया था. उसे अपने हिस्से की डांट पड़ चुकी थी. अब मेरी बारी थी. बड़ा भाई होने के नाते मुझे और ज्यादा डांट पड़ी. उस समय घरवालों की नजर में यह जितना बड़ा नुकसान था, उतनी ही बड़ी बेवकूफी भी. यह मैं ही समझ सकता हूं कि तब मेरे लिए भी पचास रुपए की कीमत क्या थी. उस दिन पचास का एक नोट गंवाकर मैंने हर पल चौकन्ना रहने का सबक सीखा. आज सोचता हूं तो मिले सबक के बदले यह सौदा सस्ता लगता है.

हां, अब जब खुद कमाने लगा हूं तो जाने कितनी बार मम्मी के हाथ छोटे-बड़े सब नोट दे चुका हूं. फिर भी कभी उनकी मुट्ठी में पचास का नोट दबा दिख जाता है तो वो दिन याद आ जाता है. और यह भी कि पचास रुपए के नोट ने ही दुनिया की मक्कारी से मेरा पहला परिचय करवाया था.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)