लिखने-पढ़ने के शौकीन आशुतोष सोशल मीडिया पर खासे सक्रिय हैं और दिल्ली में रहते हैं.


मिलेनियम वाले साल की बात है. मैं छठीं- सातवीं क्लास में पढ़ता था. परीक्षाएं आने वाली थीं. पढ़ाई-लिखाई का मौसम पूरे जोर पर था. स्कूल घर से लगभग पांच किलोमीटर दूर था. उसी साल मैंने पापा से जिद करके साइकिल ले ली थी. छोटी सी लाल साइकिल जिसे सीखने में बड़ी परेशानी हुई. कई बार गिरा. एक दिन कच्ची सड़क पर सिखाते हुए पापा ने पीछे से साइकिल छोड़ दी तो चलाते हुए बहुत दूर तक निकल गया. साइकिल पर चढ़ना तो आ गया था पर उतरना सीखना अभी बाकी था. जब रुकने की सोची तो ध्यान आया कि आगे कोई नहीं है. अपने बल पर ही उतरना पड़ेगा. उस वक्त बिना मदद उतरने का एक ही तरीका आता था - साइकिल लेकर गिर पड़ना, सो गिर पड़ा. इस तरह गिरने में एक पैर में बड़ी चोट लगी. इतनी तेज कि वहीं बैठे-बैठे रोता रहा जब तक पापा उठाने नहीं आ गए. उठाकर घर के बजाय अस्पताल ले गए. प्लास्टर चढ़वा दिया गया. एक महीने के लिए साइकिल सीखने से छुट्टी हो गई.

धीरे-धीरे यह दौर बीत गया. अब मुझे साइकिल चलाने में पूरी महारत हासिल हो चुकी थी. खूब स्पीड में चलाना हो या एकदम धीरे, हैंडल छोड़कर चलाना हो या करियर पर बैठकर, मुझसे आगे कोई निकल नहीं सकता था. बचपन अपनी मस्ती से कट रहा था. बस एक ही चीज बुरी थी कि कभी-कभी साइकिल पंचर हो जाती थी. स्कूल से घर आते हुए रास्ते में एक पंचर की दुकान पड़ती थी. इलाके में इकलौती दुकान होने के कारण साइकिल के पंचर मुझे वहीं बनवाने पड़ते थे. पंचर बनाने वाले का नाम था शकील. करीब साढ़े पांच फुट का कद, पूरा काला सा गोल चेहरा, पान मसाले से कत्थई हो गए दांत, सिर पर एक भी बाल नहीं था. कुल मिलाकर देखने में शकील बिल्कुल हिंदी फिल्मों का विलेन लगता था. बहुत ही डरावना.

हम सब बच्चे उससे डरते भी थे. तिस पर वहां से गुजरने के दौरान उसके पड़ोसी हमको और डरा देते थे. वे कहते कि इसके पास कभी मत रुकना, यह बच्चों को अपनी कोठरी में बंद कर देता है और इतवार को शहर के बच्चा बाजार में जाकर बेच आता है. उनकी बातों से डरकर मैं जहां तक हो उसकी दुकान पर जाने से बचने लगा और जाना भी पड़े तो अकेले तो बिल्कुल नहीं जाता था. हमेशा पापा, भैया या दोस्त साथ होते.

लेकिन ऐसा भी एक दिन आना मेरी जिंदगी में लिखा ही था जब मुझे उस डरावने आदमी की शरण में अकेले जाना पड़ा. ऐसा इसलिए हुआ कि उस दिन मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था. हुआ यह था कि शाम चार बजे स्कूल की छुट्टी हुई. मैं वहां से उठकर ट्यूशन वाले सर के पास गया. जाते हुए तो सब कुछ ठीक था लेकिन जब पांच बजे ट्यूशन क्लास से निकलकर नीम के पेड़ के सहारे खड़ी साइकिल उठाई तो गड़बड़ दिखी. पिछले टायर की हवा निकल गई थी. पहिये को घुमाकर चेक किया. उसमें जंगली बबूल का बड़ा सा कांटा लगा मिला. तब तक सारे दोस्त घर जाने की जल्दी में मुझे अनदेखा कर वहां से फुर्र हो चुके थे.

अब एक तरफ कुआं था दूसरी तरफ खाई यानी या तो पैदल जाऊं या शकील की दुकान पर. मैंने मन ही मन खुद को ढाढ़स बंधाया और शकील के पास चला गया. बिना पंचर बनवाए पांच किलोमीटर साइकिल लेकर जाने का मतलब टायर ट्यूब खत्म हो जाना था. पिता जी से मार खाने से अच्छा मैंने शकील का सामना करना समझा.

वह पंचर बनाने के चार रुपए लेता था जो उस वक्त मेरे पास नहीं थे. मैं उससे डरता था इसलिए पहले ही अपनी समस्या सामने रख दी. कहा, ‘आज मेरे पास पैसे नहीं हैं कल घर से लेता आऊंगा.’ शकील ने चेहरे पर कोई भाव लाए बिना टायर खोला. 15 मिनट में पंचर बनाकर साइकिल मेरे हवाले कर दी. कहा, ‘आराम से चलाना और साइकिल धूप में खड़ी मत करना. पंचर खुल जाएगा. तुम्हारा ट्यूब खराब हो गया है. इसमें बहुत पंचर हैं. इसको बदलवा लो.’

मैंने मन ही मन सोचा कि आदमी तो खूंखार है लेकिन, आज काम आ गया. कल पैसे लाकर इसको दे दूंगा. लेकिन फिर गड़बड़ हो गई. अगले एक हफ्ते तक मेरे पास चार रुपए नहीं आए. मैं बहुत परेशान होकर सोचता रहा कि क्या करूं. सो मैंने वह रास्ता बदल दिया. वह एक शॉर्टकट लेकिन कच्चा रास्ता था जिससे बच्चों को अकेले जाने की मनाही थी. उसी रास्ते से मैं एक हफ्ते तक स्कूल गया और लौटा. उस डरावने आदमी से बचने के लिए यह डरावना रास्ता पकड़ने के सिवा कोई चारा नहीं था.

जब हफ्ता बीत गया. इतवार को मैं कुछ और बच्चों के साथ घर के बाहर डंडे मार-मारकर टायर नचा रहा था कि अचानक देखा वो मोटा सा आदमी, शकील एक साइकिल पर हमारे घर की तरफ चला आ रहा था. बाकी बच्चे हंसकर बता रहे थे कि ‘ये साइकिल इस आदमी के लायक नहीं है. इसको तो ट्रक पर आना चाहिए था. साइकिल का टायर पिचका जा रहा है.’ लेकिन मेरे तो होश उड़ चुके थे. मैं सोच रहा था, ‘ये आदमी चार रुपए लेने के लिए मेरे घर तक आ गया. पता नहीं किसने इसे मेरे घर का पता बताया है. जरूर मेरा कोई दुश्मन होगा.’

मैं ज्यादा कुछ सोचता समझता या वहां से भागने की तरकीब निकालता उसके पहले ही वह मेरे सामने आ गया. उसने ब्रेक लगाकर बायां पैर जमीन पर टिकाया और पूछा ‘पापा कहां हैं तुम्हारे?’ अब तो डर से मेरी हालत पतली हो चुकी थी. मैं पापा को बुलाने भीतर गया और वहीं पापा को पूरी कहानी बता दी कि ये मोटू अपने पैसे लेने आया है. पापा ने पहले तो खूब डांटा फिर पूछा कि अब तक बताया क्यों नहीं? मैंने कहा, ‘आप हमेशा पैसे मांगने पर डांटते हैं कि चटोरी आदत हो जाएगी. घर से टिफिन ले जाया करो. पैसे का क्या करोगे? इसीलिए नहीं मांगता.’ अपना ही लेक्चर रिपीट होते देख पापा ने बात बदली और कहा चलो देखते हैं.

बाहर निकलकर पापा ने जरा कड़क होकर पूछा, ‘हां भई, क्या बात है?’ शकील ने अपनी तरफ से दुआ-सलाम की और कहा ‘आपका बच्चा बराबर मेरे घर के सामने से आता-जाता है. रोज देखता हूं लेकिन पिछले एक हफ्ते से नहीं दिखा. अब तो इन लोगों के इम्तिहान भी होने वाले हैं. मेरा बेटा इसी के स्कूल में पढ़ता है. बता रहा था कि एक ही हफ्ता बचा है. मैंने सोचा कि इस बच्चे के साथ कुछ बुरा तो नहीं हो गया. तबीयत खराब हो गई क्या? इधर से गुजर रहा था सो यही हाल-चाल लेने के लिए रुक गया.’

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. मैं सोच रहा था, ‘यह वही डरावना आदमी है जिसके बारे में सब लोग कहानियां सुनाते हैं. यह तो अंदर से कितना अच्छा आदमी है. इसे मेरी कितनी फिक्र है. और वैसे भी चार रुपए के लिए कोई साइकिल चलाकर इतनी दूर क्यों आएगा भला?’

पापा ने शकील से कहा, ‘हां इसकी तबीयत खराब थी. अभी तो ठीक हो गया है. खेल-कूद रहा है. आपके कुछ पैसे बाकी हैं ये बता रहा था?’ शकील ने कहा, ‘नहीं. मैं पैसे लेने नहीं आया. आप बच्चे का खयाल रखिए, इसे खिलाइये-पिलाइये. जब ये खुद ठीक होकर आएगा तब इसी के हाथ पैसे भिजवा दीजिएगा.’

पापा और शकील कुछ देर बातें करते रहे. थोड़ी देर बाद शकील ने चाय पी और अपने घर चला गया. मैं अंदर बैठा सोच रहा था कि किसी की शक्ल देखकर या दूसरों की बात पर अंधा भरोसा करके डरना नहीं चाहिए. उस दिन से मैंने लोगों की सूरत से उनकी सीरत का अंदाजा लगाना छोड़ दिया.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)