खादी और ग्रामोद्योग आयोग की डायरी और उसके कैलेंडरों पर महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगा दिए जाने पर कांग्रेस के नेता जो विलाप कर रहे हैं, वह हास्यास्पद लगता है. अगर वे गांधी के रास्ते पर चले होते तो शायद यह नौबत ही नहीं आती कि भारतीय जीवन की समरसता और विविधता को समझने में पूरी तरह असमर्थ एक पार्टी सत्ता में होती.

लेकिन क्या गांधी के रास्ते पर चलना आसान है? दरअसल गांधी के गुनहगार दोनों हैं- उनको मानने वाले भी और उनको मारने वाले भी. बल्कि कई बार लगता है कि जो उनको मानने का दावा करते हैं, उनका गुनाह कहीं ज़्यादा बड़ा है- उन्होंने गांधी को तिल-तिल कर मारा है. डायरी, कैलेंडर या रुपये से गांधी जी बाद में हटाए जा रहे हैं, उनको नीयत से और नीति से हटाने का काम बरसों से चल रहा है- फर्क बस इतना है कि कांग्रेस ने दस्ताने पहन कर यह काम किया है तो बीजेपी ने दस्ताने उतारकर. चरखा चलाते प्रधानमंत्री के बाद हरियाणा के मंत्री अनिल विज की उद्धत-आक्रामक प्रक्रिया भी इसी गांधी-वध का विस्तार है.

गांधी की मुश्किल यही है. आप उन्हें टुकड़ा-टुकड़ा नहीं अपना सकते. आप यह नहीं कर सकते कि थोड़ा सा स्वदेशी ले लेते हैं और थोड़ा सा विदेशी. गांधी को अपनाना है तो संपूर्णता में अपनाना पड़ता है

लेकिन गांधी को बार-बार मारने की जरूरत क्यों पड़ती है? और गांधी फिर भी मरते क्यों नहीं हैं? खादी ग्रामोद्योग आयोग आज की तारीख में लगभग अप्रासंगिक सी दिखने वाली संस्था है. उसके डायरी-कैलेंडरों का भी महत्व नहीं है. फिर ऐसा क्यों है कि उस कैलेंडर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर आने के बाद एक राष्ट्रव्यापी विवाद खड़ा हो जाता है और आयोग के अध्यक्ष को सफाई देनी पड़ती है कि गांधी को हटाया नहीं जा सकता?

इस सवाल का जवाब बहुत उलझा हुआ है. एक तरह से देखें तो खादी और चरखा दोनों आज जैसे बीते जमाने की चीज़ बन चुके हैं. उनका वह प्रतीकात्मक मोल भी नहीं बचा है जो कभी हुआ करता था. खादी किसी को अनुप्राणित नहीं करती, चरखा किसी को जीवन जीने लायक साधन भर नहीं देता, अर्थव्यवस्था को मायने देने की बात तो काफी अलग है. लेकिन खादी और चरखा दोनों उस देशज स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की ललक की निशानी है जो सत्ता-प्रतिष्ठानों में लगातार घटते जा रहे हैं. बहुत उद्धत किस्म की राष्ट्रवादी पहचान और बहुत आक्रामक किस्म के विकास के नारे के साथ चल रहा यह पूरा सरकारी तंत्र इस मायने में खुद को असहाय पा रहा है कि जो सपना वह देख और दिखा रहा है, वह न विदेशी मदद और तकनीक के बिना पूरा होता है, न निजी पूंजी के व्यापक दखल के बिना संभव होता है. उसे बस यह उम्मीद है किसी तरह वह आर्थिक चमक-दमक कुछ बड़ी हो जाए जो फिलहाल कुछ शहरों के कुछ बाज़ारों और घरों तक सीमित है तो शायद इससे वह सामाजिक-सांस्कृतिक अभाव ढक जाएगा तो भारतीय समाज में लगातार बड़ा हो रहा है. इस सामाजिक-सांस्कृतिक अभाव का एक नतीजा हम संस्कृति के नाम पर बहुत विरूप किस्म के प्रदर्शनों में देख रहे हैं और समाज के नाम पर तरह-तरह के जातीय अहंकार और सनक से भरे सम्मेलनों में. इन सबके बीच वर्चस्ववाद की वह राजनीति बहुत मुखर होती जा रही है जो अपने समाज के दलितों-पिछ़ड़ों और अल्पसंख्यकों के प्रति कहीं से उदार नहीं है.

इसी विफलता का अंदेशा है जिसको राजनीतिक तौर पर ढकने के लिए सरकारें और राजनीतिक संस्थाएं गांधी और चरखे और खादी का सहारा लेती हैं और यह जताने-बताने की कोशिश करती हैं कि रास्ता अब भी उनका वही है. लेकिन गांधी का रास्ता क्या है? क्या गांधी का कोई रास्ता भी है? गांधी आर्थिक विकास का कोई सूत्र नहीं देते, वह सांस्कृतिक विकास की कोई सड़क नहीं बताते. वे ताबीज देते हैं, दृष्टि देते हैं और उन पगडंडियों की बात करते हैं जो गरीबों के घरों तक जाती हैं. उनके लिए सूत कातना, संगीत सुनना और कविता लिखना और यह सब करते हुए सेवा और राजनीति दोनों करते रहना सांस लेने की तरह सहज है. वे कभी राजनीति करते नहीं दिखाई पड़ते, लेकिन उनका हर कदम किन्हीं राजनीतिक लक्ष्यों की तरफ़ बढ़ता हुआ दिखाई पड़ता है.

सरकारों को यह तो मालूम है कि गांधी इस देश के सबसे बड़े प्रतीक हैं जिनसे पीछा छुड़ाना मुश्किल है, लेकिन वे यह नहीं समझ पातीं कि यह प्रतीकात्मकता गांधी ने कैसे हासिल की थी

गांधी की मुश्किल यही है. आप उन्हें टुकड़ा-टुकड़ा नहीं अपना सकते. आप यह नहीं कर सकते कि थोड़ा सा स्वदेशी ले लेते हैं और थोड़ा सा विदेशी, उनकी अर्थनीति ले लेते हैं लेकिन उनकी समाज नीति छोड़ देते हैं. गांधी को अपनाना है तो संपूर्णता में अपनाना पड़ता है. उनको टुकड़े-टुकड़े करके, उनकी पैकेजिंग की कोशिश बेमानी हो जाती है, क्योंकि आप पाते हैं कि वे पैकेट से निकल चुके हैं, डिबिया से उनकी खुशबू जा चुकी है.

लेकिन यह बात वे सरकारें नहीं समझतीं जो जुमलेबाज़ी, विज्ञापन और प्रचार से घिरी रहती हैं, जो किसी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बड़े से चरखे की अनुकृति लगाकर यह मान लेती हैं कि वे चरखे का प्रचार कर रही हैं. उन्हें यह तो मालूम है कि गांधी इस देश के सबसे बड़े प्रतीक हैं जिनसे पीछा छुड़ाना मुश्किल है, लेकिन वे यह नहीं समझ पातीं कि यह प्रतीकात्मकता गांधी ने किसी जादू से नहीं, बल्कि एक बहुत जटिल जीवन और समाज को साधने की कोशिश से हासिल की थी. वे ऐसा मनुष्य और समाज चाहते थे जो अपने उपभोग में संयमित रहे, अपने आचरण में उदार, जो सबका सम्मान कर सके और जो सबके साझा विकास की बात सोच सके.

एक तरह से ये बहुत छोटी अपेक्षाएं हैं, लेकिन वे अपने चारों तरफ की बहुत सारी विसंगतियों से घिरी होने की वजह से अचानक अप्राप्य हो उठती हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि हिंदुत्व और भारतीयता के नाम पर एक बहुत असहिष्णु विचारधारा को बढ़ावा देने वाली पार्टी गांधी के इन लक्ष्यों को और मुश्किल बना डालती है. बाज़ार में उसकी पूरी शब्दावली ‘यूथ आइकन’ और ‘ब्रांड अंबैसडर’ जैसी सोच से संचालित होती है.

लेकिन फिर इस गांधी को वह छोड़ क्यों नहीं देती? गांधी को अपनाने के पाखंड के बिना क्या उसका काम नहीं चल सकता? शायद नहीं, क्योंकि उसके पास उन सवालों और संकटों के हल नहीं हैं जो इस देश की जनता के सामने हैं. उसे गांधी नहीं गांधी का पुतला चाहिए, चरखे और खादी के प्रति एक दिखाऊ प्रतिबद्धता चाहिए जिसे प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाकर बाज़ार में उतारा जा सके. यह सब भी गांधी को व्यर्थ और बेमानी बनाने की कोशिश है जो अंततः ख़ुद ही व्यर्थ और बेमानी हो जाने को अभिशप्त है.