कई हफ्तों से मेरे आठ साल के बेटे ब्रैम को सांस लेने में हो रही दिक्कत बढ़ती जा रही थी. इसके साथ ही उसके लिए इनहेलर की अहमियत भी. हमारे दिल्ली में आने के नौ महीनों बाद एक रात अचानक ब्रैम के इनहेलर ने भी जवाब दे दिया. उसकी सांसें उखड़ने लगीं. बदहवासी में मेरी पत्नी ने एक दोस्त को फोन किया जिसने उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल पहुंचने को कहा. मैं ब्रैम को उठाकर कार तक लाया. अस्पताल तक पहुंचना हमारी जिंदगी की सबसे डरावनी यात्राओं में से एक था. हमें जब ब्रैम को लेकर निकलना पड़ा था तो वह रात का वक्त था. इस दौरान दिल्ली की सड़कें ट्रकों से भरी हुई होती हैं जिनके लिए यातायात के संकेत बस देखने की चीज होते हैं. मैं ड्राइव कर रहा था. मेरी पत्नी पीछे की सीट पर ब्रैम का सिर सहला रही थीं.

तीन साल पहले जब मुझे द न्यूयॉर्क टाइम्स के दक्षिण एशिया संवाददाता के रूप में नियुक्ति मिली थी तो मैं और मेरी पत्नी दोनों ही दिल्ली आने के ख्याल से रोमांचित थे.

खैर, किसी तरह अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों ने फौरन ब्रैम को स्टेरॉयड्स दिए. इसके बाद उन्होंने उन्होंने तब तक आगे इलाज करने से इनकार कर दिया जब तक कि मेरे क्रेडिट कार्ड से 1000 डॉलर का भुगतान नहीं हो गया. इसके बाद एक हफ्ते तक ब्रैम को अस्पताल में रहना पड़ा.

तीन साल पहले जब मुझे द न्यूयॉर्क टाइम्स के दक्षिण एशिया संवाददाता के रूप में नियुक्ति मिली थी तो मैं और मेरी पत्नी दोनों ही दिल्ली आने के ख्याल से रोमांचित थे. तब हमें यह तो पता था कि यहां जिद्दी भिखारी, डेंगू और गर्मी जैसी तमाम समस्याएं हैं, लेकिन इसका हमें जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह शहर हमारे बच्चों के लिए कितना खतरनाक साबित होगा.

धीरे-धीरे हमें अहसास हुआ कि दिल्ली का असली संकट हवा, पानी और मक्खियां हैं. ये हर साल लाखों लोगों के लिए बीमारी, अपंगता और मौत की वजह बनते हैं. हमें पता चला कि दिल्ली खामोशी के साथ बच्चों की सांस संबंधी बीमारियों से जुड़े एक भयानक संकट से गुजर रहा है. एक हालिया अध्ययन बताता है कि इस इलाके के अलग-अलग स्कूलों में पढ़ने वााले करीब 44 लाख स्कूली बच्चों में से आधों के फेफड़ों को इतना नुकसान हो चुका है जिससे वे कभी उबर नहीं सकते.

ज्यादातर भारतीयों के लिए इस खतरे का सामना करना मजबूरी है. वे कहां जाएंगे? लेकिन हजारों लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने खुद भारत में रहने का विकल्प चुना है. इनमें वे भी हैं जो दुनिया को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, वे भी जो इसे समझना चाहते हैं और वे भी जो इस बाजाररूपी खजाने का कुछ हिस्सा कब्जाना चाहते हैं. इनमें डेट्रायट की कार कंपनियों के एक्जीक्यूटिव हैं, मैरीलैंड के कैंसर विशेषज्ञ और राजनयिक भी. बीते कुछ समय के दौरान ढाबों पर चाय समोसे का आनंद लेते हुए या फिर राजदूतावासों की शानदार पार्टियों में व्हिस्की और चिकन टिक्का खाते हुए हमने कई बार इस सवाल पर बहस की है कि क्या हम अपने बच्चों की कीमत पर अपना करियर बना रहे हैं?

ज्यादातर भारतीयों के लिए इस खतरे का सामना करना मजबूरी है. वे कहां जाएंगे? लेकिन हजारों लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने खुद भारत में रहने का विकल्प चुना है.

विदेशी दिल्ली में सदियों से रह रहे हैं. लेकिन यहां की हवा और उस पर लगातार सामने आ रहे तथ्य इतने डरावने होते जा रहे हैं कि अब उनमें से कुछ को लगता है कि विकल्प होने के बाद भी अपने बच्चों को यहां रखना अनैतिक है. ऐसी ही चर्चाएं बीजिंग और एशिया के दूसरे शहरों में भी होती हैं. लेकिन दिल्ली में संकट कहीं खतरनाक है जो दुनिया के सबसे गंदे और बीमारियों के लिहाज से सबसे ज्यादा खतरे वाले शहरों में से एक है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि इस शहर की हवा बीजिंग से दोगुनी खराब है. बल्कि देखा जाए तो दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित 25 शहरों में से 13 भारत में हैं. ऐसे 50 शहरों में चीन का सिर्फ एक शहर है. बीजिंग का स्थान 79वां है.

हमारे दोस्तों में से दिल्ली छोड़ने का फैसला कर चुके लोगों की तादाद इतनी ज्यादा है कि अमेरिकी दूतावास के स्कूल में अगले सत्र में छात्रों की संख्या में बहुत गिरावट आएगी. हमारे पादरी का भी कहना है कि चर्च में सामूहिक प्रार्थना के लिए आने वाले लोगों की संख्या अब 60 फीसदी कम होने वाली है.

दो साल पहले ब्रैम के पहली बार अस्पताल में भर्ती होने के बाद हमने दिल्ली करीब-करीब छोड़ ही दिया था. उसकी सांसें सामान्य होने के बाद जांच में पता चला कि उसके फेफड़ों की आधी ताकत जवाब दे चुकी है. डॉक्टर की सलाह पर हमने उसे नियमित रूप से स्टेरॉयड थेरेपी देनी शुरू की और फैसला किया कि जब तक उसकी तबीयत रहती है तब तक हम दिल्ली में रुके रहेंगे. हालांकि यह मेरा फैसला ज्यादा था. मेरी पत्नी को लग रहा था कि हमें फौरन घर लौटना चाहिए. कई महीनों बाद बच्चे जब गर्मियों की छुट्टियों में अमेरिका गए तो दिल्ली वापस आते हुए फ्लाइट में वे घंटों सुबकती रहीं.

यह जानने हुए अपने बच्चों को किसी ऐसी जगह पर रखना बहुत मुश्किल होगा कि इससे उनके स्वास्थ्य पर जिंदगी भर के लिए बुरा असर पड़ेगा.’

लेकिन दो साल गुजारने के बाद ऐसा लगने लगा कि ब्रैम अब ठीक है. हालांकि उसकी पहले की दिक्कतों को देखते हुए मैंने इस बारे में कुछ बड़े प्रदूषण विशेषज्ञों से बात की. इनमें से एक डब्ल्यू जेम्स गॉडरमैन का कहना था, ‘जिस तरह के वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध हैं उनके बाद यह जानने हुए अपने बच्चों को किसी ऐसी जगह पर रखना बहुत मुश्किल होगा कि इससे उनके स्वास्थ्य पर जिंदगी भर के लिए बुरा असर पड़ेगा.’

गॉडरमैन सदर्न कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी में प्रीवेंटिव मेडिसन के प्रोफेसर हैं. 2004 में उन्होंने अपने साथियों के साथ एक चर्चित अध्ययन किया था. इसमें पता चला था कि लास एंजलस के प्रदूषण वाले कुछ हिस्सों में रहने वाले बच्चों के फेफड़ों पर इतना बुरा असर पड़ रहा है कि वे बेकार भी हो सकते हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये ऐसे इलाके थे जहां प्रदूषण दिल्ली के मुकाबले कहीं कम था. यानी दिल्ली किस हद तक हमारे बच्चों को नुकसान पहुंचा रही है इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है. एक दूसरा अध्ययन बताता है कि अगर बच्चों को कम प्रदूषण वाले इलाकों में भी भेज दिया जाए तो भी पहले ज्यादा प्रदूषित वाले इलाके में रहने की वजह से स्वास्थ्य पर पड़े दुष्प्रभावों से वे पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाते.

सारथ गुट्टीकुंडा प्रदूषण पर शोध करने वाले चर्चित विशेषज्ञ हैं. अपने दो बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए वे गोवा बस चुके हैं. उन्हें जरा भी संदेह नहीं है. वे कहते हैं, ‘अगर आपके पास कहीं और रहने का विकल्प है तो आपको अपने बच्चों को दिल्ली में नहीं रखना चाहिए.’

गॉडरमैन, सारथ और कई दूसरे विशेषज्ञों ने मुझे बताया कि वयस्कों में फेफड़ों की क्षमता उनकी उम्र की भविष्यवाणी करने के लिहाज से रक्तचाप और कॉलेस्ट्रॉल की तुलना में कहीं सटीक संकेतक है. यानी दिल्ली में अपने फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा रहे हमारे बच्चे शायद उतना लंबा नहीं जी पाएं. अब तो शोध यह भी बताने लगे हैं कि प्रदूषण न सिर्फ बच्चों के आईक्यू में गिरावट ला सकता है बल्कि ऑटिज्म, मिर्गी और डायबिटीज जैसी बीमारियों की वजह भी बन रहा है.

दिल्ली आने से पहले भी ब्रैम को कभी-कभी सांस लेने में दिक्कत हुई थी. लेकिन डॉक्टरों का कहना था कि वह इस समस्या से उबर जाएगा. अब वह पूरी तरह दमे का शिकार हो गया है

दिल्ली आने से पहले भी ब्रैम को कभी-कभी सांस लेने में दिक्कत हुई थी. लेकिन डॉक्टरों का कहना था कि वह इस समस्या से उबर जाएगा. अब वह पूरी तरह दमे का शिकार हो गया है और उसे रोज बहुत ताकतवर दवाएं लेनी पड़ती हैं. सवाल यह है कि अगर हम अमेरिका में ही रहते तो क्या तब भी उसे दमा हो जाता? विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रदूषण वाले इलाकों में बच्चों को दमा होने की कहीं ज्यादा संभावना होती है.

रूथ आर फेडन जॉन हापकिंस बेर्मन इंस्टीट्यूट ऑफ बायोएथिक्स की निदेशक हैं. उनका कहना है कि हर किसी को अपनी सुरक्षा का अधिकार है और बच्चों के लिए तो यह अधिकार दो वजहों से और भी खास बन जाता है. पहली यह कि वे अपने स्वास्थ्य के लिए हम पर इतना ज्यादा निर्भर होते हैं. और दूसरी यह कि बचपन के इन प्रभावों का असर इतना दूरगामी होता है.

अपने देशों से बाहर रहने वाले लोगों ने इस तरह के कई लेख लिखे हैं. खासकर चीन से लिखे गए इन लेखों में वायु प्रदूषण के खतरों, बच्चों पर इसके पड़ने वाले असर और इससे बचाव के लिए लगातार किए जा रहे उपायों का वर्णन होता है. हालांकि ऐसे वर्णनों के आखिर में लेखक ऐसी भयावहता के बावजूद वहीं टिके रहने का फैसला करते दिखते हैं.

इस लेख को लिखने वाला ऐसा नहीं करने जा रहा. हम इस हफ्ते वाशिंगटन लौट रहे हैं.

बच्चे रोमांचित हैं. 12 साल का एडेन एक स्केटबोर्ड और साइकिल चाहता है. ये उसकी आजादी का प्रतीक हैं. वह एक ऐसी जगह जा रहा है जहां उसे खुद आजादी से घूमने की इजाजत होगी. लेकिन उसके छोटे भाई की इच्छा पूरी करना मुश्किल होगा. हालांकि ब्रैम ने हाल ही में मुझसे कहा है, ‘उम्मीद है मेरा दमा खत्म हो जाएगा.’

उम्मीद पर दुनिया कायम है.

(यह दो साल पहले द न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे गार्डनर हैरिस के एक लेख का संपादित अंश है)