कलकत्ता में आनंद मार्ग के 17 संन्यासियों की दिनदहाड़े हुई हत्या के दोषी कौन थे यह आज तक पता नहीं चल पाया है.
लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष और कभी सीपीएम के वरिष्ठ नेता रहे सोमनाथ चटर्जी एक लंबे अरसे के बाद इस हफ्ते फिर से मीडिया की सुर्खियों में आए हैं. लेकिन बिल्कुल अलग वजह से. आज से तैंतीस साल पहले कलकत्ता में एक हत्याकांड हुआ था और संभावना जताई जा रही है कि इसकी जांच के लिए बना न्यायिक आयोग उन्हें सम्मन भेजेगा. इस खबर के बाद आनंद मार्ग नाम का वह विवादास्पद संगठन भी चर्चा में है जिसके 17 संन्यासियों की हत्या की जांच इस आयोग के जिम्मे है.
आनंद मार्ग वही संगठन है जिसका नाम पिछले कुछ सालों के दौरान पुरुलिया में हथियार गिराए जाने के मामले में कई बार आया है. बीबीसी की पड़ताल के मुताबिक 1995 में एक विदेशी एयरक्राफ्ट से पुरुलिया में जो हथियार गिराए गए थे वे इसी संगठन के लिए थे. हालांकि इस मामले के एक अभियुक्त किम डेवी का कहना है कि इसके पीछे केंद्र की कांग्रेस सरकार थी. डेवी के दावे के बाद बीबीसी की तहकीकात पर सवाल तो उठे लेकिन, इस रिपोर्ट ने आनंद मार्ग की विवादास्पद छवि को और पुख्ता कर दिया.
ऑस्ट्रेलिया में आनंद मार्गी पहले भी चर्चा में आ चुके थे. एक साल पहले संगठन के कुछ सदस्यों को भारतीय दूतावास के एक कर्मचारी पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था
आनंद मार्ग और विवादों का बड़ा पुराना नाता रहा है. इसकी एक कड़ी तो ऑस्ट्रेलिया से भी जुड़ती है. इस देश के इतिहास में 1978 का एक आतंकवादी हमला आज भी याद किया जाता है. उस वर्ष फरवरी में सिडनी के हिल्टन होटल के बाहर बम विस्फोट हुआ था. इस होटल में राष्ट्रमंडल देशों के प्रमुखों को ठहराया गया था और इनमें भारत के प्रधानमंत्री मोराराजी देसाई भी शामिल थे. इस घटना ने तुरंत ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और इसके बाद भारत का कथित सामाजिक-आध्यात्मिक संगठन - आनंद मार्ग अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जानामाना नाम बन गया. दरअसल ऑस्ट्रेलिया प्रशासन ने इस हमले को अंजाम देने के आरोप में जिन दो लोगों – टिम एंडरसन और इवान पेडरिक को हिरासत में लिया था वे दोनों ही इस संगठन के सदस्य थे. कहा जाता है कि -वे भारत के प्रधानमंत्री की हत्या करना चाहते थे.
ऑस्ट्रेलिया में आनंद मार्गी इससे पहले भी चर्चा में आ चुके थे. एक साल पहले संगठन के कुछ सदस्यों को भारतीय दूतावास के एक कर्मचारी पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. हिल्टन होटल की घटना के बाद ऑस्ट्रेलिया की सरकार इस संगठन को लेकर कितनी गंभीर हो गई थी इसका अनुमान तत्कालीन मैल्कॉम फ्रेजर (ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री) सरकार के एक कैबिनेट नोट से लगता है. इसमें एक वरिष्ठ मंत्री फ्रेड चेनी लिखते हैं, ‘भारत के अलावा आनंद मार्गी पंथ के लोगों द्वारा हिंसा और शोषण के सबसे ज्यादा मामले ऑस्ट्रेलिया में हुए हैं... ऐसे संकेत हैं कि आनंद मार्ग के वरिष्ठ सदस्यों ने ऑस्ट्रेलिया में क्रांति के लिए एक लंबा अभियान चलाने का फैसला कर लिया है...’
ऑस्ट्रेलिया में आज भी जब किसी आतंकवादी घटना का जिक्र होता है तो इसके एक संदर्भ बिंदु के रूप में 1978 की इस घटना का जिक्र जरूर किया जाता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संगठन उस समय चर्चा में आया लेकिन बंगाल में एक दशक पहले ही यह संगठन सामाजिक-राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल होकर एक बड़ी ताकत बन चुका था.
1971 में संगठन के मुखिया प्रभात रंजन सरकार पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने एक अनुयायी की हत्या करवाई है. इस आरोप में उन्हें पटना जेल भेज दिया गया
आनंद मार्ग की स्थापना 1955 में प्रभात रंजन सरकार ने की थी. अपने शिष्यों के बीच वे श्रीश्री आनंदमूर्ति के नाम से जाने जाते थे. बंगाल में उस समय नक्सलवादी आंदोलन की हलचल तेज हो रही थी. समाज का बड़ा हिस्सा पूंजीवादी और वामपंथी विचारधारा के बीच बहस में उलझा हुआ था. इसी दौर में प्रभात रंजन ने अपने संगठन के जरिए ‘प्राउट’- प्रोग्रेसिव यूटिलाइजेशन थ्योरी, का प्रचार प्रसार शुरू कर दिया. यह वामपंथ और पूंजीवाद दोनों का विरोध करती है और इसका लक्ष्य जमीनी स्तर पर ‘सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र’ की स्थापना है. आनंद मार्ग के मुखिया का कहना था कि यह ‘नव-मानवतावाद’ है. आध्यात्मिक स्तर पर यह संगठन वैदिक व तांत्रिक परंपराओं को मानता है.
कई आध्यात्मिक आंदोलन देख चुका बंगाल नक्सलवादी आंदोलन के उस दौर में ऐसे किसी संगठन के फलने-फूलने के लिए बिल्कुल तैयार था जो अध्यात्म के मेल के साथ सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का क्रांतिकारी विकल्प देने का वादा करते हों. इन परिस्थितियों में आनंद मार्ग ने लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया. डेढ़ दशक के भीतर ही यह संगठन बंगाल की राजनीति पर असर डालने लायक ताकतवर हो गया और इसी के साथ आनंद मार्ग से विवाद भी जुड़ने लगे.
यह संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) का कट्टर विरोधी था और पार्टी कैडर व आनंद मार्गियों के बीच बंगाल में आए दिन झड़पें होती रहती थीं. इनके बीच संघर्ष की पहली बड़ी घटना 1967 की है जब पुरुलिया में आनंद मार्ग के वैश्विक मुख्यालय पर हमला हुआ. इसमें पांच संन्यासी मारे गए थे. कहा जाता है कि इस हमले के पीछे सीपीएम कैडर का हाथ था. सीपीएम का मानना था कि इस संगठन की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. आनेवाले सालों में इनके बीच टकराव और बढ़ता गया.
डेढ़ दशक के भीतर ही यह संगठन बंगाल की राजनीति पर असर डालने लायक ताकतवर हो गया और इसी के साथ आनंद मार्ग से विवाद भी जुड़ने लगे
आनंद मार्ग उस समय सिर्फ सीपीएम से टकराव की वजह से ही चर्चा में नहीं था. 1971 में संगठन के मुखिया प्रभात रंजन सरकार पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने एक अनुयायी की हत्या करवाई है. इस आरोप में उन्हें पटना जेल भेज दिया गया. आनंद मार्ग के लिए यह बड़ा झटका था. इसके बाद जो घटनाएं हुईं उन्होंने इसकी छवि एक आतंकवादी संगठन जैसी बना दी. अपने गुरू के जेल जाने के बाद आनंद मार्गियों ने उनकी रिहाई के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय अभियान छेड़ दिया था. ऑस्ट्रेलिया में हुए जिन आतंकी हमलों का जिक्र हमने शुरू में किया है, ये उसी अभियान का नतीजा थे. इनके अलावा उस समय लंदन में तैनात भारतीय उच्चायुक्त पर भी हमला हुआ और काठमांडू में भारतीय दूतावास के नजदीक भी बम विस्फोट किया गया. इन हमलों की जिम्मेदारी प्राउटिस्ट रिवॉल्यूशनरी ग्रुप नाम के संगठन ने ली थी. आधिकारिक रूप से आनंद मार्ग ने इस संगठन से किसी भी तरह का संबंध होने की बात नकार दी थी लेकिन, खुफिया सूचनाओं के मुताबिक यह आनंद मार्ग की आतंकी शाखा था.
1979 प्रभात रंजन जेल से रिहा हो गए. इस समय तक संगठन काफी विवादास्पद हो चुका था इसलिए अपने गुरू की रिहाई के बाद आनंद मार्ग के सदस्यों ने खुद को संगठन के कामकाज तक ही सीमित कर लिया. अगले दो सालों तक आनंद मार्ग का नाम किसी विवाद में नहीं आया लेकिन अचानक 1982 में यह संगठन फिर से राष्ट्रीय स्तर की खबर बन गया.
इसबार आनंद मार्ग के सदस्यों ने कहीं हमला नहीं किया था बल्कि उसके संन्यासियों का सरेआम कत्लेआम हुआ था. यह 30 अप्रैल की बात है. दक्षिण कलकत्ता के बिजॉन सेतु पर एक भीड़ ने 17 आनंद मार्गियों को पीट-पीटकर आग के हवाले कर दिया था. इन संन्यासियों में एक साध्वी भी शामिल थी. बंगाल में तब वामपंथियों की सरकार थी और ज्योतिबसु मुख्यमंत्री थे.
1982 के हत्याकांड पर ज्योतिबसु का कहना था कि भीड़ आनंद मार्गियों को बच्चों का अपहरण करने वाला समझ रही थी इसलिए उनपर हमला हुआ है
इस घटना पर ज्योतिबसु का कहना था कि भीड़ आनंद मार्गियों को बच्चों का अपहरण करने वाला समझ रही थी इसलिए उनपर हमला हुआ. जबकि संगठन का दावा था कि इस कांड में सीधेतौर पर सीपीएम कैडर का हाथ है. जब यह विवाद बढ़ने लगा तो आखिरकार राज्य सरकार ने एक जांच आयोग का गठन कर दिया. लेकिन इसकी जांच कभी पूरी नहीं हो पाई. राज्य सीआईडी ने भी इस मामले की जांच की लेकिन वह भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंची.
सरकार और आनंद मार्गियों के दावे से अलग हत्याकांड से जुड़ी कुछ धारणाओं की वजह से यह मामला देश की अनसुलझी गुत्थियों में गिना जाता है. इस घटना में सीपीएम का हाथ न होने पीछे तर्क दिया जाता है कि एक महीने बाद ही राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे. अतीत के विवादों के चलते तब आनंद मार्ग का प्रभाव इतना नहीं था कि वह सीपीएम को राजनीतिक रूप से चुनौती दे पाता. इन परिस्थितियों में सीपीएम कैडर को आनंद मार्गियों पर हमले से कोई लाभ नहीं मिलने वाला था, उल्टे कानून-प्रशासन की धज्जियां उड़ाने के नाम पर उनकी सरकार ही बदनाम होती.
विश्लेषकों का एक तबका कहता है कि यह सीपीएम की नहीं बल्कि विरोधी पार्टियों की साजिश थी. केंद्र में तब कांग्रेस की सरकार थी और बंगाल में वह मुख्य़ विपक्षी पार्टी थी. कहा जाता है कि वह इस हत्याकांड के बहाने बेकाबू हो रही कानून-व्यवस्था को चुनाव का एक बड़ा मुद्दा बनाना चाहती थी.
कुछ मीडिया रिपोर्टों में इस हत्याकांड के पीछे आनंद मार्ग के ही कुछ पूर्व सदस्यों का हाथ होने की संभावना जताई गई. दरअसल इस घटना के एक दशक पहले सिंहभूम जिले में आनंद मार्गियों की हत्या के कुछ मामले सामने आए थे. जांच से पता चला था कि इनके पीछे आनंद मार्ग के एक उग्रपंथी समूह का हाथ है जो अब संगठन का हिस्सा नहीं था. इससे पहले संगठन के मुखिया प्रभात रंजन भी अपने एक अनुयायी की हत्या के आरोप में जेल जा चुके थे इसलिए इस धारणा को भी सीधे-सीधे खारिज नहीं किया जा सकता.
आनंद मार्ग लंबे अरसे से इस हत्याकांड की जांच की मांग कर रहा था, लेकिन बंगाल में वामपंथी पार्टियों की सरकार ने कभी उनकी बात नहीं मानी. 2013 में ममता बनर्जी ने इस मामले की जांच के लिए अमिताव लाला की अध्यक्षता में एक न्यायायिक आयोग का गठन किया था. आयोग अब तक 16 लोगों की गवाही ले चुका है. सूत्रों के मुताबिक आयोग को पता चला है कि हत्याकांड के कुछ दिन पहले घटनास्थल के पास ही सीपीएम के कुछ वरिष्ठ नेताओं की मीटिंग हुई थी. इसमें आनंद मार्गियों की संभावित योजनाओं पर चर्चा की गई थी और इसी बैठक में जादवपुर के तत्कालीन लोकसभा सांसद सोमनाथ चटर्जी भी शामिल हुए थे. इसीलिए माना जा रहा है कि लाला आयोग चटर्जी को पूछताछ के लिए बुलाएगा.