चार जुलाई 1976. युगांडा के एंतेब्बे एयरपोर्ट पर जब एक जहाज उतरा और उसमें से काले रंग की एक मर्सिडीज और दो लैंडरोवर गाड़ियां निकलकर टर्मिनल की तरफ बढ़ने लगीं तो युगांडा के सैनिक चकित रह गए. राष्ट्रपति ईदी अमीन भी इसी अंदाज में आते थे. लेकिन युगांडाई सैनिक इसलिए हैरान थे कि एक हफ्ते पहले ही अमीन ने काली की जगह सफेद मर्सिडीज का इस्तेमाल शुरू कर दिया था.

हालांकि उनके खबरदार होने तक बहुत देर हो चुकी थी. उनके हाथ अपनी राइफलों तक जाते इससे पहले कार और उसके पीछे दो लैंडरोवर गाड़ियों में बैठे इसराइली कमांडो हरकत में आ चुके थे. उन्होंने साइलेंसर लगी बंदूकों से इन सैनिकों को ढेर कर दिया.

वापस चलने से पहले सैनिकों की गिनती की गई. इसके बाद हवाई अड्डे पर खड़े युगांडा के लड़ाकू विमान ध्वस्त कर दिए गए ताकि पीछा किए जाने की संभावना खत्म हो जाए.

इसके बाद कमांडो उस टर्मिनल की तरफ बढ़े जहां एक हफ्ते पहले बंधक बनाए गए इसराइली यात्रियों को रखा गया था. उन्होंने यात्रियों से लेट जाने के लिए कहा और उनसे हिब्रू में पूछा कि उन्हें बंधक बनाने वाले अपहरणकर्ता कहां हैं. यात्रियों ने हॉल में खुलने वाले एक दरवाजे की तरफ इशारा किया. कमांडो उधर बढ़े और जब तक अपहरणकर्ता संभल पाते तब तक उनका खात्मा हो गया.

इस बीच तीन और इसराइली विमान भी रनवे पर उतर चुके थे. इनमें से दो में इसराइली सैनिक थे और एक खाली था जिनमें बंधकों को वापस ले जाया जाना था. ऑपरेशन शुरू होने के 20 मिनट बाद ही बंधकों को खाली विमान में ले जाया जाने लगा. इस बीच युगांडाई सैनिकों की तरफ से गोलीबारी तेज हो गई. हवाई अड्डे की रोशनियां बंद कर दी गई थीं. लेकिन इसराइली कमांडो ने खुद को बड़े नुकसान से बचाते हुए अभियान जारी रखा.

इसराइली विमानों के एंतेब्बे में उतरने के एक घंटे के भीतर इस दुस्साहसी बचाव अभियान का सबसे खतरनाक हिस्सा खत्म हो चुका था. वापस चलने से पहले सैनिकों की गिनती की गई. इसके बाद हवाई अड्डे पर खड़े युगांडा के लड़ाकू विमान ध्वस्त कर दिए गए ताकि पीछा किए जाने की संभावना खत्म हो जाए. इस मिशन में सभी सात अपहरणकर्ता मारे गए. 20 युगांडाई सैनिक भी खेत रहे. पूरे अभियान में इसराइल का सिर्फ एक सैनिक मारा गया. ये लेफ़्टिनेंट कर्नल नेतन्याहू थे जिन्हें एक गोली लगी थी. वे घायल हो गए थे. इसराइल वापस लौटते हुए विमान में ही उनकी मौत हो गई.

चार जुलाई 1976 को खत्म हुए इस संकट की शुरुआत 27 जून को हुई थी. इसराइल के तेल अवीव से पेरिस जा रही एक फ्लाइट ने थोड़ी देर एथेंस में रुकने के बाद उड़ान भरी ही थी कि पिस्टल और ग्रेनेड लिए चार यात्री उठे और विमान को पहले लीबिया के बेनगाजी और फिर युगांडा के एंतेब्बे हवाई अड्डे ले गए. बाद में पता चला कि यह पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन फॉर फिलिस्तीन के सदस्यों का काम था. युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन की सहानुभूति अपहरणकर्ताओं के साथ थी. यहां यहूदी बंधकों को अलग कर दिया गया. इसके बाद अपहरणकर्ताओं ने मांग की कि इजराइल, कीनिया और तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी की जेलों में रह रहे 54 फ़िलस्तीनी कैदियों को रिहा किया जाए नहीं तो वे बंधकों को एक-एक करके मारना शुरू कर देंगे.

एक रात में ही इसराइल में एक नकली टर्मिनल खड़ा किया गया जिसमें कमांडो ने हमले का खूब पूर्वाभ्यास किया. इस बीच इसराइल की सरकार अपहरणकर्ताओं से बात भी करती रही.

संकट गंभीर था. इससे निबटने का रास्ता भी बहुत मुश्किल भरा था. एंतेब्बे और इसराइल के बीच की दूरी करीब चार हजार किलोमीटर थी. बचाव मिशन के बारे में सोचना बहुत मुश्किल था. लेकिन यात्रियों के संबंधियों ने तेल अवीव में प्रदर्शन करने शुरू कर दिए थे. बंधकों में तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री राबीन के रिश्तेदार भी थे इसलिए सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा था. रास्ते तीन थे. हवाई, जल मार्ग और तीसरा कीनिया से होकर जमीन के रास्ते युगांडा में घुसना.

आखिरकार पहले विकल्प पर सहमति बनी. इसके बाद चार जुलाई को इसराइल से कुछ फैंटम जेट लड़ाकू विमानों के साथ चार हरक्यूलिस विमान रवाना हुए. इनमें सेना के सबसे काबिल 200 सैनिक सवार थे. योजना युगांडा के सैनिकों को यह आभास देने की थी कि इन विमानों में राष्ट्रपति अमीन विदेश यात्रा से लौट रहे हैं. अमीन उन दिनों एक आयोजन में भाग लेने मॉरीशस गए हुए थे. बहुत नीची उड़ान भरते हुए इसराइली विमान मिस्र, सूडान और सऊदी अरब के रडारों को चकमा देने में कामयाब रहे. इसराइली सैनिकों ने युगांडा के सैनिकों की वर्दी पहनी हुई थी. एक तरफ का सफर सात घंटे का था और लगातार उड़ना था इसलिए हवा से हवा में ईंधन भरने वाले विमान ले जाए गए थे.

इससे पहले पूरी तैयारी हो चुकी थी. इसराइली जासूसी एजेंसी मोसाद के एजेंटों ने एंतेब्बे हवाई अड्डे के बारे में हर जानकारी जुटा ली थी. यह भी दिलचस्प संयोग था कि हवाई अड्डे के जिस टर्मिनल में बंधकों को रखा गया था उसे एक इसराइली कंपनी ने ही बनाया था. बताते हैं कि एक रात में ही इसराइल में एक नकली टर्मिनल खड़ा किया गया जिसमें कमांडो ने हमले का खूब पूर्वाभ्यास किया. इस बीच इसराइल की सरकार अपहरणकर्ताओं से बातचीत के संकेत देती रही ताकि कमांडो को हमले के पूर्वाभ्यास के लिए समय मिल सके.

इसके बाद वही हुआ जिसका जिक्र खबर की शुरुआत में हुआ है. चार जुलाई को इसराइली सैनिक बचाए गए 102 बंधकों के साथ वापस तेल अवीव में थे. उनके स्वागत में लोगों की बड़ी भीड़ जमा थी. पूरे मंत्रिमंडल के साथ प्रधानमंत्री राबीन भी इन सैनिकों के सम्मान में एयरपोर्ट पर मौजूद थे.