भारतीय संविधान में हुए कुल संशोधनों का यदि औसत निकाला जाए तो यह लगभग दो संशोधन प्रति वर्ष होता है. कानून के जानकारों के अनुसार इन संशोधनों ने संविधान को समय के साथ मजबूत ही किया है. लेकिन इस सफ़र में एक दौर ऐसा भी आया था जब संविधान पूरी तरह से निजी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गया था. यह दौर था इंदिरा गांधी द्वारा लागू किये गए आपातकाल का. इस दौरान संविधान में इस हद तक बदलाव कर दिए गए थे कि इसे अंग्रेजी में 'कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया' की जगह 'कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा' कहा जाने लगा था. इस दौर में संविधान में क्या परिवर्तन हुए, इन परिवर्तनों के क्या परिणाम हुए और कैसे संविधान को उसके मूल रूप में वापस लाया गया? इन सवालों के जवाब जानने की शुरुआत उन परिस्थितियों से करते हैं जिनके कारण संविधान से खिलवाड़ का दौर शुरू हुआ.

19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी पहली ऐसी भारतीय प्रधानमंत्री बनीं जिसे न्यायालय में गवाही देने आना पड़ा हो. यह मामला उनके खिलाफ दर्ज की गई चुनाव याचिका की सुनवाई का था. मार्च 1975 का यही वह समय भी था जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में दिल्ली की सड़कों पर लगभग साढ़े सात लाख लोगों की भीड़ इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे लगा रही थी. आजादी के बाद यह पहला मौका था जब किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ इतनी बड़ी रैली निकाली गई थी. 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' और 'जनता का दिल बोल रहा है, इंदिरा का आसन डोल रहा है' जैसे नारों से सारा देश गूंज उठा था.

आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किये. 40वें और 41वें संशोधन के जरिये संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया

इसके कुछ समय बाद ही 12 जून 1975 का वह ऐतिहासिक दिन भी आया जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 15 नंबर कमरे में हुए एक फैसले ने इंदिरा गांधी के चुनाव को गलत बताते हुए उसे रद्द कर दिया. इसी महीने 25 जून को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया. इसके बाद शुरू हुआ संविधान में ऐसे संशोधनों का दौर जिन्होंने भारतीय गणतंत्र की आत्मा को ही बदलकर रख दिया.

आपातकाल में हुए संशोधनों में सबसे पहला था भारतीय संविधान का 38वां संशोधन. 22 जुलाई 1975 को पास हुए इस संशोधन के द्वारा न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया. इसके लगभग दो महीने बाद ही संविधान का 39वां संशोधन लाया गया. यह संविधान संशोधन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद को बनाए रखने के लिए किया गया था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर चुका था. लेकिन इस संशोधन ने न्यायपालिका से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया. इस संशोधन के अनुसार प्रधानमंत्री के चुनाव की जांच सिर्फ संसद द्वारा गठित की गई समिति ही कर सकती थी. आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किये. 40वें और 41वें संशोधन के जरिये संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया. इसी संशोधन के कारण संविधान को 'कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा' कहा जाने लगा था. इसके जरिये भारतीय संविधान की प्रस्तावना तक में बदलाव कर दिए गए थे.

42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था - मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना. इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों तक से वंचित किया जा सकता था. इसके साथ ही इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से बौना कर दिया था. वहीँ विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थी. अब केंद्र सरकार को यह भी शक्ति थी कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी. साथ ही राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया.

42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था - मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना

42वें संशोधन का एक और कुख्यात प्रावधान 'संविधान में संशोधन' के सम्बंध में भी था. हालांकि आपातकाल से कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए संविधान में संशोधन करने के पैमाने तय कर दिए थे. लेकिन 42वें संशोधन ने इन पैमानों को भी दरकिनार कर दिया. इस संशोधन के बाद विधायिका द्वारा किए गए 'संविधान-संशोधनों' को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. साथ ही सांसदों एवं विधायकों की सदस्यता को भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. किसी विवाद की स्थिति में उनकी सदस्यता पर फैसला लेने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को दे दिया गया और संसद का कार्यकाल भी पांच वर्ष से बढाकर छह वर्ष कर दिया गया.

आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान में कुछ संशोधन ऐसे भी हुए जिन्हें सकारात्मक नजरिये से देखा जा सकता है. संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' और 'अखंडता' जैसे शब्दों का जुड़ना और संविधान में मौलिक कर्तव्यों का शामिल होना कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं. यही कारण है कि ये बदलाव आज भी हमारे संविधान का हिस्सा हैं. लेकिन इन चुनिंदा सकारात्मक प्रावधानों से कभी भी आपातकाल और उसकी आड़ में हुए संविधान संशोधनों की क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती थी.

आपातकाल के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी को अपनी सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा. 1977 में पहली बार भारत में एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार ने आते ही संविधान को सुधारने का काम शुरू किया. इसकी मुख्य जिम्मेदारी तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण को दी गई. संशोधनों से क्षतिग्रस्त हुए संविधान को संवारने के लिए कुछ और संशोधनों की जरूरत थी. जनता पार्टी ने सबसे पहले 43वें संशोधन के जरिये सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों को उनके अधिकार वापस दिलाए. इसके बाद संविधान का 44वां संशोधन हुआ जिसके जरिये संविधान फिर से अपनी मूल अवस्था में आ गया. 42वे संशोधन से जो क्षति संविधान की हुई थी उसे ठीक करने का सबसे ज्यादा श्रेय जनता पार्टी द्वारा किये गए 44वें संशोधन को ही जाता है. इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने भी 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए संविधान को उसका मूल स्वरुप लौटाया है.

आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान में कुछ संशोधन ऐसे भी हुए जिन्हें सकारात्मक नजरिये से देखा जा सकता है. संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'धर्मनिरपेक्ष' और 'अखंडता' जैसे शब्दों का जुड़ना और संविधान में मौलिक कर्तव्यों का शामिल होना कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं

न्यायपालिका को दोबारा मजबूत करने और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन ने संविधान को पहले से भी ज्यादा मजबूत करने का काम भी किया है. इस संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किये जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो. आपातकाल सम्बन्धी प्रावधानों में 'आतंरिक अशांति' के स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द जोड़ा गया. इसके साथ ही इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों को भी मजबूती दी.

जनता पार्टी की सरकार ज्यादा समय तक नहीं चली. सत्ता में आने के कुछ समय बाद से ही इसमें कई विभाजन होने लगे थे. सुप्रसिद्ध लेखक राम चन्द्र गुहा ने अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में जनता पार्टी के बारे में लिखा है कि 'जहां कांग्रेस ने अपने उसूलों को बर्बाद करने में तीस साल लगाए, वहीं जनता पार्टी ने यह काम एक साल में ही कर दिया.' जनता पार्टी भले ही अपने इस कार्यकाल के बाद पूरी तरह बिखर गई हो लेकिन उसने निश्चित ही भारतीय संविधान को बिखरने से बचाया था.