रसगुल्ला पहली बार कहां बना, इस पर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में हो रहे झगड़े का फैसला हो गया है. चेन्नई स्थित बौद्धिक संपदा कार्यालय ने इस मिठाई का जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग पश्चिम बंगाल को दिया है. यह टैग मिलने के बाद यह मान लिया जाता है कि संबंधित उत्पाद उस जगह की ही पैदाइश है. इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट कर खुशी जताई और इसे मीठी खबर बताया.

यह झगड़ा 2015 में तब शुरू हुआ था जब ओडिशा सरकार ने कटक और भुवनेश्वर को जोड़ने वाले राजमार्ग पर स्थित पाहाल में मिलने वाले मशहूर रसगुल्ले को जीआई टैग दिलाने के लिए कोशिशें शुरू कीं. उधर, बंगाल का कहना था कि रसगुल्ले के अविष्कार का श्रेय उसे दिया जाना चाहिए. वह ओडिशा के इस दावे को चुनौती देने के लिए जुट गया. खबर आई कि राज्य के मशहूर रसगुल्ला निर्माता केसी दास के वारिस मशहूर इतिहासकार हरिपद भौमिक की मदद से एक बुकलेट तैयार करा रहे हैं जो रसगुल्ले की पैदाइश बंगाल में होने की पुष्टि करेगी. इस तरह के कई दस्तावेजों को चेन्नई स्थित बौद्धिक संपदा कार्यालय भी भेजा गया.

‘हिंदू धर्म में दूध का फटना अशुभ माना जाता था. इसलिए यह असंभव ही बात लगती है कि 12वीं सदी में ब्राह्मण छैने से बनी कोई मिठाई भगवान को चढ़ाते होंगे. ‘

रसगुल्ले को पारंपरिक रूप से बंगाल के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है. लेकिन ओडिशा का कहना है कि बंगाल से भी बहुत पहले यह मिठाई पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में बन चुकी थी. कई कहते हैं कि पुरी में रथ यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ जब वापस मंदिर में आते हैं तो उसदिन देवी लक्ष्मी को मनाने के लिए उनके द्वारा रसगुल्ला पेश करने की परंपरा कम से कम 300 साल पुरानी है. कुछ तो इस आंकड़े को 800 साल भी बताते हैं. माना जाता है कि भगवान के अकेले ही रथयात्रा पर चले जाने के कारण उनसे रुष्ट हुईं महालक्ष्मी महल का दरवाज़ा नहीं खोलतीं इसलिए उन्हें मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला पेश करते हैं.

हालांकि बहुत से लोग मानते हैं कि यह बात सही नहीं है क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को लगाए जाने वाले ‘छप्पन भोग’ में कहीं भी रसगुल्ले का उल्लेख नहीं है. एक साक्षात्कार में खाद्य परंपराओं के अध्ययनकर्ता केटी आचार्य बताते हैं, ‘हिंदू धर्म में दूध का फटना अशुभ माना जाता था. इसलिए यह असंभव ही बात लगती है कि 12वीं सदी में ब्राह्मण छैने से बनी कोई मिठाई भगवान को चढ़ाते होंगे.’ गौरतलब है कि रसगुल्ला दूध को फाड़कर बनने वाले छैने से बनाया जाता है.

एक अन्य इतिहासकार चित्रा बनर्जी का मानना भी कुछ ऐसा ही है. एक वेबसाइट से बातचीत में वे कहती हैं, ‘ वृंदावन में पले श्रीकृष्ण से संबंधित जितनी भी कहानियां प्रचलित हैं उनमें दूध, मक्खन, घी, दही का जिक्र तो मिलता है लेकिन छैने का नहीं.’ पौराणिक कथाओं में ही नहीं बल्कि मध्यकालीन भारत के इतिहास में भी छैने का कोई उल्लेख नहीं मिलता. चित्रा बनर्जी के अनुसार चैतन्य महाप्रभु मिठाई के बहुत शौकीन थे लेकिन उनके समय में भी छैने का कोई विवरण नहीं मिलता. हालांकि मध्यकाल में बंगाल में दूध को पकाकर बनाए गए खोए से बने संदेश का उल्लेख जरूर मिलता है.

बाकी सभी आक्रमणकारियों की तरह पुर्तगालियों ने भी स्थानीय संस्कृतियों पर अपना प्रभाव छोड़ा. भाषा और खान-पान से कई उदाहरण लेकर यह बात समझी जा सकती है.

तो सवाल उठता है कि रसगुल्ले के अस्तित्व के लिए अनिवार्य छैना आखिर कहां से आया?

इसका जवाब है पुर्तगाल. इतिहासकार मानते हैं कि मध्यकालीन भारत में समुद्री तटों के आसपास रहने वाली आबादी के जीवन पर पुर्तगाल का काफी प्रभाव पड़ चुका था. दरअसल 1498 में वास्कोडिगामा के भारत पहुंचने के बाद पुर्तगालियों की भारत में आमद बढ़ने लगी थी. पहले-पहल कारोबार के मकसद से आए पुर्तगालियों ने अपनी ताकतवर नौसेना बल पर भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा से सटे कई इलाकों पर कब्जा जमा लिया. बाद में उनका प्रभाव पश्चिम में कोंकण से लेकर पूर्व में बंगाल के चटगांव तक फैल गया.

बाकी सभी आक्रमणकारियों की तरह पुर्तगालियों ने भी स्थानीय संस्कृतियों पर अपना प्रभाव छोड़ा. इसका पहला उदाहरण तो भाषा ही है. बंगाली और मराठी, दोनों भाषाओं में ब्रेड के लिए पाव शब्द इस्तेमाल होता है. बटाटा, अलमारी, चाबी, गिरजा, इस्त्री, बाल्टी, कमरा, गोदाम, पादरी, फीता जैसे और भी कई शब्द हैं जो पुर्तगाली से भारतीय भाषाओं में आए.

पुर्तगालियों ने दूसरा सबसे बड़ा असर खान-पान पर छोड़ा. उन्हें फ्रेश कॉटेज चीज बहुत पसंद था जिसे वे उबलते दूध में सिट्रिक एसिड डालकर बनाया करते थे. केटी आचार्य का मानना है कि शायद उन्हें देखकर दूध को जानबूझकर फाड़ने के प्रति आर्यों की हिचक धीरे-धीरे खत्म हो गई हो. इसका फायदा यह हुआ होगा कि मिठाई बनाने के लिए पारंपरिक हलवाइयों को खोये के अलावा एक और बढ़िया चीज मिल गई. छैने का विस्तार उत्तर भारत में भी हुआ और यहां इसे दबाकर सख्त टुकड़ों के रूप में भी बेचा जाने लगा. इसे पनीर कहा जाने लगा. फारसी में भी चीज को पनीर ही कहा जाता है.

लेकिन यह छैना रसगुल्ला कैसे बना? संभावना जताई जाती है कि किसी प्रतिभाशाली और प्रयोगप्रिय हलवाई ने छैने का इस्तेमाल करके संदेश को रसगुल्ले में बदल दिया. कई मानते हैं कि यह बंगाल में बना और वहां से उड़ीसा गया. एक वर्ग का यह भी कहना है कि बंगाली घरों में उड़िया रसोइयों का होना आम बात है और वही इसे उड़ीसा से बंगाल लेकर गए. हालांकि पक्के तौर पर कुछ कहना मुश्किल है.

कई मानते हैं कि यह बंगाल में बना और वहां से उड़ीसा गया. एक वर्ग का यह भी कहना है कि बंगाली घरों में उड़िया रसोइयों का होना आम बात है और वही इसे उड़ीसा से बंगाल लेकर गए.

हालांकि यह जरूर कहा जाता है कि रसगुल्ले का आधुनिक और लोकप्रिय स्वरूप का श्रेय कोलकाता के नवीन चंद्र दास को जाता है. 1868 में दास ने ही पहली बार छैने की गोलियों को चाशनी में उबालकर रसगुल्ले को यह स्वरूप दिया था. इसके दो नतीजे हुए. यह मिठाई स्पंज की तरह हो गई और दूसरा, बनाने के बाद इसे लंबे समय तक रखना संभव हो गया. दूसरा नतीजा कारोबार के नजरिये से बहुत अहम था. इसलिए दास को रसगुल्ले का स्टीव जॉब्स कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा. दास ने रसगुल्ले के साथ वही किया जो जॉब्स ने स्मार्टफोन के साथ किया था.

दास को रसगुल्ले का आविष्कारक बताने पर हो सकता है उड़ीसा के लोगों को आपत्ति हो, लेकिन जानकारों के मुताबिक उन्हें इस मिठाई को लोकप्रिय बनाने का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए. एक और दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जिन केसी दास का जिक्र लेख की शुरुआत में आया है वे नवीन चंद्र दास के ही बेटे थे और उन्हें रसमलाई के आविष्कारक के तौर पर भी जाना जाता है.

ओडिशा लंबे समय तक बंगाल का हिस्सा रहा. उस पर बांग्ला संस्कृति का प्रभाव भी रहा है. कई समाजशास्त्रियों के मुताबिक रसगुल्ले पर अपना हक जताने की यह कवायद एक हद तक उस अस्मितावाद या उपराष्ट्रीयता का भी नतीजा है जिसका बीते कुछ समय के दौरान भारत की राजनीति में विस्तार होता गया है.