टीपू सुल्तान को लेकर पिछले कुछ समय से भाजपा और कांग्रेस के बीच मचा घमासान आज इस ऐतिहासिक हस्ती की जयंती पर भी जारी है. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने टीपू सुल्तान की तुलना बाबर और तैमूर से करते हुए कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और राहुल गांधी पर निशाना साधा है. गिरिराज सिंह ने ट्वीट किया है, ‘कांग्रेस और राहुल गांधी का वोट के लिए मानसिक पतन का ये हाल है कि वो फ़िरोज़ गांधी का जन्मदिन तो नहीं मनाते हैं लेकिन बाबर, तैमूरलंग, टीपू सुल्तान का मनाते हैं. अब आगे क्या अफ़ज़ल गुरु, कसाब और बुरहान वानी का जन्मदिन भी मनायेंगे?’ उधर, कर्नाटक में भाजपा और सहयोगी संगठन कर्नाटक सरकार द्वारा आयोजित टीपू सुल्तान जयंती समारोहों का बहिष्कार कर रहे हैं. वे 18वीं सदी में हुए मैसूर के इस शासक को हिंदू विरोधी और बर्बर हत्यारा कहते हैं.

यह पहली बार नहीं है जब भाजपा टीपू सुल्तान का विरोध कर रही हो. दो साल पहले उसने कर्नाटक के डिंडीगुल जिले में टीपू सुल्तान और हैदर अली (टीपू के पिता) से जुड़े स्मारक के खिलाफ भी अभियान छेड़ा था. मैसूर के राजा रहे हैदर अली ने पहली बार टीपू को इसी जगह का शासक नियुक्त किया था. भाजपा का कहना था यदि सरकार स्मारक निर्माण के कार्य पर आगे बढ़ी तो भाजपा पूरे क्षेत्र में इसके खिलाफ आंदोलन करेगी.

उसी साल एक विवाद तब भी हुआ जब कन्नड़ फिल्मों के प्रोड्यूसर अशोक खेनी ने घोषणा की कि वे टीपू सुल्तान के ऊपर एक फिल्म बनाना चाहते हैं और इसमें मुख्य भूमिका रजनीकांत निभाएंगे. इस घोषणा पर सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया कर्नाटक और तमिलनाडु में ही दिखाई दी. तमिलनाडु में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता एल गणेशन ने इस फिल्म का विरोध करते हुए कहा कि कि टीपू ने हिंदुओं पर भारी अत्याचार किए थे. उन्होंने उम्मीद जताई कि रजनीकांत इस फिल्म में काम नहीं करेंगे. कभी रजनीकांत के सहारे ही पार्टी तमिलनाडु में अपना जनाधार बढ़ाने के बारे में सोच रही थी. लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और रजनीकांत की मुलाकात के बाद यहां तक चर्चा होने लगी थीं यह सुपरस्टार आगे तमिलनाडु में भाजपा का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार हो सकता है.

लेकिन उसी भाजपा को अब अपने इस रवैए से रजनीकांत के नाराज होने की फिक्र नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब भाजपा रजनीकांत के कंधे पर रखकर जिस लक्ष्य पर निशाना साध रही है उससे पार्टी को कहीं ज्यादा राजनीतिक फायदा मिल सकता है. दरअसल टीपू सुल्तान से जुड़ा विवाद भाजपा के लिए एक तीर से तीन निशाने लगाने जैसा है.

तमिलनाडु में टीपू सुल्तान की विरासत हमेशा से विवादित रही है. मैसूर सल्तनत पर टीपू सुल्तान का शासन सन 1782 से 1799 तक रहा और इस दौरान अंग्रेजों द्वारा प्रशासित तमिलनाडु पर उसने कई बार चढ़ाई की थी. यह सिलसिला उसके पिता हैदर अली से चला आ रहा था. उस दौरान हैदर और टीपू दुश्मन सेना के पकड़े गई सभी सैनिकों का धर्म परिवर्तन करवाकर अपनी सेना में शामिल करते थे. मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर आर वैंकटरामानुजम एक रिपोर्ट में कहते हैं, ‘उस दौर में यही चलन था और इसकी शुरुआत हैदर अली ने की थी.’ हालांकि कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि धर्म परिवर्तन सिर्फ सैनिकों तक सीमित नहीं था. टीपू सुल्तान के समय बड़ी संख्या में आम तमिलों को भी मुसलमान बनाया गया है.

भाजपा तमिलनाडु में इन्हीं उदाहरणों को देकर अपने पक्ष में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है. विश्लेषक मानते हैं कि दक्षिण का यह राज्य भाजपा के विस्तार की योजनाओं में है. जयललिता के निधन और करुणानिधि के सक्रिय राजनीति से दूर हो जाने की वजह से वहां एक तरह का शून्य भी बना हुआ है. जानकारों के मुताबिक टीपू सुल्तान पर विवाद इस राज्य में पार्टी की पैठ जमाने में मदद कर सकता है.

कर्नाटक में तो टीपू सुल्तान से जुड़ा विवाद पिछले दो साल से चला आ रहा है और एक तरह से इसकी शुरुआत कांग्रेस ने की थी. दो साल पहले इन्हीं दिनों राज्य में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘घर वापसी’ अभियान पर काफी विवाद चल रहा था. राज्य में कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया कानूनी तौर पर इसकी कोई तोड़ नहीं निकाल पा रहे थे. आखिरकार उन्होंने घर वापसी के जवाब में घोषणा कर दी कि राज्य सरकार अब टीपू सुल्तान की जयंती मनाएगी. मुख्यमंत्री का कहना था, ‘टीपू सुल्तान सिर्फ राजा नहीं था बल्कि एक धर्म निरपेक्ष शासक था जो सभी वर्गों को अपने साथ लेकर चलता था.’

यह घोषणा एक तरह से भाजपा के लिए वरदान साबित हुई. कर्नाटक अब घर वापसी अभियान की चर्चा पीछे छूट गई और भाजपा ने टीपू सुल्तान के बहाने राज्य सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया. भाजपा का कहना था कि टीपू सुल्तान ने कूर्ग और मैंगलोर इलाके में बड़े पैमाने पर हिंदुओं की हत्या की थी और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया था.

इस दावे की पुष्टि इतिहास भी करता है. 1788 टीपू सुल्तान की सेना ने कूर्ग पर आक्रमण किया था और इस दौरान पूरे के पूरे गांव जला दिए गए थे. टीपू के एक दरबारी और जीवनी लेखक मीर हुसैन किरमानी ने इन हमलों के बारे में विस्तार से लिखा है. वहीं टीपू सुल्तान द्वारा कुर्नूल के नवाब रणमस्त खान को लिखे एक पत्र में जिक्र है कैसे उसने 40 हजार कूर्ग वासियों को हिरासत में लेकर उनका धर्म परिवर्तन करवाया था और सेना में शामिल किया था.

भाजपा के लिए ये ऐतिहासिक तथ्य टीपू सुल्तान के खिलाफ अपना अभियान चलाने में काफी मददगार साबित हुए हैं. कर्नाटक के तटीय इलाकों को भाजपा का गढ़ माना जाता है. यहां एक बड़ी आबादी ईसाइयों की भी है. इतिहास बताता है कि टीपू सुल्तान ने जब इन क्षेत्रों पर आक्रमण किया तो उसने दर्जनों चर्च ढहा दिए थे और कई ईसाइयों का धर्म परिवर्तन कराया था. इस समय यहां के ईसाइयों की आबादी का एक हिस्सा भाजपा का समर्थन करता है और माना जा रहा है कि टीपू सुल्तान के खिलाफ अभियान चलाने पर उसे इनका और समर्थन मिल सकता है. बीते साल नवंबर में मैंगलोर में यूनाइटेड क्रिश्चियन एसोसिएशन ने मैंगलोर में टीपू सल्तान के विरोध में प्रदर्शन करते हुए भाजपा को अपना समर्थन दिया. इस संगठन ने 2013 में तब भी भगवा परिवार को अपना समर्थन दिया था जब उसने श्रीरंगपट्टनम में केंद्रीय विश्वविद्यालय का नामकरण टीपू सुल्तान के नाम पर करने का विरोध किया था.

भाजपा के टीपू सुल्तान को खलनायक की तरह पेश करने का राजनीतिक फायदा सिर्फ तमिलनाडु और कर्नाटक तक सीमित नहीं है. उसकी इस रणनीति में केरल भी शामिल है. पार्टी केंद्र में सरकार बनाने के बाद से देश के इस सबसे दक्षिणी और बाकियों की तुलना में भाजपा से अप्रभावित राज्य में अपना असर बढ़ाने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है. पिछले महीने ही पार्टी ने वहां पर जन रक्षा यात्रा आयोजित की थी. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और तमाम दूसरे नेता इसमें पहुंचे थे.

केरल के बारे में सबसे दिलचस्प तथ्य है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यहां सबसे ज्यादा शाखाएं हैं, लेकिन राज्य विधानसभा में भाजपा का सिर्फ एक विधायक है. भाजपा इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रही है. पार्टी हिंदूवादी संगठन श्री नारायण धर्मा परिपालना संघम योगम (एसएनडीपी) के साथ मिलकर राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ चुकी है और इसका उसे फायदा भी हुआ है. इन चुनावों में भाजपा ने सीटें तो ज्यादा नहीं जीतीं, लेकिन उसका वोट प्रतिशत 2015 में 12 से उछलकर 18 फीसदी तक पहुंच गया. 2016 में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी ने सीट तो सिर्फ एक ही जीती, लेकिन उसका मतप्रतिशत बीते चुनावों के छह फीसदी से उछलकर 10.6 फीसदी पर पहुंच गया. सात सीटों पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही.

सूत्रों के मुताबिक शाह ने कार्यकर्ताओं को ‘केरल की राजनीति का हिंदूकरण करने और यहां के हिंदुओं का राजनीतिकरण’ करने की सलाह दी है. माना जा रहा है कि पार्टी केरल में इस रणनीति को आगे बढ़ाने के लिए टीपू सुल्तान के नाम का इस्तेमाल कर सकती है.

संयोग के कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज यहां एकबार फिर भाजपा के पक्ष में जाते हैं. टीपू सुल्तान ने केरल के मालाबार क्षेत्र में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन करवाया था और इसकी पुष्टि खुद उसके लिखे पत्रों से होती है. जैसे 19 जनवरी, 1790 को बुरदुज जमाउन खान को एक पत्र में टीपू सुल्तान ने लिखा है, ‘क्या आपको पता है कि हाल ही में मैंने मालाबार पर एक बड़ी जीत दर्ज की है और चार लाख से ज्यादा हिंदुओं का इस्लाम में धर्म परिवर्तन करवाया है?’

ऐसा ही एक पत्र 18 जनवरी, 1790 को सैय्यद अब्दुल दुलाई को लिखा गया है. इसमें टीपू सुल्तान ने बताया है कि कालीकट के तकरीबन सभी हिंदू इस्लाम में आ चुके हैं और कोचीन राज्य की सीमा के आसपास अभी कुछ हिंदू बचे हैं और वह उनका धर्म परिवर्तन करवाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ है. केरल के मालाबार, कोचीन और दूसरे इलाकों में टीपू सुल्तान की छवि आज भी एक दुर्दांत शासक की है और इन क्षेत्रों में पैठ जमाने की जुगत में लगी भाजपा इस छवि को भुनाने की कोशिश कर सकती है.

यदि कर्नाटक को छोड़ दें तो भाजपा अभी तक तमिलनाडु और केरल में कोई राज्य स्तरीय नेता पैदा नहीं कर पाई है. लेकिन फिलहाल टीपू सुल्तान के मसले पर ऐसा लग रहा है कि उसने वह चेहरा जरूर ढूंढ़ लिया है जिसे आगे करके वह इन राज्यों में अपने लिए वोटों का ध्रुवीकरण कर सकती है.