इतालो काल्विनो (1923-1985) इतालवी पत्रकार और लेखक थे. उनका एक परिचय यह भी हो सकता है कि जब आलोचक काजुओ इशिगुरो और ओरहान पामुक जैसे महान लेखकों की तारीफ करते हैं तो उसमें अक्सर एक पंक्ति जोड़ देते हैं : काल्विनो की छाप इन लेखको में साफ़ दिखाई देती है. उनका रचना संसार ऐसा है कि वहां प्रतिनिधि रचनाएं बताने जैसी सहूलियत नहीं है. जितना लिखा है सब प्रतिनिधि है. इतालो काल्विनो की मशहूर कहानी ‘मशरूम्स इन द सिटी’ का यह हिंदी अनुवाद युवा साहित्यकार चंदन पांडेय ने किया है.


कहीं दूर से शहर की तरफ आती हवा अपने साथ कई ऐसे तोहफे भी ले आती है जिन्हें वही देख और महसूस कर सकता है जिसकी रूह का मिजाज नाजुक हो. मिसाल के तौर पर नजले का शिकार कोई आदमी जिसे किसी दूसरे इलाके से उड़कर आई फूलों की बारीक धूल छींकने पर मजबूर कर देती है.

एक दिन, कौन जाने कहां से हवा का एक झोंका शहर की मेन रोड से सटी जमीन की एक पतली पट्टी तक कुछ बीज उड़ाकर ले आया और वहां मशरूम उग आए. सिवाय मार्कोवेल्दो नामक कामगार के, जिसे हर सुबह उसी जगह से ट्राम पकड़नी होती थी, उन पर किसी की नजर नहीं पड़ी.

मार्कोवेल्दो की शहर की जिंदगी में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. इश्तहारों की तख्तियां, ट्रैफिक की रंगीन बत्तियां, दुकानें, नियॉन लाइटों की रंगीनियां, या फिर पोस्टर चाहे कितनी ही होशियारी से बनाए गए हों, उन पर उठने की बजाय उसकी नजर कहीं दूर रेत के टीलों पर फिसलती दिखती. इसके उलट, डाल पर पीले होते किसी पत्ते या दीवार में फंसे किसी पंख पर उसकी निगाह झट से चली जाती थी. घोड़ों की पीठ पर बैठी ऐसी कोई किलनी न थी, तख्तों में कीड़ों का बनाया ऐसा कोई छेद न था, सड़क पर कुचली हुई अंजीर की ऐसी कोई छाल न थी, जिस पर मार्कोवेल्दो गौर न करता हो और जिसके बारे में सोचता न हो. वह मौसम के बदलाव, अपनी रूह की बेचैनी और अपने वजूद के बुरे हाल को हमेशा महसूस करता था.

रोज की तरह एक सुबह जब वह ट्राम का इंतजार कर रहा था जो उसे स्वाब एंड कम्पनी तक ले जाती जहां वह छोटे-मोटे काम करने वाला मजदूर था, तो मार्कोवेल्दो ने स्टॉप के नजदीक सड़क के किनारे पेड़ों के पास की पपड़ियाई और ऊसर जमीन पर कुछ अजीबोगरीब देखा. पेड़ों की जड़ों के पास मिट्टी के कुछ उभार बन गए थे जो जहां-तहां खुले हुए थे और उनके भीतर से एक गोल सी चीज बाहर झांक रही थी.

तस्मे कसने के बहाने झुककर उसने गौर से देखा, वे मशरूम थे. शहर के बीचो-बीच उग रहे सचमुच के मशरूम ! मार्कोवेल्दो को अपने इर्द गिर्द की धूसर और उदास दुनिया इन छिपे खजानों के साथ अचानक उदार दिखने लगी. उसे लगा, रोज की दिहाड़ी और भत्ते के अलावा भी जिंदगी से कुछ उम्मीद रखी जा सकती है.

उस दिन काम पर वह आम दिनों से ज्यादा खोया-खोया रहा. लगातार यही सोचता रहा कि इधर वो सामान की ढुलाई में लगा है और उधर जमीन के भीतर अंधेरे में मिट्टी से खुराक पाते मशरूम, जिनके बारे में सिर्फ वही जानता है, बढ़ते हुए जमीन से ऊपर झांक रहे होंगे. उसने अपने आप से कहा, ‘एक रात की बारिश ही इनके तैयार होने के लिए काफी होगी.’

मार्कोवेल्दो अपनी इस खोज के बारे में पत्नी और बच्चों को बताने से खुद को रोक न सका. रात को जब परिवार किसी तरह पूरा पड़ने वाले अपने खाने में मशूगल था, उसने कहा, ‘सुनो, एक हफ्ते के भीतर हमारी मशरूम की दावत होगी. भुने हुए मशरूम. पक्की बात.’

मार्कोवेल्दो के छोटे बच्चों को पता नहीं था कि मशरूम क्या बला है, सो उसने हुलस कर उन्हें मशरूम की अलग-अलग किस्मों की खासियतों के बारे में बताया. यह भी कि उनका स्वाद कैसा होता है और उन्हें कैसे पकाया जाना चाहिए. बात इतनी बढ़ गई कि अब तक अन्यमनस्क दिख रही उसकी पत्नी की भी इसमें दिलचस्पी जग गई.

‘कहां हैं ये मशरूम. कहां उगते हैं ये?’, बच्चों का सवाल था.

मार्कोवेल्दो के उत्साह पर इस सवाल ने जैसे घड़ों पानी डाल दिया. उसने सोचा, ‘अगर मैं इन्हें जगह बता दूं तो कहीं ये अपनी शैतान टोली के साथ वहां जाकर मशरूम न खोजने लगें. बात फैल जाएगी और आखिरकार वो मशरूम पड़ोसियों की कड़ाही में तले जाएंगे.’ इस खोज ने तुरंत उसके दिल में दुनिया के लिए प्रेम छलका दिया था. लेकिन इसकी जगह अब जलन और आशंका ने ले ली. मार्कोवेल्दो के मन में डर बैठ गया कि कहीं उन मशरूमों पर किसी और की नजर न पड़ जाए.

‘मशरूम कहां हैं, यह सिर्फ मैं जानता हूं और खबरदार जो कहीं इस बात की चर्चा की’, उसने बच्चों से कहा.

अगली सुबह, ट्राम स्टॉप तक जाते हुए मार्कोवेल्दो आशंकित था. वह झांकने के लिए जमीन तक झुका और उसे यह देखकर तसल्ली हुई कि मशरूम ज्यादा तो नहीं पर यकीनन थोड़ा बढ़े हैं और अब भी वे काफी हद तक मिट्टी से ढके हैं.

झुके-झुके ही मार्कोवेल्दो ने महसूस किया कि उसके पीछे कोई खड़ा है. एक झटके में खड़े होते हुए उसने खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश की. वह सड़क की सफाई करने वाला था जो अपनी झाड़ू पर झुका हुआ मार्कोवेल्दो को देख रहा था.

ये अमादिगि था. जहां मशरूम उग रहे थे उस जगह की सफाई का जिम्मा छरहरे और चश्मा लगाने वाले अमादिगी के पास ही था. मार्कोवेल्दो उसे शुरू से ही नापसन्द करता था. इसकी वजह शायद उसका चश्मा था जिसकी मदद से अमादिगि सड़क के कोने अंतरों से प्रकृति के सूक्ष्मतम अंशों को ढूंढकर अपने झाड़ू से बुहार देता था.

शनिवार की आधी छुट्टी मार्कोवेल्दो ने उसी जगह के नजदीक टहलते हुए बिताई. थोड़ी दूर से वह अमादिगि और मशरूमों पर निगाह गड़ाए रहा और साथ में हिसाब लगाता रहा कि मशरूमों के पकने में कितनी देर है.

उस रात बारिश हुई. उन किसानों की तरह, जो महीनों के सूखे के बाद बारिश की शुरुआती बूंदों से जगते हैं और खुशी से उछलने लगते हैं, मार्कोवेल्दो भी बिस्तरे पर बैठ गया और अपने बीवी-बच्चों को आवाज लगाते हुए कहने लगा, ‘बारिश हो रही है. बारिश हो रही है.’ वह बाहर से आती सोंधी गन्ध को अपने भीतर महसूस करता रहा.

अगला दिन इतवार का था. पौ फटते ही मार्कोवेल्दो उधार मांगी गई एक टोकरी और बच्चों के साथ मशरूमों वाली जगह तक पहुंचा. छाते की तरह सीधे तने मशरूम गीली जमीन पर फैले हुए थे. “हुर्रे..”, वे चिल्लाए और जितनी तेजी से मुमकिन हो सकता था उन्हें बटोरने लगे.

‘पापा देखो, उस आदमी के पास कितने सारे हैं.’, मिशेलिनो ने कहा और उसके पिता ने उड़ती निगाह से अपने पास खड़े अमादिगि को देखा. वह भी मशरूमों से भरी एक टोकरी लिए हुए था.

‘अच्छा तो तुम भी इन्हें जमा कर रहे हो ?’, अमादिगि ने कहा, ‘तो क्या ये खाने लायक हैं? कुछ मैंने भी जमा किए हैं पर निश्चिंत नहीं था...सड़क से थोड़ी दूर ढेर सारे और उगे हुए हैं, इनसे भी बड़े... ठीक है. अब मुझे मालूम हो गया है, मैं चलता हूं अपने जानने वालों को भी बता दूं जो अब तक इसी बहस में उलझे हैं कि इन्हें तोड़ना चाहिए या नहीं...’ और वह जल्दी-जल्दी लंबे डग भरता हुआ चला गया.

मार्कोवेल्दो अवाक रह गया. इससे भी बड़े मशरूम मौजूद हैं जिनके बारे में उसे पता नहीं था और जो उसे नहीं मिलेंगे और यह ठीक उसकी नाक के नीचे होगा! एक क्षण के लिए वह गुस्से और उत्तेजना से पागल सा हो गया, परंतु- जैसा कि कभी-कभी होता है उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भरभराकर एक उदार आवेग में बदल गई. मौसम नम था और बारिश के आसार बने हुए थे. सो तमाम लोग अपनी छतरियां लेकर ट्राम का इंतजार कर रहे थे. ‘भाइयो, क्या आप आज रात भुने मशरूम खाना चाहेंगे’, मार्कोवेल्दो ने स्टॉप की भीड़ को आवाज लगाते हुए कहा, ‘ सड़क किनारे मशरूम उगे हुए हैं ! ढेर सारे मशरूम ! मेरे साथ आइये.’ और वह लोगों की भीड़ लिए अमादिगि के पीछे चल पड़ा.

सबने भरपूर मशरूम बटोरे. जिनके पास टोकरियां नहीं थीं उन्होंने अपनी छतरियां खोल लीं. किसी ने कहा, ‘सभी साथ मिलकर बड़े भोज का आयोजन करते तो गजब होता.’ लेकिन इसकी बजाय लोगों ने अपने अपने हिस्से के मशरूम बटोरे और घर की ओर निकल लिए.

हालांकि, जल्द ही सब एक दूसरे से मिले. उसी शाम को और अस्पताल के एक ही वार्ड में जहां उनके शरीर में फैले जहर का इलाज हुआ था. हालांकि मामला कम में ही निपट गया क्योंकि लोग ज्यादा मशरूम नहीं खा पाए थे.

मार्कोवेल्दो तथा अमादिगि की चारपाई आजू-बाजू ही थी. दोनों त्योरियां चढ़ाए एक दूसरे को घूरते रहे.