साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हेनरिख बोल (1917-1985) जर्मनी के प्रमुख लेखकों में रहे हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की त्रासदी को दर्ज करना इनकी अनूठी उपलब्धि रही. इनकी प्रमुख किताबें हैं : ग्रुप पोर्ट्रेट विद लेडी, द लॉस्ट ऑनर ऑफ कैथरीना ब्लूम, मुर्केज कलेक्टेड साइलेंसेज, द सेफ्टी नेट. बोल की मशहूर कहानी ‘द लाफर’ का यह हिंदी अनुवाद युवा साहित्यकार चंदन पांडेय ने किया है.


जब कोई मुझ से मेरा पेशा पूछता है तो मैं मुश्किल में पड़ जाता हूं. अपने संयत स्वभाव के बावजूद घबराकर हकलाने लगता हूं. मुझे ऐसे लोगों से ईर्ष्या होती है जो कह सकते हैं : मैं राज मिस्त्री हूं. नाइयों, किताब की दुकान वालों और लेखकों की सहज स्वीकृति भी मेरे जलन का सबब है. ये लोग बगैर किसी व्याख्या के स्वपरिभाषित हैं जबकि मुझे कई सवालों का सामना करना होता है, अगर मैं कहूं, ‘मैं हंसोड़ हूं.’ यह स्वीकारोक्ति अगले की भी मांग करती है क्योंकि अगला सवाल दनदनाता हुआ आता है, ‘तो क्या यही तुम्हारे जीवनयापन का साधन है?’ बिलाशक, ‘हां.’

दरअसल, मैं इसी से गाढ़ी कमाई कर लेता हूं. पेशेवराना अंदाज में कहें तो – मेरी हंसी की बड़ी मांग है. हंसोड़पने में मेरा अनुभव गहरा है, कोई दूसरा मुझ- सा हंसनेवाला नहीं है, ना ही किसी को हंसी की इस कला की बारीकियों का मेरे जैसा भान है.

बेतुकी व्याख्या से बचने के लिए एक लंबे अरसे तक मैं खुद को अभिनेता कहता रहा, लेकिन ‘डायलॉगबाजी’ और नकलचीपने में मेरी काबिलियत इतनी कम थी कि अभिनेता की उपाधि मुझे सच्चाई से कोसों दूर लगी. चूंकि सच्चाई मुझे प्रिय है और सच ये है कि मैं हंसोड़ हूं.

मैं न तो हास्य अभिनेता हूं और ना ही जोकर. सनद रहे कि मैं लोगों को खुशमिजाज नहीं बनाता. मैं बस खुशमिजाजी का माहौल रचता हूं. एक तरफ मैं यूनानी शहंशाह की तरह हंसता हूं तो दूसरी तरफ स्कूल जाते मासूम बच्चे की तरह. सत्रहवीं शताब्दी की हंसी भी मुझे उतनी ही घरू लगती है जितनी उन्नीसवीं सदी की. और अगर मौके की मांग हो तो मैं समूची सदियों की, हर वर्ग की और उम्र के सभी पड़ावों की हंसी हंस सकता हूं. दरअसल हंसने में मेरी कुशलता वैसे ही है जैसे जूतों की मरम्मत-मजम्मत करने में मोची की. अपने सीने में मैंने अमरीकी हंसी, अफ्रीकी हंसी, गोरी, लाल, पीली - हर तरह की हंसी को पनाह दे रखी है . उम्दा मेहनताना मिलते ही मैं निर्देशक की लय पर इस हंसी को अपने सीने से परत दर परत निकालता हूं.

मैं अनिवार्य-सा हो चुका हूं; मैं रेडियो पर हंसता हूं, टेप में हंसता हूं, और दूरदर्शन के निर्देशक मेरे साथ तमीज से पेश आते हैं. मैं दुखभरी, संयमित और उन्मादी, हर तरह की हंसी हंस लेता हूं. मैं बस कंडक्टर या किराना दुकान के नौकर की तरह भी हंस लेता हूं; निशाचरी हंसी, भोर की हंसी, डूबती शाम की हंसी, गोधूलि की हंसी... कुल मिलाकर मैं यह कहना चाहता हूं कि जब भी और जहां भी हंसी चाहिए होती है – मैं उस जरूरत को पूरी करता हूं.

यह बताने की जरूरत शायद ही हो कि यह पेशा थका देने वाला है, खासकर तब जब मुझे छूत की तरह फैलने वाली हंसी की इस कला में महारत हासिल है. लेकिन इसने मुझे तीसरे या चौथे दर्जे का मसखरा भी बना दिया है जिन्हें भय होता है, और जो सही भी है कि कहीं उनका मुख्य संवाद दर्शक दीर्घा में अनसुना न रह जाए. इसलिए मैं क्लब के कार्यक्रमों में सहयोगी की भूमिका निभाता हूं. मेरा किरदार कार्यक्रम के कमजोर हिस्से में जोरदार हंसी हंसने का होता है. इस हंसी का समय माकूल होना चाहिए, मेरी दिल से निकली और गरजती हुई हंसी न तनिक जल्द आ सकती है और ना ही जरा देर से. तयशुदा क्षण में जैसे ही मेरी हंसी छूटती है, समूची दर्शकदीर्घा ठहाकों में डूब जाती है और इस तरह चुटकुला काम कर जाता है.

पर जहां तक मेरा मामला है, थका मांदा मैं खुद को ग्रीन रूम तक खींचता हूं, इस खुशी में अपना कोट उठाता हूं कि चलो आज का दिन खत्म हुआ और अब घर जाना है. घर पर मेरा इंतजार कुछ ऐसे टेलीग्राम कर रहे होते हैं : ‘आपकी हंसी चाहिए, तुरंत. रिकॉर्डिंग मंगलवार को है.’ और कुछ ही घंटो बाद मैं अपनी किस्मत कोसते हुए भीषण गर्मी भरी किसी रेलगाड़ी में सफर कर रहा होता हूं.

शायद ही यह बताने की जरूरत हो कि रोज के काम के बाद या छुट्टियों के दौरान मेरा हंसने का जी नहीं होता : ग्वाले कुछ पल के लिए खुश तभी हो पाते हैं जब अपने मवेशियों को भूल सकें, राज मिस्त्री की खुशी गारे और सीमेंट के मसाले को भूलने में छिपी है, बढ़इयों के घर में दरवाजे अक्सर किसी टूटफूट का शिकार मिलते हैं या ऐसी दराजें मिलती हैं जिन्हें खोलना मुश्किल भरा काम हो. हलवाई अचार के मुरीद मिलते हैं तो कसाई बादाम की मिठाई के और बेकरी के कारोबारी कबाब पसंद करते हैं; सांडो से लड़ने वाले शौकिया तौर पर कबूतर पालते हैं, मुक्केबाज अपने बच्चों की नाक से निकलता जरा-सा खून देख कर पीले पड़ जाते हैं : मुझे ये सारी बातें सहज जान पड़ती हैं क्योंकि ‘ड्यूटी’ के बाद मैं कभी नहीं हंसता. मैं गंभीर इंसान हूं और लोग–शायद ये सच भी है - मुझे निराशावादी मानते हैं.

अपनी शादी के पहले कुछ वर्षों तक मेरी पत्नी अक्सर मुझ से कहती थी : ‘हंसो ना!’ लेकिन फिर उसे भी यह एहसास हो गया कि मैं उसकी यह ख्वाहिश पूरी नहीं कर सकता. जब भी मुझे नितांत एकांत में अपने चेहरे की मांसपेशियों को और आत्मा के तनाव को ढीला छोड़ने का मौका मिलता है मुझे खुशी होती है.

दूसरों की हंसी भी मेरी मन-मस्तिष्क में खटके की तरह लगती है क्योंकि इससे मुझे अपने पेशे की याद आ जाती है. हमारा वैवाहिक जीवन शांतिपूर्वक बीत रहा है क्योंकि मेरी पत्नी भी हंसना भूल चुकी है : जब कभी मैं उसे मुस्कुराते हुए पाता हूं, मैं भी जवाब में मुस्कुरा देता हूं. हमारा आपसी संवाद भी धीमी आवाज में होता है क्योंकि नाइट क्लबों के शोर को मैं नापसंद करता हूं और उस शोर को भी जो कभी-कभी रिकॉर्डिंग स्टूडियो में भर जाता है. जो लोग मुझे नहीं जानते वे मुझे चुप्पा समझते हैं. यह सच भी हो सकता है क्योंकि अक्सर मुझे हंसने के लिए ही मुंह खोलना पड़ता है.

अगर कुछेक मुस्कुराहटों को बिसरा दूं तो मेरा समूचा जीवन भावशून्य कट रहा है. मैं अक्सर खुद को इसबात पर चकित पाता हूं कि मैं कभी हंसा भी हूं या नहीं. मेरे ख्याल में : नहीं. अपने सभी भाई-बहनों की स्मृति में मैं बेहद गंभीर इंसान की शक्ल में दर्ज हूं.

मैं कई तरह से हंसता तो हूं लेकिन मैंने अपनी ही हंसी को कभी नहीं सुना.