‘मां’ नाम के इस वृत्तचित्र में अपनी सरकार, अपने किये का गुणगान करने की बजाय इंदिरा गांधी अपने परिवार, दोनों बेटों और थोड़ा राहुल के बारे में भी बता रही हैं कि वे बचपन में बिजली की चीजें ठीक किया करते थे. जाहिर सी बात है कि एक मां, दादी, बेटी और पोती अपने पुत्र, पोते, पिता और दादा के बारे में अच्छी-अच्छी बातें ही कर सकती है तो वैसा ही इस वीडियो में इंदिरा गांधी भी कर रही हैं.

लेकिन फिर भी इस वीडियो से नेहरू गांधी परिवार के सामान्य होने का एक अपरिचित सा अनुभव जरूर होता है जब इंदिरा बताती हैं कि उनके पिता मानते थे कि सुबह डटकर खाकर ही अपने घर से निकलना चाहिए. या फिर राजीव गांधी को नाश्ते में दलिया खाने की आदत थी. या फिर जब वे साफ-साफ पुत्रमोह के फेर में कहती हैं कि एक पायलट के तौर पर राजीव गांधी के बारे में काफी लोग उनसे कहते हैं कि उनके जहाज उड़ाने की बात ही कुछ और है. या फिर जब वे बताती हैं कि राजीव गांधी गिल्ली-डंडा जैसे देहाती खेल भी खेला करते थे और अपना कमरा खुद साफ किया करते थे.

इस वीडियो को कई लोग नेहरू-गांधी परिवार के प्रोपेगेंडा के तौर पर भी देख सकते हैं (जोकि यूट्यूब पर इसपर की गईं कई टिप्पणियों से भी स्पष्ट है) क्योंकि इसे जब भी जारी किया गया था, कांग्रेस महासचिव चंदूलाल चंद्राकर द्वारा जारी किया गया था. लेकिन ढूंढ़ने-समझने-देखने वाले इसमें कुछ पा भी सकते हैं.

उदाहरण के तौर पर आज बेहद कामचलाऊ या कहें कि एक हद तक गलत हिंदी बोलने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदी भाषा का सबसे अच्छा वक्ता माना जाता है. 10 साल पहले सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम था, जोकि सही तो था लेकिन उनकी हिंदी में उच्चारण की शुद्धता की बजाय उसके प्रभावी होने पर जोर ज्यादा था. इसके उलट इस साक्षात्कार में इंदिरा गांधी जिस नफासत से हिंदी बोलती हैं, हिंदी कुछ और अपनी लगने लगती है.

अगर किसी और चीज के लिए नहीं तो 35 साल पहले से आज तक देश के सबसे बड़े सुपरस्टार रहे अमिताभ बच्चन के शानदार नरेशन के लिए भी इस डॉक्यूमेंटरी को देखा जा सकता है. वे कमलेश पांडेय की लिखी स्क्रिप्ट में गुंथे सवालों को इस तरह से हमारे सामने रखते हैं (डॉक्यूमेंटरी में इंदिरा जी के सामने ये सवाल कोई और शख्स करता है) कि अमिताभ की बाकी विराटता के परे सिर्फ उनकी आवाज और उसकी अदायगी से ही इश्क होने लगता है.

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