इतालो काल्विनो (1923-1985) इटली के पत्रकार और लेखक थे. उनका एक परिचय यह भी हो सकता है कि जब आलोचक काजुओ इशिगुरो और ओरहान पामुक जैसे महान लेखकों की तारीफ करते हैं तो उसमें अक्सर एक पंक्ति जोड़ देते हैं : काल्विनो की छाप इन लेखकों में साफ दिखाई देती है. उनका रचना संसार ऐसा है कि जहां प्रतिनिधि रचनाएं बताने जैसी सहूलियत नहीं है. जितना लिखा है सब प्रतिनिधि है. उनके कहानी संग्रह ‘नंबर्स इन दि डार्क’ में शामिल इस चर्चित कहानी ‘दि ब्लैक शीप’ का यह हिंदी अनुवाद युवा साहित्यकार चंदन पांडेय ने किया है.


यह किसी ऐसे देश की बात है जहां सब के सब चोर थे. रात घिरते ही हर कोई नकली चाबियों और मद्धिम जलती लालटेनों के साथ घर से निकलता और किसी पड़ोसी के घर में चोरी कर लेता. चोरी के सामान से लदेफदे, भोर के समय जब वो अपने घर आते तो देखते कि उनका अपना घर ही लूटा जा चुका है. इस तरह सब सुख-शान्ति से रह रहे थे. किसी को कोई नुकसान नहीं था क्योंकि पहला दूसरे से चुरा रहा था, दूसरा तीसरे से, तीसरा चौथे से और इस तरह आप उस आखिरी आदमी तक पहुंच सकते थे जिसने पहले के घर पर हाथ साफ किया हो.

इस देश की व्यापारिक गतिविधियों में, खरीदनेवाले और बेचनेवाले, दोनों की तरफ से धोखाधड़ी अनिवार्य शर्त थी. उस देश की सरकार एक आपराधिक संगठन थी जो अपने देशवासियों से खुलेआम चोरी करती थी और अपनी तरफ से देशवासी भी सरकार को चूना लगाने से बाज नहीं आते थे. इस तरह सबका जीवन कट रहा था. न कोई अमीर था और ना ही कोई गरीब.

एक दिन, हमें नहीं मालूम कि कैसे, यूं हुआ कि एक ईमानदार शख्स इस देश में गुजर-बसर करने चला आया. रात में बोरे, चाबियां और लालटेन लेकर निकलने के बजाय वह सिगरेट पीने और उपन्यास पढ़ने के लिए घर पर ही रुकता था.

चोर आए, इस घर में रौशनी देखी तो भीतर गए ही नहीं.

कुछ दिन तक यह सिलसिला चलता रहा. तब सब मिलकर उस अजनबी को समझाने-बुझाने गए कि अगर वो बिना कुछ किए धरे जीना चाहता है तो जिए, लेकिन यह तो कोई ऐसी वजह नहीं कि दूसरों को भी अपना काम करने से रोका जाए. हर रात उसके घर पर रहने का एक मतलब यह था कि अगले दिन एक न एक परिवार भूखा रहता.

ऐसे तर्कों के आगे वह ईमानदार नतमस्तक हो गया. रात को बाहर रहने और अलसुबह वापस आने की बात तो उसने स्वीकार ली लेकिन चोरी करने से इनकार कर दिया. वह ईमानदार था, इसमें आपकी और हमारी क्या गलती है. वह हद से हद पुल तक जाता और नीचे बहते पानी को सारी रात देखता. जब वह घर लौटता, पाता कि लूट हो चुकी है.

हफ्ते से भी कम समय में वह आदमी पाई-पाई को मोहताज हो गया. सारा घर इस तरह खाली हुआ कि उसके पास खाने तक के लिए कुछ न बचा. लेकिन यह कोई समस्या नहीं थी क्योंकि यह सब उसका ही किया धरा था; असल मुश्किल यह थी कि उसके व्यवहार से सारा कारोबार उलट-पलट गया. चूंकि उसने खुद कुछ चुराए बिना अपना सारा असबाब चोरी होने दिया इसलिए हर सुबह एक न एक शख्स, अपने हिस्से की चोरियां करते हुए घर लौटता और पाता कि उसके घर का सामान अनछुआ ही पड़ा है. यह वो घर होता था जिसमें कायदे से उस ईमानदार आदमी को सेंध लगानी होती थी. अब जिसके यहां चोरी नहीं हुई उसी पल वह आदमी दूसरों से अमीर हो जाता था.

इस नए अमीर की चोरी वाली इच्छाएं भी जाती रहीं. मामले तब और बिगड़ते गए जब ईमानदार आदमी के घर चोरी करने गए लोग, कुछ न पाकर खाली हाथ लौटने लगे; अब वो गरीब होते जा रहे थे.

इसी बीच, जो नवधनाढ्य लोग थे वो रात के वक्त ईमानदार आदमी की तरह पुल तक जाने लगे थे और देर तक उसके नीचे बहते पानी को देखते थे. इन हरकतों से दुविधा बढ़ती गई क्योंकि इसका मतलब यह था कि बहुत से लोग अमीर होते जा रहे थे और बहुत से गरीब.

ऐसे में, अमीरों को लगा कि हर रात पुल पर जाते रहे तो जल्द ही वो गरीब हो जाएंगे. फिर उन्होंने सोचा, ‘कुछ गरीबों को पैसे पर रख लेना चाहिए जो हमारे बदले चोरियां कर सकें.’ मिलजुल कर उन्होंने दस्तावेज तैयार किए, तनख्वाहें तय कीं, हिस्से तय किए. लेकिन चोर तो वो अब भी थे इसलिए हमेशा एक दूसरे को छलने की कोशिश में लगे रहे. फिर भी, जैसा कि होता आया है, जो अमीर थे वो अमीर से अमीरतर होते गए और जो गरीब थे वो गरीब से गरीबतर होते गए.

कुछ रईस तो इस कदर रईस हो गए कि अमीर बने रहने के लिए उन्हें न तो खुद चोरी करने की जरूरत थी न ही चोरी करवाने की. लेकिन अगर वो चोरियां बंद कर देते तो गरीब हो जाते क्योंकि बाकी के गरीब तो लगातार चोरी कर रहे थे. इसलिए उन्होंने सबसे ज्यादा गरीब लोगों को इस बाबत तनख्वाह देना शुरू कर दीं ताकि वो अन्य गरीबों से उनकी सम्पति की सुरक्षा कर सकें. इसका असर यह हुआ कि पुलिस थानों और जेलखानों का निर्माण शुरू हो गया.

इस तरह, उस ईमानदार आदमी के दृश्यपटल पर आने के कुछ ही वर्षों में हाल ऐसा हो गया कि लोग अब लूटने और लुटे जाने की बात करना छोड़, सिर्फ अमीर और गरीब की बात करने लगे. लेकिन अब भी वो सब चोर ही थे.

इकलौता ईमानदार वही था जो शुरू-शुरु में यहां आया था और वह जल्दी से भी जल्दी, भूख की वजह से मर गया था.