जलवायु परिवर्तन को लेकर 2015 में हुए पेरिस समझौते से अमेरिका हाथ पीछे खींच चुका है. इस अहम समझौते में औसत वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री से कम रखने पर सहमति बनी है. बल्कि कोशिशें होनी हैं कि इस बढ़ोतरी को 1.5 डिग्री तक ही सीमित कर दिया जाए.

लेकिन सम्मेलन से पहले इन 185 देशों ने पर्यावरण से जुड़े जो कदम उठाने का वादा किया था उन्हें देखते हुए पहले ही कहा जाने लगा था कि तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री से कम रखने का यह लक्ष्य संभव नहीं लगता. अब तो दुनिया के दूसरे सबसे बड़े प्रदूषणकारक देश अमेरिका ने इस समझौते से पीछे हटने का ऐलान ही कर दिया है. जानकार मान रहे हैं कि अब तापमान में बढ़ोतरी का यह आंकड़ा 2.7 डिग्री पर जाकर ठहरेगा.

पिछले चार साल यानी 2014, 2015, 2016 और 2017 धरती पर अब तक के सबसे गर्म साल रहे हैं. कोई हैरत नहीं कि 2018 और आगे निकल जाए. जानकारों के मुताबिक पूरी संभावना है कि वैश्विक औसत तापमान में एक डिग्री की बढ़ोतरी हो चुकी है.

दुनिया में हर जगह औसत तापमान में बढ़ोतरी महसूस की जा रही है. यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशिया में लू की घटनाओं का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है.

ग्लोबल वार्मिंग का अभी हम पर क्या असर हो रहा है? इन आंकड़ों का धरती के लिए क्या मतलब है? हम अभी ही यह महसूस कर सकते हैं. दो डिग्री बढ़ोतरी के खतरनाक रास्ते का आधा सफर पूरा हो चुका है. दुनिया में हर जगह औसत तापमान में बढ़ोतरी महसूस की जा रही है. यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और एशिया में लू की घटनाओं का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है.

मौसम बदल रहा है, यह भारी बरसात की घटनाओं से भी समझा जा सकता है जिनमें बीते कुछ समय के दौरान लगातार बढ़ोतरी हुई है. वैश्विक स्तर पर देखें तो 1980 से 2010 के दौरान रिकॉर्डतोड़ बरसात की घटनाएं सामान्य से 12 फीसदी ज्यादा रहीं. बढ़ोतरी का यह आंकड़ा दक्षिण पूर्व एशिया में 56 फीसदी तक रहा जबकि यूरोप में यह 31 और मध्य अमेरिका में 24 फीसदी रहा. ग्लोबल वार्मिंग के चलते बारिश में बढ़ोतरी की जो आशंकाएं जताई जाती हैं उनसे भी ये आंकड़े मेल खाते हैं. गर्मी ज्यादा होगी तो समुद्र से ज्यादा भाप भी उठेगी और इसके चलते एक छोटी अवधि में ही किसी जगह पर भारी बरसात और अचानक बाढ़ की संभावना बढ़ेगी. इस संदर्भ में जून, 2013 की केदारनाथ त्रासदी को याद किया जा सकता है जब तीन दिन तक हुई लगातार बारिश ने हजारों लोगों की बलि ले ली थी.

पानी से उपजने वाला संकट सिर्फ यही नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि आर्कटिक महासागर में सितंबर के महीने के दौरान रहने वाली बर्फ में 1979 से लेकर 2015 तक हर दशक 13.4 फीसदी के हिसाब से कमी हुई है.पानी का तापमान बढ़ने पर वह फैलने और नतीजतन ज्यादा जगह घेरने लगता है. वैज्ञानिक भाषा में इसे थर्मल एक्सपैंशन या तापीय प्रसार कहते हैं. तापमान में बढ़ोतरी और ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका में मौजूद बर्फ के ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से बीते 100 साल में समुद्र का स्तर करीब 20 सेंटीमीटर ऊपर उठ चुका है. बढ़ोतरी की यह दर तीन मिमी प्रति वर्ष तक आ चुकी है. आगे क्या? सच यह है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों या पर्यावरण को बिगाड़ने वाले दूसरे कारकों को साल 2000 के स्तर पर ही रोक दिया जाता तो भी इस सदी के आखिर तक वैश्विक औसत तापमान में करीब 1.5 डिग्री की बढ़ोतरी अवश्यंभावी थी. अगर हम अब भी अपना व्यवहार न बदलें तो संभावना है कि सदी के आखिर तक यह आंकड़ा तीन से पांच फीसदी तक जा सकता है.

अध्ययन बताते हैं कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी से दुनिया में सभी जगह पारे में बढ़ोतरी के रिकॉर्ड तोड़ने वाले दिन बढ़ेंगे. दो डिग्री की बढ़ोतरी होने पर आज की तुलना में ऐसे दिनों की तुलना में पांच गुना ज्यादा बढ़ोतरी हो जाएगी.

ग्रीनहाउस गैसों को साल 2000 के स्तर पर ही रोक दिया जाता तो भी इस सदी के आखिर तक वैश्विक औसत तापमान में करीब 1.5 डिग्री की बढ़ोतरी अवश्यंभावी थी.

इसके साथ ही बाढ़ का जोखिम भी बढ़ जाएगा. आज मौसम से जुड़ी घटनाओं में बाढ़ एक ऐसी त्रासदी है जो हर साल बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर करती है. आंकड़े बताते हैं कि 2008 से 2014 के दौरान हर साल औसतन ढाई करोड़ लोगों को बाढ़ के चलते पलायन करना पड़ा. अगर वैश्विक तापमान में दो के बजाय चार डिग्री की बढ़ोतरी हो जाए तो इस तरह के लोगों का आंकड़ा दो गुने से भी ज्यादा हो सकता है. यह तब है जब हम जनसंख्या में बढोतरी का आंकड़ा छोड़ रहे हैं.

अगर यह बढ़ोतरी दो डिग्री तक ही रही तो भी भूमध्यसागर से सटे इलाकों में पानी की उपलब्धता में 50 फीसदी तक की कमी हो सकती है. वैश्विक स्तर पर तापमान में अतिरिक्त बढ़ोतरी से ऐसे लोगों की संख्या में 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है जो पानी के अभाव से जूझ रहे हैं.

इसके साथ ही यह भी आशंका है कि समुद्र का स्तर सदियों तक बढ़ता रहेगा. इस सदी के आखिर तक वैश्विक तापमान को दो डिग्री तक सीमित कर देने पर भी समुद्र का स्तर 0.26 से 0.55 मीटर तक बढ़ सकता है. तापमान में चार डिग्री तक की बढ़ोतरी से यह आंकड़ा 0.45 से 0.82 मीटर तक जा सकता है. खतरे की घड़ी धरती का पर्यावरण नाम की व्यवस्था के कई कल-पुर्जे ऐसे हैं कि अगर तापमान एक सीमा के पार चला गया तो उनमें आने वाली गड़बड़ी को तापमान को स्थिर रखकर भी रोका नहीं किया जा सकेगा. कुछ पुर्जों के साथ ऐसा हो भी चुका है. हालिया अध्ययन बताते हैं कि अंटार्कटिका के पश्चिमी हिस्से में मौजूद बर्फ की चादर का कुछ हिस्सा शायद एक ऐसे दौर में दाखिल हो चुका है जहां अब उसे पिघलना ही है. अकेली यही घटना आने वाली सदियों के दौरान समुद्र का स्तर औसतन तीन मीटर ऊपर उठा सकती है.

कुल मिलाकर पर्यावरण में आने वाले इन बदलावों का असर व्यापक होगा. इनसे करोड़ों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है. यानी अब संभलने का समय है और बदलने का भी.

(कैत्जा फ्राइलर का यह लेख मूल रूप से वेबसाइट द कनवर्जेशन पर प्रकाशित हुआ है)