दर्शकों की जो चिट्ठियां मुझे आती हैं उन्हें पढ़कर मैं खुशी से कह सकता हूं कि फिल्म देखने वाला आम आदमी आज फिल्मों या फिल्मी सितारों को सिर्फ तमाशा नहीं समझता. उसे अब सिनेमा के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व का अहसास होने लगा है. आज का दर्शक प्रगतिशील फिल्मकारों को सम्मान देता है और मानता है कि उनका उत्साहवर्धन होते रहना चाहिए. इस देश के फिल्मोद्योग के लिए यह एक शुभ संकेत है. लोग अब किसी कलाकार के हेयरस्टाइल या कपडों के बजाय उसके किरदार में छिपे संदेश और आदर्श पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं. अगर ऐसा ही आगे भी होता रहा तो इसका नतीजा यह होगा कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री को सिर्फ सपने बेचने वाली फैक्ट्री के तौर पर नहीं देखा जाएगा. लोग इस बात को मानेंगे कि यह एक ताकत है जो उनकी सच्चाइयों को सामने रख रही है और देश के विकास को दिशा दे रही है.

कई साल से फिल्मकारों को ड्रीम मर्चेंट कहा जाता रहा है. मैं इस लेख के पाठकों को बताना चाहता हूं कि यह शब्द सिर्फ कुछ ही लोगों पर लागू होता है. जो लोग सपने बेचते हैं उनकी आंखें अक्सर हकीकत नहीं देख पातीं. जो लोग अपने चारों और फैली पीड़ा और गरीबी के बारे में जानते हैं, जिन्हें इस देश के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में फैली दुश्वारियों का अहसास है, जो वास्तव में जिंदगी को उसके असली रूप में परदे पर दिखाना चाहते हैं, वे कभी सपने नहीं बेचेंगे. ऐसे सपने जिन्हें पलायनवादी मनोरंजन कहना चाहिए.

हाल ही में मुझे पुरानी दिल्ली में सिनेमा के कुछ दर्शकों से रूबरू होने का मौका मिला. मैंने उनसे कहा कि वह समय आ गया है जब फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं समझी जाएंगी. हमारा देश लोकतंत्र है, सिनेमा देश का है और देश को चाहिए कि वह सिनेमा में सक्रिय रूप से दिलचस्पी ले और इसके विकास को सही दिशा में प्रोत्साहित करे.

मेरे श्रोता भी पूरी तरह इस बात से सहमत थे. मेरा उनके सामने आना एक तरह से एक नए दौर का भी प्रतीक था. उस दौर का जो जनता और कलाकार को करीब लाया है. आज लोग फिल्मकारों को वही आदर देते हैं जो और दूसरे क्षेत्रों की अगुवा हस्तियों को मिलता है. ऐसा उन निर्माता-निर्देशकों की वजह से हुआ है जो यथार्थवादी, प्रगतिशील और अपने समाज के प्रति सचेत थे. उनकी यह सोच उनकी फिल्मों में भी दिखी. अपने आदर्शों के लिए इन लोगों ने बॉक्स ऑफिस पर काफी जोखिम लिया. आज भारतीय फिल्मोद्योग को देश-विदेश में जो सम्मान मिला है वह इन्हीं कुछ लोगों की देन है जिन्होंने नई सोच के साथ नि:स्वार्थ भाव से काम किया.

राजनीतिक स्वतंत्रता के चलते आज फिल्म निर्माता के लिए यह संभव है कि वह अपने वक्त की भावनाओं को दिखाती फिल्में बनाए. उसे किस्से-कहानियां दिखाने की जरूरत नहीं. लेकिन क्या हम फिल्मकार इस आजादी का फायदा उठा सके हैं? कई निर्माता अपनी ही रची हुई दुनिया में जीते हैं और वे परदे पर भी काफी हद तक उसी दुनिया को उतारते हैं. हाल ही में कई ऐसी फिल्में आई हैं जो प्रगति के इस रथ का पहिया रोकने वाली हैं, जो न सिर्फ ‘कॉमन सेंस’ का मजाक उड़ाती हैं बल्कि नई पीढ़ी को इनसे कुछ भी हासिल नहीं होता. उनमें बस दिन में सपने देखते प्रेमी होते हैं जो नाचते-गाते हैं और ज्यादातर वक्त एक ऐसी जिंदगी जी रहे होते हैं जिसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं होता. अगर हमें बेचना ही है कम से कम उन्हें ऐसा कोई सपना बेचें जिसका कुछ मतलब निकलता हो या जो उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक हो.

मेरी पिछली फिल्म में हमने जनता को एक सपना बेचा था. यह सपना कि एक दिन आएगा जब शहरों में काम करने वाले मजदूर अच्छे और आरामदेह घरों में रहेंगे. यह सपना कि गलत काम कर रहे नौजवान सही राह चलकर अपना भविष्य खुशहाल बनाएंगे. वह एक ऐसे समाज का भी सपना था जहां सच्चाई और इंसाफ की जीत होगी और जिसमें आदमी की योग्यता का आधार यह नहीं होगा कि उसने कैसे कपड़े पहने हैं.

ऐसे सपनों को कोई गलत नहीं कह सकता. ये सपने ही हमारा जुनून हैं और हमने संकल्प लिया है कि हम आगे भी ऐसी ही फिल्में बनाते रहेंगे जो दर्शक को उस दुनिया के बारे में बता सकें जिसका सपना गांधी और नेहरू ने उसके लिए देखा है. ऐसी फिल्में जो सबको यह सपना हकीकत में बदलने के लिए प्रेरणा दे सकें.