पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी के बारे में कहा जाता है कि वे भारत के सबसे महंगे वकील हैं. सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल के साथ उन्होंने अरुण जेटली के मानहानि केस में एक रुपए लेकर अरविंद केजरीवाल की पैरवी करने से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी निराशा सहित तमाम मुद्दों पर बात की. बातचीत के संपादित अंशों का पहला भाग :

आप भारत के सबसे महंगे वकील माने जाते हैं. फिर वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा दायर किए गए मानहानि के सिविल और आपराधिक मुकदमे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पैरवी सिर्फ एक रुपये में करने का कारण?

देखिए, मेरे बारे में कहा जाता है कि मैं बहुत महंगा वकील हूं. लेकिन कई लोग नहीं जानते हैं कि मैं सिर्फ अपने 10 फीसदी क्लाइंटों से पैसा कमाता हूं. बाकी का काम निस्वार्थ है. मुफ्त में करता हूं. यह जरूर है कि मैं केजरीवाल से फीस नहीं ले रहा और इसकी वजह यह है कि उनकी सरकार खुद ही बहुत गरीब है. (ठहाका लगाते हैं)

आम आदमी पार्टी के नेताओं ने आपसे बात की या आपने उनसे?

मैं खुद किसी से बात नहीं करता. केजरीवाल ने मुझसे संपर्क किया था और मैंने फौरन कहा कि हां, मैं जरूर आपकी पैरवी करूंगा.

क्या आपने वे कागज देखे हैं जिनका संबंध दिल्ली जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) में भ्रष्टाचार के आरोपों से है?

हां.

अगर कोई कोई व्यक्ति उसके चारों तरफ चल रही गड़बड़ियों पर कोई कार्रवाई नहीं करता तो यह मानने की वजह बनती है कि वह सांठ-गांठ करके बैठा हुआ है.

तो आपको लगता है कि जेटली के डीडीसीए के अध्यक्ष रहने के दौरान फंड के दुरुपयोग के आरोपों को कानूनी रूप से साबित किया जा सकता है?

अगर एक आदमी ने पर्याप्त सावधानी बरती होती तो उसे पता चल जाता कि क्या गड़बड़ी है और फिर वह यकीनन इसे उजागर कर देता या फिर खुद को पूरी तरह से इससे दूर कर लेता. यह मानने का ठीक-ठाक कारण है कि जेटली ने जानबूझकर डीडीसीए में चल रहे फ्रॉड की तरफ से आंखें मूंद लीं. इससे आगे मैं कुछ नहीं कहना चाहता.

क्या यह असामान्य है कि कोई शख्स मानहानि के मामले में सिविल और आपराधिक, दोनों तरह के केस दायर करे?

हां, पहली बात, मुझे लगता है कि वे पहले उन बयानों पर रोक लगाने का आदेश लेने की कोशिश करेंगे जिनकी वे शिकायत कर रहे हैं. इसके लिए वे सिविल वाले मामले का इस्तेमाल करेंगे. वैसे भी उनकी इस मामले में इससे आगे बढ़ने की कोई इच्छा नहीं है.

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं?

मैं इस धंधे की सारी तरकीबें जानता हूं. जेटली को लगता है कि क्रिमिनल केस से वे अपने विरोधियों को डरा देंगे. मुझे उम्मीद है कि अब तक इस मोर्चे पर उनका मोहभंग हो चुका होगा. वैसे भी मानहानि के केस में शिकायत करने वाला ही आरोपी बन जाता है.

अगर अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि मानहानि का मामला नहीं बनता तो क्या होगा? क्या जेटली को भ्रष्टाचार का दोषी मान लिया जाएगा? या फिर यह निष्कर्ष निकालना ठीक होगा कि प्रथमदृष्टया उन पर भ्रष्टाचार का मामला बनता है?

जेटली को कम से कम इस्तीफा तो देना ही होगा. वैसे भी मैं उन्हें जेल में देखना नहीं चाहता. सार्वजनिक जीवन में ऐसे लोग नहीं होने चाहिए जो यह दावा न कर सकें कि उनका चरित्र पूरी तरह से साफ है.

पैनल भी नेताओं के खिलाफ जाने में डरते हैं, खासकर उनके खिलाफ तो ज्यादा ही जो रसूखवाले होते हैं. सिर्फ इससे, कि पैनल ने उनका नाम नहीं लिया, कोई फर्क नहीं पड़ता

भाजपा ने मांग की है कि जेटली पर लगाए आरोपों के लिए केजरीवाल को माफी मांगनी चाहिए. उसका तर्क है कि दिल्ली सरकार ने डीडीसीए में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए जो पैनल बनाया था, उसकी रिपोर्ट में जेटली या किसी अन्य का नाम नहीं है.

पैनल भी नेताओं के खिलाफ जाने में डरते हैं, खासकर उनके खिलाफ तो ज्यादा ही जो रसूखवाले होते हैं. सिर्फ इससे, कि पैनल ने उनका नाम नहीं लिया, कोई फर्क नहीं पड़ता. दूसरी बात यह है कि अगर कोई कोई व्यक्ति उसके चारों तरफ चल रही गड़बड़ियों पर कोई कार्रवाई नहीं करता तो यह मानने की वजह बनती है कि वह सांठ-गांठ करके बैठा हुआ है. भारत में जनता की भी एक अदालत है. आम आदमी एक वकील से ज्यादा समझता है. व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि जेटली ने एक बहुत गलत कदम उठाया है.

क्या उन्हें अदालत नहीं जाना चाहिए था. ये मामले ऐसे होते हैं जो आपको जनता की अदालत में ही लड़ने चाहिए.

उन्हें अदालत नहीं जाना चाहिए था. ये मामले ऐसे होते हैं जो आपको जनता की अदालत में ही लड़ने चाहिए.... जेटली को इस सबसे राजनीतिक रूप से ही निपटना चाहिए था.

तो अगर जेटली आपकी राय मांगते तो....

मैं कभी भी...कभी भी लोगों को अदालत जाने की सलाह नहीं देता. खासकर तब जब आपके सार्वजनिक जीवन का कोई ऐसा पहलू मौजूद हो जिस पर सवाल खड़े किए जा सकते हों. जेटली को इस सबसे राजनीतिक रूप से ही निपटना चाहिए था. आखिरकार भारत की जनता ही आप पर फैसला देती है.

क्या आप इस मसले पर केजरीवाल से मिले थे?

उनके मित्र मेरे घर पर आए थे. वे भी एक बार यहां आए थे मैंने उनसे कहा था कि चिंता मत करिये, मैं आपका केस जरूर लड़ूंगा.

आप यह भी कह चुके हैं कि आपको जेटली पसंद नहीं. आप दोनों के मतभेदों की वजह क्या है?

मैं जेटली के बारे में अच्छी राय नहीं रखता.

जैसे?

तब तक इंतजार करिए जब तक मैं अदालत में उनसे सवाल नहीं करता. मैं अभी यह नहीं बताना चाहता क्योंकि मैं नहीं चाहता कि वे तैयार रहें. लेकिन वे निश्चित रूप से यह जानते हैं कि मुझे उनके बारे में कई चीजें पता हैं.

इससे साफ तौर पर यही निष्कर्ष निकलता है कि उन्हें इन नामों के बारे में मालूम है और वे नहीं चाहते कि ये सार्वजनिक हों. इसका मतलब यह भी है कि लिस्ट में दोनों के ही नाम हैं.

फिर भी..जैसे क्या?

अच्छा, मैं आपको एक उदाहरण देता हूं. 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने लगातार और मजबूती के साथ काले धन की बात की. खुद भाजपा की एक टास्क फोर्स की रिपोर्ट है कि करीब डेढ़ हजार अरब डॉलर यानी करीब 90 लाख करोड़ रु विदेशों में ठुंसे हुए हैं. जर्मनी हमसे ज्यादा पैसे वाला देश है. मुझे नहीं लगता कि वहां भारत से ज्यादा भ्रष्टाचार होगा. पर फिर भी जर्मनी ने लिचेंस्टाइन बैंक के एक कर्मचारी को 47.5 करोड़ डॉलर देकर काला धन रखने वाले 1400 लोगों के नाम निकलवा लिए. स्विस बैंकर्स एसोसिएशन ने घोषणा की कि इसमें ज्यादातर लोग भारतीय हैं. जर्मन सरकार ने आधिकारिक रूप से ऐलान किया कि वह किसी भी मित्र देश के साथ ये नाम साझा करने को तैयार है. कोई पैसा नहीं, कोई शर्त नहीं.

लेकिन यूपीए सरकार ने कुछ नहीं किया और यही वजह है कि जनता ने उसे सत्ता से बाहर बैठा दिया. लेकिन तब विपक्ष में रहे लोगों ने सत्ता में आने के बाद भी जर्मनी से ये नाम नहीं मांगे. यहां तक कि मोदी भी जर्मनी हो आए और जर्मन चांसलर का भी भारत दौरा हो गया. इससे साफ तौर पर यही निष्कर्ष निकलता है कि उन्हें इन नामों के बारे में मालूम है और वे नहीं चाहते कि ये सार्वजनिक हों. इसका मतलब यह भी है कि लिस्ट में दोनों के ही नाम हैं.

दोनों से आपका मतलब क्या कांग्रेस और भाजपा के नेताओं से है?

(हंसते हैं) उस पर यूपीए के भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर चुनाव जीतने वाली पार्टी के अध्यक्ष (अमित शाह), जिन्हें मोदी ने नियुक्त करवाया है, कहते हैं कि काले धन की बात चुनावी जुमला थी. मजाक थी. इसका मतलब कि वे मान रहे हैं कि उन्होंने जनता को धोखा दिया.

मोदी कुछ नहीं कहते. वित्त मंत्री अरुण जेटली कुछ नहीं कहते. इससे क्या पता चलता है? इससे पता चलता है कि तीनों-मोदी, जेटली और शाह- साजिशपूर्ण तरीके से आपस में मिले हुए हैं. एक समय मोदी का सबसे बड़ा समर्थक था. लेकिन यही वजह है कि मैं आज उनका सबसे बड़ा आलोचक बन गया हूं.

मैंने कहा कि मैं माफी मांगने आया हूं, इसलिए कि मैं पढ़ा-लिखा आदमी हूं जिसे क्रिमिनल लॉयर के रूप में 75 साल का तजुर्बा है और फिर भी ऐसा कैसे हो गया कि मोदी ने मुझे बेवकूफ बना दिया.

और ऐसा इसलिए है कि आपको लगता है उन्होंने लोगों को धोखा दिया है?

मैं बिहार गया था. नीतीश कुमार ने मुझे अपने चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित किया था. मैंने उनसे कहा कि मेरे पास इतना समय नहीं है कि मैं जगह-जगह प्रचार करूं लेकिन, वे मेरे लिए दो बैठकें आयोजित कर दें. मैंने उनसे कहा कि मैं 20 मिनट से ज्यादा नहीं बोलूंगा.

तो मैंने बिहार में दो बैठकों को संबोधित किया. मैंने लोगों से कहा कि वे नीतीश और लालू का समर्थन करें. मैंने कहा कि एनडीए ने लोगों को धोखा दिया है और यह इस लायक नहीं है कि जनता इसका समर्थन करे. लेकिन मैंने यह भी कहा कि मैं उनके बीच एक दूसरे कारण से आया हूं. मैंने कहा कि मैं माफी मांगने आया हूं. इसलिए कि मैं पढ़ा-लिखा आदमी हूं जिसे क्रिमिनल लॉयर के रूप में 75 साल का तजुर्बा है और फिर भी ऐसा कैसे हो गया कि मोदी ने मुझे बेवकूफ बना दिया. मैंने कहा कि भले ही मुझे भाजपा से निकाल दिया गया था लेकिन, 2014 के चुनाव प्रचार में मैंने मोदी के लिए काम किया था.

प्रचार करने के लिए आपसे मोदी ने संपर्क किया था या भाजपा ने?

पहले मुझे अपनी बात पूरी करने दीजिए. मैं संडे गार्डियन के लिए एक साप्ताहिक स्तंभ लिखा करता था. 2014 में चुनावों के नतीजे आने के फौरन बाद मैंने लिखा था, ‘मोदी जी, आपकी शानदार सफलता पर बधाइयां और मुझे खुशी है कि आपकी इस सफलता में मैंने भी थोड़ा योगदान दिया. लेकिन मैं यह सिर्फ आपको यह बताने के लिए लिख रहा हूं कि जहां तक मेरा सवाल है तो मैं ऊपर वाले के एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज में बैठा हूं. मैं आपसे कुछ नहीं चाहता. कुछ नहीं मतलब कुछ नहीं. अब बस आप वे वादे पूरे कीजिए जो आपने लोगों से किए हैं.’

‘मैं यह सिर्फ आपको यह बताने के लिए लिख रहा हूं कि जहां तक मेरा सवाल है तो मैं ऊपर वाले के एयरपोर्ट के डिपार्चर लाउंज में बैठा हूं. मैं आपसे कुछ नहीं चाहता. आप बस अपने वादे पूरे कीजिए.’

आपको पता है, मोदी से इतना सा भी नहीं हुआ कि वे शिष्टाचार के नाते एक बार मुझे फोन करके धन्यवाद कह देते? इससे क्या पता चलता है? मेरे लिए इसका मतलब है कि वे कम से कम इंसान तो नहीं हैं. आज तक उन्होंने मुझसे बात नहीं की.
तो मैंने बिहार के लोगों से कहा कि मैं उनसे माफी मांगने आया हूं. इसलिए कि मुझ जैसा आदमी भी, जिसे देश का इतना बड़ा क्रिमिनल लॉयर माना जाता है, ठगा गया. इस बात को खूब चर्चा मिली. नीतीश ने अपने हर भाषण में इसका इस्तेमाल किया. देखिए, मोदी के अभियान का बिहार में क्या हश्र हुआ? उन्होंने खूब चुनाव प्रचार किया. इसके बावजूद उन्हें अपने जिंदगी की सबसे बुरी हार मिली. मोदी को इसका अहसास नहीं है.

आप ऐसा कैसे मानते हैं? क्या आप मोदी से मिले हैं?

वे यहां आया करते थे.

2014 के चुनाव प्रचार के दौरान?

हां, और उससे पहले भी. सितंबर 2013 में मेरे जन्मदिन के दिन मोदी और आडवाणी दोनों ही यहां मौजूद थे जब मैंने उनके बीच कुछ सहमति बनाने की कोशिश की थी. मोदी मेरे घर पर कई बार आए हैं. मैंने उनके चुनाव प्रचार के लिए सभी पार्टियों से ताल्लुक रखने वाले वकीलों को इकट्टा किया था. तालकटोरा स्टेडियम में 15 से 20 हजार वकील इकट्ठे हुए थे. वे देश के कोने-कोने से आए थे.

मोदी मेरे घर पर कई बार आए हैं. मैंने उनके चुनाव प्रचार के लिए सभी पार्टियों से ताल्लुक रखने वाले वकीलों को इकट्टा किया था. तालकटोरा स्टेडियम में 15 से 20 हजार वकील इकट्ठे हुए थे. वे देश के कोने-कोने से आए थे.

क्या जेटली कभी आपके संपर्क में रहे? आपकी उनके बारे में क्या राय है?

जेटली ने किया क्या है? मुझे तो एक भी बड़ा केस याद नहीं जिसमें वे पेश हुए हों. लेकिन शायद उनका बैंक बैलेंस मुझसे दस गुना ज्यादा होगा. आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं.

जब से आपने केजरीवाल का केस लड़ने का ऐलान किया है, कई कह रहे हैं कि आपने यह इसलिए किया है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय में जेटली के चलते आपकी कानून मंत्री के पद से विदाई हुई थी. क्या यह सच है?

यकीनन उन्होंने वाजपेयी को गुमराह किया. उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी. बाल ठाकरे ने सात साल पहले कुछ किया था--क्या था मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा- और महाराष्ट्र सरकार उन्हें गिरफ्तार करना चाहती थी. वे भाजपा के सहयोगी थे इसलिए वाजपेयी ने मुझे बुलाया और कहा, ‘राम, वे हमारे गठबंधन सहयोगी हैं और आपको उनका बचाव करना होगा.’ मैंने वाजपेयी से कहा कि वे चिंता न करें, कुछ नहीं होगा. मैं तब कानून मंत्री था और मैंने ठाकरे का मजबूती से बचाव करते हुए एक बयान दिया.

लेकिन फिर एक अजीब बात हुई. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (आदर्श सेन) आनंद ने यह कहते हुए मुझ पर हमला बोल दिया कि ठाकरे के बचाव में कानून मंत्री के बयान जारी करने का क्या मतलब है. ये बात सोली सोराबजी (पूर्व अटॉर्नी जनरल) और अरुण जेटली की मौजूदगी में कही गई थी. चीफ जस्टिस आनंद के इस बयान के बाद मैंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलवाई और कहा कि मैं अपना काम जानता हूं और कानून के बारे में तो मुझे निश्चित रूप से चीफ जस्टिस से ज्यादा ही जानकारी होगी. पहली बात तो यह कि मेरी गैरमौजूदगी में उनका यह बात कहना ही ठीक नहीं था. दूसरा, चीफ जस्टिस को ऐसे बयान शोभा नहीं देते.

सोराबजी और जेटली, वाजपेयी के पास गए और उन्हें बताया कि सुप्रीम कोर्ट सरकार का दुश्मन हो गया है. उन्होंने कहा कि अगर मुझे सरकार से बाहर नहीं किया गया तो उनके (एनडीए) लिए मुसीबत हो जाएगी.

मुझे यकीन है कि सोराबजी और जेटली, वाजपेयी के पास गए और उन्हें बताया कि सुप्रीम कोर्ट सरकार का दुश्मन हो गया है. उन्होंने कहा कि अगर मुझे सरकार से बाहर नहीं किया गया तो उनके लिए (एनडीए) मुसीबत हो जाएगी. वाजपेयी मुझे फोन करने का साहस नहीं जुटा सके. तो उन्होंने बेचारे जसवंत सिंह को यह काम करने को कहा.

मुझे याद है कि मैं मुंबई से पूना जाते हुए अपनी कार में था. जसवंत का फोन आया. मैंने इस अर्जेंट काल की वजह पूछी. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि मैं इस्तीफा दे दूं. बिना पलक झपकाए मैंने कहा, ‘जसवंत, प्रधानमंत्री को कहिएगा कि बॉम्बे-पूना रोड पर मुझे अब जो भी फैक्स मशीन मिलेगी उससे उन्हें मेरा इस्तीफा मिल जाएगा.’ (हंसते हैं) मैंने यही किया.

आपने जसवंत सिंह ने पूछा नहीं कि वजह क्या है?

नहीं. आप विश्वास करेंगे, तब से मैंने वाजपेयी की शक्ल नहीं देखी. कितने साल गुजर गए होंगे? आजकल कभी-कभी सोचता हूं कि मुझे जाकर उनसे मिलना चाहिए. मुझे बताया गया है कि वे बीमार हैं. लेकिन मेरा मन ही नहीं बन पाता.

क्या आप यह कह रहे हैं कि जेटली को आपसे खुन्नस है?

यह स्वाभाविक है. ये सब लोग ऐसे आदमी को बर्दाश्त नहीं कर सकते जो बौद्धिक रूप से उनसे बेहतर हो. 2013 में उन्होंने मुझे भाजपा से बाहर निकलवाया.

क्या आपने तब भाजपा के खिलाफ मानहानि का मामला दायर नहीं किया?

नहीं, मैंने एक मामला दायर किया जिसमें यह मांग की गई थी कि मेरे निष्कासन के आदेश को निरस्त घोषित किया जाए.

उसका क्या हुआ?

वे हमेशा इस पर रोक की मांग करते रहते हैं.

भाजपा का कहना है कि दिल्ली सरकार को डीडीसीए में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए आयोग बनाने का अधिकार नहीं है. क्या आप इससे सहमत हैं?

मुझे लगता है कि भाजपा गलत है. अब वे अदालत में लड़ लें. तीन चीजों (भूमि, पुलिस, जन-व्यवस्था) के अलावा दिल्ली सरकार के पास हर अधिकार है.