95 वर्षीय मोहम्मद हाशिम अंसारी अयोध्या के काजियाने मोहल्ले में रहते हैं. उनके घर के बाहर एक तख्ती लगी है जिस पर उनके नाम के साथ ही ‘याचिकाकर्ता बाबरी मस्जिद’ लिखा है. पिछले साठ सालों से यही हाशिम अंसारी की मुख्य पहचान भी है. बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में वे ही सबसे पुराने और सबसे उम्रदराज याचिकाकर्ता हैं.

हाशिम अंसारी के घर के सामने एक खाली मैदान है जिसके एक छोर पर कुछ ट्रक खड़े हैं और दूसरी तरफ इंटें, रेत, बजरी और निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पड़ी है. इसी मैदान में एक चारपाई बिछाए हाशिम अंसारी दिसंबर की गुनगुनी धूप में सो रहे हैं. पास ही उनकी सुरक्षा में तैनात किये गए उत्तर प्रदेश पुलिस के दो जवान बैठे हैं.

'ये लोग राम लला के लिए नहीं लड़ रहे. इनकी लड़ाई कुर्सी की है. राम लला को जेल में बंद करके ये लोग अपनी राजनीति चमका रहे हैं.'

हमारे पहुंचने पर सुरक्षाकर्मी हमारा परिचय पूछते हैं और फिर सफाई देते हुए बताते हैं कि कप्तान साहब (एसपी फैजाबाद) का आदेश है कि जो भी मिलने आए उसका नाम और परिचय दर्ज किया जाए. ‘हाशिम अंसारी साहब का स्वास्थ्य कैसा है?’ यह पूछने पर सुरक्षाकर्मी कहते हैं, ‘इस उम्र में जैसा होना चाहिए बस वैसा ही है.’ इतना कहकर वे उन्हें जगाते हैं, ‘चचा, आपसे मिलने कुछ लोग आए हैं.’ ऊंचे स्वर में यह कहकर सुरक्षाकर्मी हमें बताते हैं, ‘चचा कुछ ऊंचा ही सुनते हैं. जोर से बोलियेगा.’ अयोध्या के लगभग सभी लोग हाशिम अंसारी को चचा कहकर ही पुकारते हैं.

हमारे साथ गए एक स्थानीय पत्रकार हमारा परिचय हाशिम अंसारी से करवाते हुए कहते हैं, ‘चचा ये लोग पत्रकार हैं. दिल्ली से आए हैं आपसे मिलने.’ इस पर हाशिम अंसारी कुछ भड़कते हुए से कहते हैं, ‘यहां क्यों आए हैं? वहां जाइये जहां मंदिर के पत्थर लाए जा रहे हैं, शिला पूजन हो रहा है. आप लोगों का काम तो आग लगाने का ही है.’ उनकी इस बात पर सुरक्षाकर्मी ठहाका लगाकर हंस देते हैं. स्थानीय पत्रकार सकपकाकर कहते हैं, ‘चचा ये लोग आग लगाने नहीं, बुझाने आए हैं.’ आंखों के ऊपर हाथ रखते हुए हाशिम अंसारी हमें गौर से देखते हैं. ‘चचा आग लगानी होती तो हम उनके पास जाते जो भड़काऊ बातें करते हैं. आपने तो ताउम्र मंदिर-मस्जिद के मुद्दे को शांति से सुलझाने की बात कही है. हम आपके पास क्यों आते?’ अब हाशिम अंसारी कुछ सहज और हमसे बात करने को तैयार लगते हैं.

कुछ दिन पहले ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए दो ट्रक पत्थर लाए गए हैं. इस पर हाशिम अंसारी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि ‘मैं प्रधानमंत्री मोदी से अपील करता हूं कि ऐसा होने से रोकें.’ उनके इस बयान का कुछ असर हुआ? यह पूछने पर वे कहते हैं, ‘पत्थर आज से नहीं कई साल से आ रहे हैं. पत्थर पूजन भी कई साल से हो रहा है. परमहंस (रामचन्द्र दास) ने भी पूजन किया था और फिर कुछ दूर जाकर उन पत्थरों को रख दिया था. आज कहां हैं वो पत्थर? अब फिर से पूजन हो रहा है. कहां ले जाएंगे?’ कहते-कहते ही वे अचानक रुक जाते हैं. कुछ देर दूसरी तरफ देखते हैं फिर कहना शुरू करते हैं, ‘आप लोग इस मामले को नहीं समझ सकते. ये लोग राम लला के लिए नहीं लड़ रहे. इनकी लड़ाई कुर्सी की है. राम लला को जेल में बंद करके ये लोग अपनी राजनीति चमका रहे हैं.’

अयोध्या के सभी लोग भी यह मानते हैं कि हाशिम अंसारी ने कभी भी इस मामले में कोई राजनीति नहीं की और अपनी लड़ाई को पूरी तरह से कानून के दायरे में रखा है.

वे आगे कहते हैं, ‘सबसे पहले नय्यर ने यहां मूर्ति रखी थी (केके नायर 1949 में फैजाबाद के उपायुक्त थे), वे एमपी बन गए, उनकी बीवी एमएलए बन गई. भाजपा दो सीटों से बढ़कर देश की सत्ता में आ गई. राम लला का क्या हुआ? कोई और मंदिर है पूरे देश में जहां इस तरह से ताला लगा हो? राम मंदिर इनके लिए सिर्फ डमरू की तरह है. हर चुनाव में यह डमरू बजाते हैं. अब चुनाव आ रहे हैं तो फिर से यह डमरू बजने लगा है.’

हाशिम अंसारी न सिर्फ ऐसे व्यक्ति हैं जो सबसे ज्यादा समय से न्यायालय में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद को सुलझाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, बल्कि वे ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति भी हैं जिन्होंने न्यायालय के बाहर भी इस मामले को सुलझाने के सबसे ज्यादा प्रयत्न किये हैं. वे कई बार हिन्दू और मुस्लिम नेताओं के साथ बैठकर इस मामले को निपटाने की पहल कर चुके हैं. 2010 में जब उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय इस मामले में फैसला सुनाने वाला था तो उन्होंने ही सबसे पहले यह घोषणा भी की थी कि फैसला चाहे जो हो, वे उसे स्वीकार करेंगे. पूरे मुस्लिम समुदाय से शांति बनाए रखने की मांग भी सबसे पहले उनकी तरफ से ही की गई थी.

हाशिम अंसारी को मंदिर-मस्जिद जैसे विवादास्पद और धार्मिक कट्टरता वाले मामले के सबसे सौम्य चेहरे के रूप में जाना जाता है. वे भले ही इस मामले में मुस्लिम समुदाय के सबसे प्रमुख पैरोकार हैं लेकिन अयोध्या के हिन्दुओं में भी उनके प्रति उतना ही सम्मान है. अयोध्या के सभी लोग भी यह मानते हैं कि हाशिम अंसारी ने कभी भी इस मामले में कोई राजनीति नहीं की और अपनी लड़ाई को पूरी तरह से कानून के दायरे में रखा है.

लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उनकी झुंझलाहट जरूर बढ़ गई है. अब कई बार ऐसा होता है कि झुंझलाहट में हाशिम अंसारी आज कोई बयान देते हैं और अगले ही दिन उससे पलट जाते हैं. कभी वे कहते हैं अब वे इस मामले से अपना नाम वापस ले रहे हैं तो कुछ समय बाद ही कहते हैं मैं आखिरी सांस तक इस मुक़दमे को लड़ता रहूंगा. कभी वे देश के प्रमुख कट्टरपंथी लोगों में मोदी को भी शामिल करते हैं तो कभी उन्हें सौम्य बताते हुए उनकी जमकर तारीफ भी करते हैं. वे कभी कहते हैं कि इस देश में मुसलमानों को हमेशा से दबाया जाता रहा है तो कभी वे स्वयं सारे देश में बीफ पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं.

अब कई लोग उनका इस्तेमाल करने लगे हैं. भाजपा और विहिप के लोग कभी उन्हें शाल भेंट कर देते हैं, मीठी-मीठी बातें करते हैं और अपने मुताबिक बयान दिलवा देते हैं

बढती उम्र के प्रभाव में उनकी विरोधाभासी बातों के कई उदाहरण हमें भी देखने को मिले. हाल ही में बारावफात के अवसर पर अयोध्या के कुछ कुछ मुस्लिम युवाओं ने बाबरी मस्जिद का एक मॉडल बनाया था. इस पर खूब विवाद हुआ और पुलिस ने एआईआर दर्ज करते हुए तीन लोगों को नामजद भी किया है. इस घटना की हमसे चर्चा करते हुए हाशिम अंसारी कहते हैं, ‘कुछ युवा लड़कों की नादानी को बेमतलब ही तूल दिया जा रहा है. इस मामले में एफआईआर नहीं होनी चाहिए थी.’ इसके कुछ समय बाद ही जब दोबारा इस घटना का जिक्र छिड़ता है तो हाशिम अंसारी कहते हैं, ‘बाबरी का मॉडल बलवा कराने के लिए बनाया गया था. कई लोग चाहते हैं कि शांति भंग हो, हिन्दू-मुसलमान आपस में जमकर लड़ें और वे लोग इसका फायदा उठाएं.’

एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं, ‘हाशिम जी की वित्तीय स्थिति कमज़ोर है. उन्होंने कभी चंदा लेने या इस मुद्दे से व्यक्तिगत लाभ लेने की भी कोशिश नहीं की. लेकिन अब कई लोग उनका इस्तेमाल करने लगे हैं. भाजपा और विहिप के लोग कभी उन्हें शाल भेंट कर देते हैं, मीठी-मीठी बातें करते हैं और अपने मुताबिक बयान दिलवा देते हैं. बाद में जब वे परेशान होने लगते हैं तो उस बयान से पलट जाते हैं.’ ये पत्रकार आगे बताते हैं, ‘लेकिन इससे हमारा काम बहुत मुश्किल हो गया है. हम उनका एक बयान छापते हैं और पता लगता है कि अगले ही दिन वे उससे पलट गए हैं.’

छोटे-मोटे मामलों में भले ही राजनीतिक दल उनका इस्तेमाल करने लगे हों, उनकी बढती उम्र, घटती याददाश्त और कमज़ोर आर्थिक स्थिति का फायदा उठा रहे हों, लेकिन इस बात से अयोध्या के सभी लोग सहमत नज़र आते हैं कि हाशिम अंसारी ने जिन्दगी भर बाबरी मस्जिद के मसले से अपने व्यक्तिगत हित नहीं साधे. राम मंदिर से जुड़े रहे दर्जनों लोग राष्ट्रीय स्तर पर छा गए, विधानसभा और लोकसभा तक पहुंच गए, लेकिन हाशिम अंसारी ने कभी इस मामले का राजनीतिक लाभ नहीं लिया. 95 साल की उम्र में भी एक बात जो वे कहना नहीं भूलते और अपने हर मिलने वाले से जरूर कहते हैं, वह यही होती है कि ‘बाबरी मस्जिद के नाम पर न कुर्सी, न करेंसी.’