गांधी का आख़िरी महीना उनके किसी भी महीने की तरह ही भीड़ भरा और व्यस्त था. छब्बीस जनवरी की शाम प्रार्थना के बाद के अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा, ‘यह दिन, छब्बीस जनवरी, स्वतंत्रता दिवस है (आजादी से पहले कांग्रेस इस दिन को स्वतंत्रता दिवस के रूप में ही मनाती थी). इसे मनाना तब एकदम ठीक था जब हम स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे थे जिसे न हमने देखा था न जिसके साथ दो-चार हुए थे. अब हम इसका इस्तेमाल कर रहे हैं और लगता है कि इससे हमारा मोहभंग हो गया है. कम से कम मेरा तो हुआ है, अगर आपका न भी हुआ हो.’

‘आज हम किस बात का जश्न मना रहे हैं? अपने मोहभंग का तो निश्चय ही नहीं. हमें इस यकीन का जश्न मनाने का पूरा हक है कि सबसे बुरा गुजर चुका है और अब हम उस रास्ते पर हैं कि सबसे निचले धरातल पर रह रहे ग्रामीण को बता सकें कि इसका मतलब गुलामी से उसकी आज़ादी है और एक गांव वाला भारत के शहरों और नगरों की सेवा करने को पैदा हुआ गुलाम नहीं है .... इसका मतलब सारे वर्गों और मतों की बराबरी भी है, बड़े का छोटे पर प्रभुत्व कतई नहीं, वह छोटा अपनी तादाद और ताकत में कितना ही नगण्य क्यों न हो.’

इस इंटरव्यू में उन्होंने एक प्रकार की तकलीफदेह आत्मस्वीकृति की. उन्होंने कहा कि 'आज़ादी का आन्दोलन वास्तव में अहिंसक नहीं रहा है, अगर हम अहिंसा के श्रेष्ठतम अर्थ को ध्यान में रखें...'

इस उद्बोधन में उन्होंने कानपुर और दूसरी जगहों पर खदानों में चल रही हडतालों का जिक्र किया और उनसे अपनी असहमति जताई. गांधी इस दुविधा से पार नहीं पा सकते थे कि वे हड़ताल के खिलाफ कैसे बोल रहे हैं जबकि उन्होंने खुद कई सफल हडतालों का नेतृत्व किया था. इस क्रम में उन्होंने कहा कि श्रम के मुकाबले पूंजी में कोई शक्ति और गौरव नहीं है. वे अब उम्मीद कर रहे थे कि आज़ादी के बाद नए कानूनों के सहारे श्रमिक अपनी आज़ादी हासिल कर पाएंगे. गांधी यह देखने को जीवित नहीं रहने वाले थे कि आज़ाद हिंदुस्तान के क़ानून प्रायः पूंजी के पक्ष में और श्रम के विरुद्ध ही इस्तेमाल किए जाने थे. कि श्रम और पूंजी के सघर्ष में राज्य कभी तटस्थ नहीं होने वाला था और उसे हमेशा उसका साथ देना था जिसके बारे में गांधी का ख्याल था कि उसमें कोई आंतरिक गौरव नहीं है.

भारतीय राज्य ने बाद में सम्मानित भी अक्सर पूंजी की ताकत को ही किया. इस साल के पद्म सम्मानों में उस पूंजीपति का नाम सबसे ऊपर है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने क़ानूनों को तोड़-मरोड़कर, धोखाधड़ी के सहारे अपना साम्राज्य विकसित किया. यह एक प्रकार की मुहावरेदार बात ही है लेकिन आज अगर गांधी होते तो क्या उन कानूनों के खिलाफ सत्याग्रह न करते जो मजदूरों को पूंजी के सामने और निहत्था और बेसहारा करते जा रहे हैं?

लेकिन अपने आख़िरी दिनों में गांधी कुछ दूसरी किस्म की फिकरों से ज्यादा मुखातिब थे. ये फिक्रें अहिंसा के उनके सिद्धांत और विश्वास से जुड़ी थीं और भारत में सामाजिक जीवन किस प्रकार का होगा, इससे सम्बंधित थीं.

सत्ताईस जनवरी को गांधी ने किंग्सले मार्टिन को इंटरव्यू दिया. इस इंटरव्यू में उन्होंने एक प्रकार की तकलीफदेह आत्मस्वीकृति की. उन्होंने कहा कि 'आज़ादी का आन्दोलन वास्तव में अहिंसक नहीं रहा है, अगर हम अहिंसा के श्रेष्ठतम अर्थ को ध्यान में रखें. अगर यह (अंग्रेजों के प्रति हमारी अहिंसा) ताकतवर लोगों की अहिंसा होती तो उस तरह की खूंरेजी न होती जो हाल में (विभाजन के दौरान ) की गई.'

आजादी के वक्त, भारत और पाकिस्तान के जन्म की घड़ी में उसी हिंदू और मुस्लिम जनता ने एक दूसरे का क़त्ल किया जो गांधी के नेतृत्व में अहिंसा के परचम तले अंग्रेजों का मुकाबला कर रही थी. अहिंसा के इस सुविधाजनक इस्तेमाल के बारे में गांधी जी ने एकाधिक बार अपना दुख जाहिर किया. उनका खयाल था कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अहिंसा एक सुविधा का अस्त्र था और गोरों के खिलाफ अगर अहिंसक प्रतिरोध का सहारा लिया गया तो सिर्फ इसलिए कि हमारे पास उनसे लड़ने की फौजी ताकत न थी.

तो क्या आजादी से पहले इसके लिए अहिंसा का चुनाव नहीं किया गया था? इस सवाल पर गांधी का क़त्ल कर दिए जाने के बाद हमने कभी सोचने की आवश्यकता ही महसूस न की. गांधी की आत्म-स्वीकृति के बावजूद हम हमेशा यही कहते रहे कि भारत का स्वाधीनता आन्दोलन अहिंसक था और आज तक हम इसकी बहुत शान भी बघारते रहे हैं. लेकिन यह पूरा सच न था.

गांधी यह देखने को जीवित नहीं रहने वाले थे कि आज़ाद हिंदुस्तान के क़ानून प्रायः पूंजी के पक्ष में और श्रम के विरुद्ध ही इस्तेमाल किए जाने थे.

इसी इंटरव्यू में गांधी ने दक्षिण अफ्रीका की एक घटना का जिक्र किया. एक जनसभा में एक करोड़पति ने गांधी का परिचय निष्क्रिय प्रतिरोधकारी के रूप में दिया. उसके अनुसार गांधी के प्रतिरोध का तरीका ऐसा इसलिए था क्योंकि वे भारतीय, भूमिहीन और अधिकार वंचित यानी कमजोर व्यक्ति थे. गांधी ने इसपर ऐतराज किया और कहा कि असली निष्क्रिय प्रतिरोध को कमजोरों का हथियार बताना गलत है. ईसा मसीह को तो निष्क्रिय प्रतिरोध करने वालों का राजकुमार कहा जा सकता है. क्या किसी भी अर्थ में ईसा को कमजोर कहा जा सकता है? इस घटना का जिक्र करने के पीछे गांधी की मंशा यह बताने की रही थी कि अहिंसक प्रतिरोध किसी कमजोरी से निकला हुआ नहीं हो सकता.

गांधी एक सच्चे निष्क्रिय प्रतिरोधकारी की असली ताकत उसकी आत्मा की शक्ति को मानते थे. और यह किसी कमजोर की ताकत हो ही नहीं सकती थी. लेकिन इसे विकसित कैसे किया जाए? और अगर सत्ता - चाहे वह कोई भी हो और किसी की भी - से मुकाबला हो तो उसकी बाहरी ताकत का सामना इस आत्म-शक्ति के सहारे कैसे किया जाए?

यह सवाल और कहीं नही, गांधी की अहिंसा के उत्तराधिकार का दावा करने वाले भारतीय राज्य के कई हिस्सों में वे लोग पूछ रहे हैं जिनपर राज्य ही आक्रमण कर रहा है. अगर आज संघर्ष के किसी गांधीवादी मुहावरे और सिद्धांत की परीक्षा की सही जगह तलाश करनी है, तो ये वही जगहें हैं.

गांधी ने इसपर ऐतराज किया और कहा कि असली निष्क्रिय प्रतिरोध को कमजोरों का हथियार बताना गलत है. ईसा मसीह को तो निष्क्रिय प्रतिरोध करने वालों का राजकुमार कहा जा सकता है

लेकिन जो राज्य बिना जबर्दस्ती किए अपने अस्तित्व की घोषणा भी नहीं कर पाता वह हिंसा-विहीन होगा कैसे? क्या राज्य की कोई आत्मा भी होती है?

गांधी को मौलाना आज़ाद की बात याद थी कि एक बार सत्ता हासिल करने के बाद हम उसे अहिंसक तरीके से अपने पास रख नहीं सकते. लेकिन वे अपने गुरु तोल्सतोय को भी नहीं भूले थे जिनकी कहानी मूढ़ इवान उन्हें बहुत पसंद थी. राजा हो जाने के बाद भी इवान अहिंसक बना रहा था.

लेकिन अहिंसक व्यक्ति को राज्य चलाने के लिए जरूरी ताकत कहां से हासिल होगी? इस संबंध में गांधी का उत्तर इवान की तरह ही सरल और मूढ़ जान पड़ेगा. वे कहते हैं कि वह खुद ताकत रख नहीं सकता. वह इसे अवाम से हासिल करता है, जिसकी खिदमत करने के लिए वह सत्तासीन हुआ है.

जनता से ताकत कैसे हासिल की जाए और उसके लिए बार-बार उसके पास कैसे लौटा जाए, यह सवाल पेचीदा है और इसलिए इस पर विचार को स्थगित रखा गया है. इस बार गांधी के आख़िरी दिन के मौके पर नए सिरे से इस पर बहस की ज़रूरत है.