बीते सोमवार को केरल के कन्नूर जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के के एक कार्यकर्ता की हत्या हो गई. राज्य में इसी साल चुनाव होने हैं. यह देखते हुए ऐसा लगता है कि राजनीतिक हत्याओं के लिए कुख्यात इस जिले में यह इसी कड़ी का हिस्सा है.

संघ कार्यकर्ता पीवी सुजीत सोमवार रात को घर पर ही थे जब तकरीबन 10 लोगों ने वहां उनपर हमला किया. 27 साल के सुजीत को बचाने के लिए उनके मां-बाप और भाई ने कोशिश की और इस हाथापाई में वे भी घायल हुए हैं. सुजीत पर तलवारों से हमला किया गया था और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई. हत्या के इस मामले में पुलिस ने सीपीएम के कथित सात कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है.

‘कन्नूर में राजनीतिक हिंसा को खत्म करने के लिए जब सीपीएम नेताओं ने हमारी पहल को ठुकरा दिया, तो मुझे समझ आ गया था कि वे यहां शांति कायम करना नहीं चाहते’

भारतीय जनता पार्टी ने हत्या के लिए सीपीएम को जिम्मेदार ठहराया है. पार्टी के कन्नूर जिला अध्यक्ष पी सत्यप्रकाश बताते हैं कि 2014 में कथीरूर मनोज की हत्या हुई थी और इसके आरोप में सीपीएम के जिला सचिव पी जयराजन को हिरासत में लिया गया है. इसके बाद से सीपीएम बेवजह ही हिंसक हमलों की रणनीति पर काम कर रही है.

भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष कुम्मानम राजशेखरन बताते हैं कि सुजीत राजनीतिक हिंसा का शिकार बना है और यह हत्या बताती है कि सीपीएम हिंसा छोड़ने वाली नहीं है. वे कहते हैं, ‘कन्नूर में राजनीतिक हिंसा को खत्म करने के लिए जब सीपीएम नेताओं ने हमारी पहल को ठुकरा दिया, तो मुझे समझ आ गया था कि वे यहां शांति कायम करना नहीं चाहते. सोमवार को हमारे कार्यकर्ता की हत्या से यही बात साबित होती है.’

हालांकि सीपीएम के राज्य सचिव कोडियेरी बालाकृष्णन इस आरोप को नकारते हैं. उनके मुताबिक इसके पीछे एक स्थानीय लड़की के शोषण का मामला है. उनके सहयोगी ईपी जयराजन भाजपा पर आरोप लगाते हैं कि वह इस हत्या का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है.

कन्नूर में बाहुबल की राजनीति होती है

हालांकि यह अभी तक साफ नहीं हुआ है कि हालिया हत्या के पीछे राजनीतिक प्रतिद्वंदिता है या नहीं लेकिन कन्नूर में ऐसी हर हत्या का राजनीतिकरण जरूर होता है. इसकी वजह ये है कि केरल में वामपंथी राजनीति की जन्मस्थली रहे इस जिले में सारी पार्टियां बाहुबल के दम पर ही राजनीति करती हैं.

कन्नूर जिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां 1970 के दशक में शुरू हुई थीं. ग्रामीण इलाकों में संघ जब सीपीएम के लिए चुनौती बनना शुरू हुआ तो इसी के साथ यहां हिंसा भी शुरू हो गई. पार्टी ने अपनी पकड़ वाले गांवों में तो हिंदुत्व की राजनीति को एक तरह से आगे नहीं बढ़ने दिया लेकिन, कुछ गांवों में संघ ज्यादा प्रभावशाली है. इन दोनों तरह के इलाकों में प्रभावशाली गुट से असहमति जताने या विरोध करने पर मारपीट या हिंसा आम बात है. पिछले तीन दशकों में यहां तकरीबन 200 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं. यहां ये राजनीतिक गुट हत्यारों को बचाने का काम करते हैं.

केरल पुलिस से एक अधिकारी बताते हैं कि ऐसे कई केस हैं जहां राजनीतिक दलों द्वारा पेश किए गए आरोपितों और गवाहों पर पुलिस आंख मूंदकर भरोसा कर लेती है

उत्तर केरल के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि ज्यादातर अपराधों में पुलिस कभी असली अपराधी को नहीं पकड़ पाती क्योंकि राजनीतिक दल आरोपित और गवाहों को लेकर खुद ही आ जाते हैं. इसीलिए ज्यादातर मामलों में न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो जाती है. इस तरह के मामलों में एक साथ कई अभियुक्तों का बरी हो जाना यहां आमबात है.

पिछले मंगलवार को ही केरल हाईकोर्ट ने सीपीएम के 26 कार्यकर्ताओं को दो राजनीतिक हत्याओं के मामले में बरी किया है. इन्हें ट्रायल कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

केरल पुलिस से एक अधिकारी बताते हैं कि ऐसे कई केस हैं जहां राजनीतिक दलों द्वारा पेश किए गए आरोपितों और गवाहों पर पुलिस आंख मूंदकर भरोसा कर लेती है. यदि पुलिस ऐसा करने से मना करती है तो उसे धमकी दी जाती है और कई बार उसपर भी हमला हो जाता है. केरल के राज्य अभियोजन निदेशक (स्टेट डायरेक्टर जनरल ऑफ प्रॉसीक्यूशन) टी आसिफ अली जानकारी देते हैं कि 2012 में शुकूर हत्या मामले में जब पुलिस ने सीपीएम के जिला सचिव पी जयराजन को हिरासत में नहीं लिया तो पूरे जिले में हिंसा फैल गई थी.

जयराजन को हाल ही में इस मामले में झटका लगा है. आठ फरवरी को हाईकोर्ट ने शुकूर हत्या मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया है. कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की है कि वह ‘स्वघोषित राजाओं को कानूनी व प्रशासनिक तंत्र’ अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दे सकता. वहीं 11 फरवरी को कोर्ट ने कथीरूर मनोज हत्या मामले में जयराजन की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी. इसके बाद से जयराजन न्यायिक हिरासत में हैं. भाजपा का आरोप है कि सुजीत की हत्या इसी की राजनीतिक प्रतिक्रिया है.

सुजीत की हत्या राजनीतिक हो या न हो लेकिन कांग्रेस चुनाव में इस हत्या के बहाने राजनीतिक हिंसा को एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है

सीपीएम के कई नेताओं पर गंभीर आरोप हैं

माना जाता है कि जयराजन के अलावा सीपीएम के कई नेता राजनीतिक हत्याओं में शामिल रहे हैं लेकिन राज्य पुलिस कभी इनकी जांच सही नतीजे पर नहीं पहुंचा पाई. 2012 में टीपी चंद्रशेखरन की हत्या ऐसा ही उदाहरण है. चंद्रशेखरन वैचारिक मतभेदों के चलते पार्टी से अलग हो गए थे.

इस हत्या में जो लोग सीधे-सीधे शामिल थे उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करके पुलिस इस मामले की जांच बंद कर चुकी है. कुल आठ लोगों, जिनमें तीन सीपीएम के नेता हैं, को इस मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है. लेकिन चंद्रशेखरन की पत्नी का दावा है कि इस हत्या की साजिश पार्टी में शीर्ष स्तर पर रची गई थी और इसके असली सूत्रधारों को सजा नहीं मिल पाई है. वे इसकी जांच सीबीआई को सौंपे जाने की अदालती लड़ाई लड़ रही हैं.

केरल के गृहमंत्री रमेश चेन्नितला मानते हैं कि हत्या का आदेश देने वाले राजनीतिक आकाओं को पकड़ा जाना चाहिए. उनके मुताबिक सिर्फ हत्यारों को पकड़ने से कन्नूर में राजनैतिक हिंसा नहीं थमेगी.

फिलहाल कांग्रेस चुनाव में सुजीत की हत्या के बहाने राजनीतिक हिंसा को एक बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है. कांग्रेस गठबंधन वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को लगता है कि सुजीत हत्याकांड और जयराजन के जेल जाने से यहां सीपीएम के साथ-साथ भाजपा भी रक्षात्मक मुद्रा में है. इन दोनों घटनाओं के चलते राज्य सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से भी जनता ध्यान हटा है और कांग्रेस इससे राहत महसूस कर रही है.

(यह सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइटस्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)